पश्चिम बंगाल में मोदी-शाह की जोड़ी ममता को क्यों मात नहीं दे पाई

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

"पश्चिम बंगाल में बीजेपी का प्रदर्शन तो अच्छा रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की राजनीति हार गई है. अगर बीजेपी मोदी-शाह मॉडल पर इसी तरह आगे बढ़ती रही तो भविष्य में भी चुनावी नतीजे अलग नहीं होंगे. आख़िर हर विधानसभा चुनावों में मोदी पार्टी का शुभंकर और शाह मुख्य रणनीतिकार क्यों बन जाते हैं?",

प्रदेश बीजेपी के एक पुराने नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर जब यह बात कहते हैं, तो उनकी लाचारी और पीड़ा साफ़ झलकती है.

बंगाल में 'अबकी बार दो सौ पार' का नारा देने वाली बीजेपी की हार की यह कोई अकेली वजह भले नहीं हो, लेकिन सबसे अहम वजह तो साबित हुई ही है.

चुनावी दुर्गति के बाद प्रदेश के नेताओं में खदबदाते असंतोष के बीच पार्टी के नेता हार के कई कारण गिना रहे हैं.

इनमें दलबदलुओं को बड़े पैमाने पर टिकट देना, ज़मीनी हालात का आकलन किए बिना हवा-हवाई दावे करना और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ निजी हमले करने जैसी कई वजहें शामिल हैं.

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में जिन इलाक़ों में क़रीब डेढ़ दर्जन चुनावी रैलियां की थीं, उनमें से उत्तर बंगाल को छोड़ कर ज़्यादातर इलाक़ों में बीजेपी उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा है.

विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी ने बीजेपी के ख़िलाफ़ बांग्ला अस्मिता, संस्कृति, पहचान और स्थानीय बनाम बाहरी जैसे जो मुद्दे उठाए थे उनको बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने कोई तवज्जो नहीं दी. लेकिन बिहारी सतसई के दोहे देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर की तर्ज़ पर उनसे पार्टी को भारी नुक़सान पहुँचा.

जनता का मूड भाँपने में चूक

बीरभूम ज़िले के समाज विज्ञान के प्रोफ़ेसर असीम कुमार मंडल कहते हैं, "बीजेपी बंगाल की ज़मीनी स्थिति का आकलन करने में बुरी तरह फ़ेल रही है. उसने प्रदेश नेताओं को अहमियत देने की बजाय चुनावी रणनीति का ज़िम्मा केंद्रीय नेताओं को सौंप दिया था. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि पार्टी बंगाल की संस्कृति और यहाँ के लोगों का मूड भांपने में नाकाम रही है."

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "हम हार की वजहों पर विचार-विमर्श करने के बाद आगे बढ़ेंगे. लेकिन तीन से इतनी सीटों तक पहुँचना भी कम उपलब्धि नहीं है. इस चुनाव में हमने बहुत बड़ा लक्ष्य तय कर लंबी छलांग लगाई थी. लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी."

प्रदेश बीजेपी के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय तो रविवार को शुरुआती रुझानों के बाद भी पार्टी की क़िस्मत बदलने का दावा और उम्मीद कर रहे थे.

लेकिन टीएमसी के हैट्रिक बनने का रास्ता साफ़ होने के बाद उन्होंने कहा, "लगता है कि बंगाल की जनता ने ममता बनर्जी का मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला कर लिया था."

बीजेपी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे के सामने नहीं होने की वजह से पार्टी को नुक़सान पहुँचा है. इसके साथ ही लेफ़्ट और कांग्रेस के वोटरों ने हमारे ख़िलाफ़ टीएमसी को वोट दिया है."

स्थानीय नेताओं की अनदेखी?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी ने एक नहीं, कई ग़लतियां की हैं. सबसे बड़ी ग़लती तो यह थी कि चुनावी रणनीति हो या टिकटों के बँटवारे का मामला, स्थानीय नेताओं की राय को तरजीह नहीं दी गई.

