You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पिनराई विजयन: जिन्हें केरल में लोग 'धोती पहनने वाला मोदी' कहते हैं
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जिन पिनराई विजयन ने अपने नेतृत्व में सीपीएम की अगुवाई वाले वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ़) को विधानसभा चुनाव में जीत दिलाई है, आज उनकी तुलना दो असाधारण रूप से शक्तिशाली राजनेताओं से की जा रही है.
ये नेता भारत के ही नहीं, बल्कि पूर्व सोवियत संघ के नेता भी थे.
ये अजीब ही है कि पिनराई विजयन के आलोचक ही नहीं, उनके ज़बरदस्त प्रशंसक भी उन्हें, 'धोती पहनने वाले मोदी' या 'केरल के स्टालिन' कहते हैं. यानी विजयन की तुलना पूर्व सोवियत संघ के बेहद ताक़तवर नेता जोसेफ़ स्टालिन से भी की जा रही है.
चुनाव अभियान के दौरान उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने इस बात पर ऐतराज़ भी किया था कि पिनराई विजयन को 'कैप्टेन' क्यों कहा जा रहा है? कम्युनिस्ट विचारधारा वाले किसी भी दल के लिए ऐसी उपाधियां अभिशाप से कम नहीं मानी जातीं.
सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता को अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को याद दिलाना पड़ा था कि उनके वामपंथी दल में सभी लोगों का दर्जा बराबर होता है. फिर चाहे वो पार्टी के फ़ैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य हो या फिर कोई आम ज़मीनी कार्यकर्ता.
कम्युनिस्ट पार्टी का हर सदस्य सिर्फ़ 'कॉमरेड' होता है.
केरल की जनता
लेकिन, ज़ाहिर है कि इन वरिष्ठ नेताओं की सलाह को अनसुना कर दिया गया. आख़िरकार कॉमरेड पिनराई विजयन को केवल 'कप्तान' ही तो कह रहे थे और वो कप्तान तो थे भी, और हैं भी.
आप सिर्फ़ इस एक मिसाल से ही समझ सकते हैं कि पिनराई विजयन के प्रशंसक, केरल के मुख्यमंत्री के तौर पर पाँच साल के कार्यकाल के बाद उन्हें कैसा दर्जा देते हैं. आख़िर, पर्यटन के लिहाज़ से केरल को ईश्वर का अपना देश भी तो कहा जाता है.
पिनराई विजयन के प्रशंसक हों या आलोचक, दोनों ही ये बात आपको बताएंगे कि उन्होंने केरल की जनता की भलाई के लिए कैसे कल्याणकारी उपाय किए हैं. उन्हें पेंशन और मुफ़्त राशन दिया है.
विजयन ने केरल को उन मौक़ों पर भी एक मज़बूत नेतृत्व दिया है, जब प्राकृतिक आपदाओं ने केरल पर हमला बोला. फिर चाहे निपाह वायरस हो या कोरोना वायरस का प्रकोप.
केरल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर जे. प्रभाष ने बीबीसी से कहा कि, "विजयन ने जनता को ये दिखाया है कि वो एक मज़बूत नेता ही नहीं, कर्मठ मुख्यमंत्री भी हैं. ये तो उनके व्यक्तित्व का बस एक पहलू है."
एक मज़बूत नेता का निर्माण
ये विजयन के किरदार का दूसरा पहलू है, जो उन्हें केरल के कम्युनिस्ट आंदोलन के बाक़ी नेताओं की क़तार से अलग खड़ा करता है.
और ये उनके व्यक्तित्व का दूसरा आयाम ही है, जो लोगों को ये कहने पर मजबूर करता है कि विजयन में नेतृत्व की कई वैसी ही ख़ूबियां हैं, जो हम नरेंद्र मोदी में देखते हैं या जोसेफ़ स्टालिन में देख चुके हैं.
लेकिन, उससे पहले हमें देखना होगा कि पिनराई विजयन की ये छवि कैसे बनी.
नरेंद्र मोदी की तरह ही पिनराई विजयन भी एक साधारण परिवार से आते हैं. विजयन के माता-पिता केरल के कन्नूर ज़िले के पिनराई गांव के रहने वाले थे. वो ताड़ी बनाने वाले एल्वा समुदाय से आते थे.
प्रशासन से पिनराई विजयन का पहला वास्ता तब पड़ा था जब उन्होंने फेरी का किराया बढ़ाने के ख़िलाफ़ छात्रों की एक हड़ताल आयोजित की थी. तब वो केरल स्टूडेंट फ़ेडरेशन के सदस्य थे, जो कम्युनिस्ट पार्टी के विघटन के बाद स्टूडेंट फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया में तब्दील हो गई थी.
इमरजेंसी के दौरान गिरफ़्तारी
अर्थशास्त्र की डिग्री हासिल करने के बाद पिनराई विजयन ने हथकरघा मज़दूर का भी काम किया था.
अपनी उम्र के दूसरे दशक के दौरान पिनराई विजयन और सीपीएम के कई अन्य कार्यकर्ताओं पर केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी सदस्य के पहले राजनीतिक क़त्ल का अभियुक्त बनाया गया था.
हालांकि, पिनराई विजयन को तब अदालत ने रिहा कर दिया था, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता वड्डीकल रामाकृष्णन की हत्या के इस मामले का इकलौता गवाह 1969 में अपने बयान से पलट गया था.
पिनराई विजयन की छवि एक संगठन वाले व्यक्ति की है. 1975 में जब इमरजेंसी लगी, तो विजयन को क़ैद कर लिया गया था.
आरोप है कि इस दौरान उन पर काफ़ी ज़ुल्म ढाए गए थे. केरल के एक रिटायर्ड अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर हमें बताया कि पुलिस के हाथों बुरा बर्ताव झेलने के अनुभव ने विजयन के व्यक्तित्व पर काफ़ी गहरा असर डाला.
तानाशाही बर्ताव के संकेत
मशहूर मलयालम कवि उमेश बाबू, एक ज़माने में सीपीएम के सांस्कृतिक मोर्चे के सदस्य हुआ करते थे.
उमेश बाबू ने उन दिनों की याद करते हुए बीबीसी को बताया कि, ''भारतीय लोकतांत्रिक युवा परिसंघ (DYFI) के नेता रहते हुए पिनराई विजयन बिल्कुल तानाशाही बर्ताव करते थे. वो अपनी आलोचना क़त्तई बर्दाश्त नहीं करते थे.''
लेकिन, कन्नूर ज़िले में पार्टी के सचिव के तौर पर पिनराई विजयन के काम ने उन्हें केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के बेहद वरिष्ठ नेता वीएस अच्युतानंदन का क़रीबी बना दिया. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विघटन के बाद अच्युतानंदन, सीपीएम के संस्थापकों में से एक थे.
साल 1998 में चदायन गोविंदन की अचानक मौत हो गई, जिसके बाद विजयन उनकी जगह पार्टी के राज्य सचिव बने. विजयन ने राज्य सचिव का पद रिकॉर्ड 17 बरस तक संभाला था. वो 2015 तक सीपीएम के स्टेट सेक्रेटरी रहे थे.
उमेश बाबू कहते हैं कि, "...जब विजयन राज्य सचिव बन गए, तब वीएस अच्युतानंदन को निशाना बनाया गया. उन पर पार्टी के भीतर से लगातार हमले होने लगे. हालात इतने ख़राब हो गए कि 2006 में पिनराई विजयन ने अच्युतानंदन को चुनाव लड़ने से भी रोकने की कोशिश की, जिस पर बहुत हंगामा हुआ. हालांकि पार्टी ने विजयन के इस फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया था."
'मुंडू पहनने वाले मोदी'
उमेश बाबू कहते हैं कि, "विजयन ने जो तौर तरीक़े अपनाए थे, वो स्टालिन से बिल्कुल अलग नहीं थे. जब स्टालिन सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बने थे, तो उन्होंने हर उस नेता को निकाल बाहर किया था, जो भविष्य में उनके लिए ख़तरा बन सकता था. इसके बाद वो पार्टी में सबसे प्रभावशाली नेता बन गए."
पिनराई के दोस्त से दुश्मन और फिर दुश्मन से दोस्त बने कुनाहानंदा नायर (जो बर्लिन नायर के नाम से मशहूर हैं) ने बीबीसी को बताया कि 'मैं उन्हें हमेशा ही केरल का स्टालिन कहकर बुलाता था. स्टालिन ने वामपंथ के लिए बहुत कुछ किया. पिनराई विजयन नरमदिल इंसान हैं. और इस मायने में उनकी तुलना स्टालिन से की जा सकती है. मेरे कहने का मतलब है कि ये तुलना सकारात्मक है, नकारात्मक नहीं.'
हालांकि, केरल के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बीआरपी भास्कर की राय बिल्कुल अलग है.
उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया कि, "विजयन के ऊपर आरोप ये है कि वो मुंडू पहनने वाले मोदी हैं (मलयालम में धोती को मुंडू कहते हैं) क्योंकि वो तानाशाही रवैये वाले इंसान हैं."
विजयन ने पार्टी का विस्तार किया
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि विजयन ने पार्टी का आधार बढ़ाया है. सीपीएम को केरल में हमेशा ही 'हिंदू पार्टी' माना जाता रहा था.