तमाम फ़ैसले केंद्रीय स्तर पर होते रहे. टिकटों के बँटवारे में स्थानीय नेताओं के नामों की उपेक्षा कर ऐसे लोगों को बड़े पैमाने पर टिकट दिए गए, जिनमें से कुछ तो महज़ चौबीस घंटे पहले ही पार्टी में शामिल हुए थे या फिर टिकट मिलने के बाद शामिल हुए.

इसके अलावा चार सांसदों को मैदान में उतारना पड़ा. राजनीतिक विशलेषक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "दलबदलुओं और सांसदों को मैदान में उतारने से आम लोगों में यह संदेश गया कि बीजेपी के पास हर सीट पर उतारने लायक़ भी उम्मीदवार नहीं हैं. इसलिए उसे उधार के नेताओं का सहारा लेना पड़ रहा है. ऐसे ज़्यादातर सांसदों और दलबदलुओं को हार का सामना करना पड़ा."

बीजेपी के एक नेता बताते हैं कि आसनसोल के सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे.

लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उनको इसके लिए मजबूर किया. चुनावी नतीजों के बाद बाबुल की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखें, तो यह बात सही लगती है. कोलकाता की टालीगंज सीट से बाबुल 50 हज़ार से ज़्यादा वोटों के अंतर से पराजित हो गए थे.

नतीजों के एलान के बाद बाबुल ने फ़ेसबुक पर अपनी एक पोस्ट में लिखा था, "मैं ममता बनर्जी को बधाई नहीं दूँगा, न ही कहूँगा कि मैं लोगों के फ़ैसले का सम्मान करता हूँ. मेरा मानना है कि बंगाल के लोगों ने एक ऐतिहासिक ग़लती की है कि उन्होंने बीजेपी को इस भ्रष्टाचार, अयोग्य, बेईमान सरकार के ख़िलाफ़ काम करने का मौक़ा नहीं दिया और एक क्रूर महिला को सत्ता में वापस लाए." हालाँकि उन्होंने बाद में यह पोस्ट हटा दी.

काम नहीं आए टीएमसी से आए नेता

बीजेपी ने इस बार जितने बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान शुरू करते हुए बंगाल में अपने तमाम संसाधन और तमाम केंद्रीय नेताओं, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को चुनाव प्रचार में उतारा था उससे पार्टी के स्थानीय नेताओं को 'दो मई दीदी गई' और 'अबकी पार दौ सौ पार' जैसे नारों पर भरोसा होने लगा था.

टीएमसी के तमाम नेताओं को तोड़ कर पार्टी में शामिल कराया गया और टिकट दिए गए. लेकिन इसके बावजूद पार्टी तिहाई का आँकड़ा भी नहीं छू सकी.

प्रदेश बीजेपी के एक नेता कहते हैं, "मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा नहीं होना, चुनाव अभियान में ममता बनर्जी पर सबसे ज़्यादा ध्यान केंद्रित करना और नंदीग्राम में ममता के घायल होने की घटना पर उनका मज़ाक़ उड़ाना जैसे मुद्दे भारी पड़े. इसके अलावा पार्टी हाशिए पर बैठे लोगों और महिला वोटरों का समर्थन पाने की उम्मीद कर रही थी."

वह नेता बताते हैं कि ममता बनर्जी पर चौतरफ़ा हमलों की वजह से महिला वोटरों के एक बड़े हिस्से ने उनका समर्थन किया.

इसके साथ ही पार्टी ने जिस बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण कार्ड खेला उसका भी ख़ामियाज़ा उसे उठाना पड़ा. लेफ़्ट और कांग्रेस के वोटों के एकमुश्त टीएमसी की झोली में जाने से यह बात साफ़ हो गई है.