ईसाई और मुसलमान आम तौर पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ़) को तरजीह देते आए हैं, जिसमें इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ठीक उसी तरह एक बड़ा साझीदार है, जैसे केरल कांग्रेस (मणि) जो ईसाई समुदाय के हितों की नुमाइंदगी करती है.
विजयन ने सीपीएम की 'हिंदू पार्टी' होने की छवि को उस समय बदला जब केरल की राजनीति बेहद अहम मोड़ पर खड़ी थी. एक समय ऐसा था जब कहा जाता था कि सीपीएम अपने सदस्य गंवा रही है, लेकिन उसकी सदस्यता में कमी नहीं आ रही थी.
इसकी वजह ये थी कि पार्टी मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों को अपने साथ जोड़कर नए सदस्य बना रही थी.
भास्कर कहते हैं, "विजयन ने ये काम बड़ी चतुराई से किया. अब सीपीएम पुराने नेताओं की पार्टी नहीं रह गई थी. पार्टी के नए सदस्य उनके आभारी हैं. वो एक रणनीतिकार हैं. इसमें कोई दो राय नहीं. इस मोर्चे पर हम विजयन और मोदी में कई समानताएं देख सकते हैं."
समाजवादी बाज़ारवादी पार्टी
विजयन ने पार्टी के लिए फ़ंड जुटाने के लिए, बड़ी फ़ुर्ती से 'चीन वाली लाइन' पकड़ ली थी.
भास्कर कहते हैं कि, "कैराली टीवी चैनल इसका बेहतरीन उदाहरण है. इसे केवल एक साल में परिकल्पना से हक़ीक़त में तब्दील कर दिया गया था और इसके लिए खाड़ी देशों में रहने वाले मलयाली लोगों की मदद ली गई थी."
विजयन ने उस वक़्त क्राउड फ़ंडिंग की मदद ली थी, जब ये भारत के उद्योग जगत के बीच फ़ैशनेबल नहीं हुई थी. चीन की समाजवादी बाज़ारवादी अर्थव्यवस्था की तरह, विजयन ने भी एक समाजवादी बाज़ारवादी पार्टी बनाई है.
मुख्यमंत्री की मीडिया सलाहकार और पुरस्कार विजेता कवयित्री डॉक्टर प्रभा वर्मा ने बीबीसी हिंदी को बताया कि, "विजयन जो भी फ़ैसले लेते हैं, वो उसे हमेशा पार्टी की नीतियों को ध्यान में रखकर लेते हैं. वो पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं और पार्टी लाइन से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं."
पिनराई विजयन और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के बीच लगातार चली खींच-तान एक वक़्त ऐसे मोड़ पर पहुँच गई कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने दोनों ही नेताओं को कुछ समय के लिए पोलित ब्यूरो से बाहर कर दिया था.
अच्युतानंदन भले ही बेहद लोकप्रिय ज़मीनी नेता रहे हों, लेकिन उन्हें अपने हर फ़ैसले के लिए पार्टी में उनके बॉस विजयन की सहमति लेनी पड़ती थी.
2016 के विधानसभा चुनाव के बाद सीपीएम के केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री पद के लिए विजयन को तरजीह दी क्यंकि वो अच्युतानंदन से उम्र में बीस साल कम थे, हालांकि तब भी उनकी उम्र 72 बरस थी.
हर संकट में खेवनहार
लेकिन, मुख्यमंत्री बनने के बाद विजयन ने ख़ुद को एक कुशल प्रशासक के तौर पर स्थापित कर लिया. जिन लोगों को शुरुआत में ऐसा लगता था कि वो, मुख्यमंत्री के बजाय पार्टी के सचिव जैसा बर्ताव कर रहे हैं, उन लोगों ने भी विजयन के बारे में अपनी राय बहुत जल्द बदल ली.
केरल पर जब भी किसी क़ुदरती आपदा ने हमला किया, तो विजयन के कुशल प्रशासक होने का एक नया आयाम देखने को मिला. इसी वजह से लोगों ने विजयन को 'कप्तान' कहना शुरू कर दिया.
फिर चाहे समुद्री तूफ़ान हो जिसने मछुआरों को तबाह कर दिया या फिर 2018 में आई भयंकर बाढ़ और 2019 में निपाह वायरस का प्रकोप या फिर लंबे समय से क़हर ढा रही कोविड-19 की महामारी. मुख्यमंत्री के रूप में विजयन की हमेशा हालात पर मज़बूत पकड़ बनी रही.
साल 2018 की बाढ़ के दौरान उन्होंने फ़ैसले लेने की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण करके तमाम वर्गों के लोगों को एकजुट करके मज़बूती से उस आपदा से निपटने के लिए इकट्ठा किया. तब विजयन ने पंचायत स्तर के अधिकारियों को भी निर्णय लेने के अधिकार दे दिए थे.