एक अन्य बीजेपी नेता कहते हैं, "इस चुनाव को ममता बनाम मोदी बनाने की बजाय इसमें स्थानीय नेताओं को सामने रख कर मैदान में उतरना चाहिए था. लोकसभा चुनावों में जो फ़ॉर्मूला कामयाब होगा, ज़रूरी नहीं कि विधानसभा चुनाव में भी उससे कामयाबी मिले. इन दोनों में काफ़ी फ़र्क़ होता है."

नहीं चला दलबदलुओं का दाँव

हालाँकि ममता पर बढ़ते चौतरफ़ा हमलों से संभावित नुक़सान भाँप कर केंद्रीय नेताओं ने प्रदेश नेताओं को ममता की चोट पर टिप्पणी करने की बजाय उनकी सरकार पर हमला करने का निर्देश दिया था.

लेकिन जैसा कि विश्लेषक समीरन पाल बताते हैं कि तब तक जितना नुक़सान होना था, हो चुका था. ममता ने बीजेपी नेताओं की इन टिप्पणियों को अपने पक्ष में बेहतर तरीक़े से भुनाया.

पाल कहते हैं, "टिकटों के बँटवारे में स्थानीय लोगों को तरजीह नहीं मिलने की वजह से ही सूची जारी होने के बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में कई दिनों तक हंगामा होता रहा. इससे ज़मीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर गया और पार्टी को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा. ज़्यादातर दलबदलू नेताओं की हार से पार्टी की चुनावी रणनीति पर सवाल उठना लाज़िमी है."

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष भी यह बात मानते हैं. उनका कहना था, "इतने दलबदलुओं को टिकट देने के फ़ैसले को लोगों ने शायद स्वीकार नहीं किया. यह हमारे लिए एक सबक़ है."

प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "बंगाल की एक अलग राजनीतिक संस्कृति है. लेकिन केंद्रीय नेताओं ने इस बात को समझने की कोशिश ही नहीं की. वह लोग हर जगह उत्तर प्रदेश का फ़ॉर्मूला ही लागू कर रहे थे. एक अकेली महिला को हराने के लिए प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री समेत तमाम केंद्रीय नेता जिस तरह बंगाल के ताबड़तोड़ दौरे कर रहे थे उसका भी ग़लत संदेश गया."

मोदी-शाह की रैलियाँ नहीं आईं काम

वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "बीजेपी के केंद्रीय नेताओं को ध्रुवीकरण और जातिगत पहचान की राजनीति के सहारे जीत का भरोसा था. उसकी इस रणनीति के कारण अल्पसंख्यक वोट तो ममता के पक्ष में एकजुट हो गए लेकिन हिंदू वोटरों का उस पैमाने पर ध्रुवीकरण नहीं हो सका. नतीजतन पार्टी की नैया बीच भंवर में ही डूब गई."

उनका कहना था कि आख़िरी चार चरणों के मतदान में कोरोना के बढ़ते संक्रमण और इसके लिए चुनाव आयोग और बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराने की ममता बनर्जी की रणनीति का नुक़सान भी भगवा पार्टी को उठाना पड़ा.

विश्लेषकों का कहना है कि केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं को बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान में उतारने की बीजेपी की रणनीति पूरी तरह फ़ेल रही.

मिसाल के तौर पर फ़रवरी से अप्रैल के बीच प्रधानमंत्री ने जहाँ 17 बार बंगाल का दौरा किया, वहीं अमित शाह 38 बार यहाँ आए. उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान जैसे दावे किए और जिस तरह की आक्रामक शैली अपनाई, उसका राज्य के लोगों पर प्रतिकूल असर पड़ा और पार्टी का वोट बैंक समझे जाने वाले हिंदू वोटरों के बड़े हिस्से ने भी ममता का समर्थन किया.

पार्टी ने ग़रीबों का अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले मिथुन चक्रवर्ती को चुनाव अभियान में उतार कर टीएमसी को झटका देने की कोशिश ज़रूर की थी. लेकिन मिथुन का करिश्मा भी वोटरों को भगवा ख़ेमे में नहीं खींच सका.

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