विजयन के कार्यालय के अधिकारियों ने मुझे केरल की बाढ़ के दौरान बताया था कि मुख्यमंत्री सुबह नौ बजे दफ़्तर आ जाते थे और रात के डेढ़ बजे तक अधिकारियों के साथ काम में जुटे रहते थे. सामान्य दिनों में भी वो सुबह नौ बजे से लेकर रात के 10 साढ़े दस बजे तक काम करते हैं.
व्यक्तित्व और लोकप्रियता
हर संकट के दौरान हर दिन विजयन ख़ुद मीडिया को जानकारी देने को तरजीह देते हैं. इससे उनके व्यक्तित्व और लोकप्रियता में और निखार आया है.
एक पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि, "लोगों का ख़ुद पर विश्वास बढ़ा, क्योंकि उन्हें ये महसूस किया कि उनके ऊपर एक भरोसेमंद आदमी है, हालात जिसके नियंत्रण में हैं. उन्हें एक निर्णायक नेता के तौर पर जाना जाता है."
लेकिन, ये सबरीमाला का विवाद था-जब स्वामी अयप्पा के मंदिर में माहवारी वाली महिलाओं को जाने की सुप्रीम कोर्ट ने इजाज़त दी थी-जिसमें विजयन लड़खड़ा गए थे.
एक पूर्व अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि, 'ये पूरा विवाद पुलिस का गढ़ा हुआ था. तब विजयन सिर्फ़ पुलिस अधिकारियों की सलाह पर चले. उन्हें चाहिए था कि वो ऊमेन चांडी (कांग्रेस के नेता) की तरह सर्वदलीय बैठक बुलाते और सारे विवाद की आग को ठंडा कर देते.'
केरल के एक और पूर्व अधिकारी कहते हैं, "हम जैसे कई लोग ऐसे हैं, जो ये मानते हैं कि विजयन स्टॉकहोम सिंड्रोम के शिकार हैं. इसका कारण ये है कि, इमरजेंसी के दौरान उन्होंने बहुत टॉर्चर झेला था. पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरन को पता था कि पुलिस का इस्तेमाल कैसे करना है. लेकिन विजयन के मामले में स्थिति इसके उलट है. जब भी किसी मामले में पुलिस जुड़ जाती है, तो वो अतार्किक हो जाते हैं."
सामाजिक सुरक्षा पर ज़ोर
विजयन पर पुलिस अधिकारियों का बहुत असर होने की सोच को छोड़ दें, तो विजयन के स्वास्थ्य, मूलभूत ढांचे और सामाजिक सुरक्षा पर ज़ोर देने के कारण उन्हें बहुत लोकप्रिय बनाया है.
इसके अलावा, विजयन की सख़्त छवि के चलते अक्सर अधिकारी ही नहीं राजनेता भी उनके आगे मुंह खोलने से डरते हैं.
लेकिन, कुछ अधिकारी निजी तौर पर ये स्वीकार करते हैं कि, "उन्होंने कभी भी ईमानदार लोगों को ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कहा जो ग़लत है. आम धारणा यही है कि वो किसी की सलाह नहीं लेते हैं. लेकिन, ये सच नहीं है. वो लोगों की बातें सुनते हैं, हालांकि फ़ैसले वो ख़ुद लेते हैं."
हालांकि, पिनराई विजयन की निर्णय लेने की क्षमता को लेकर प्रोफ़ेसर जे. प्रभाष की राय बिल्कुल अलग है.
प्रोफ़ेसर प्रभाष कहते हैं, "विजयन अपने आप में एक पावर सेंटर बन गए हैं. ये बात कम्युनिस्ट पार्टी की सामूहिक नेतृत्व की परिकल्पना के बिल्कुल विपरीत है. अब अगर ऐसा है तो सीपीएम और दूसरी पार्टियों में क्या अंतर रह गया? कम-ओ-बेश यही हालात हमें बीजेपी में भी देखने को मिलते हैं. फ़र्क़ बस इतना है कि केरल में बीजेपी की तरह फ़ैसला लेने वाले दो लोग नहीं, एक ही व्यक्ति है."
इसके अलावा प्रोफ़ेसर प्रभाष कहते हैं कि 'सामाजिक कल्याण एक सुरक्षा घेरा है. लेकिन जहां तक किसी समाज की बात है तो उसकी बुनियादी ज़रूरत सामाजिक परिवर्तन है. मुझे नहीं लगता है कि विजयन की सरकार सामाजिक परिवर्तन के इम्तिहान में पास होने लायक़ मानी जा सकती है. विजयन ने एक ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रह हैं, जो परिवर्तन लाने के बजाय बस हालात के प्रबंधन में जुटी है.'
सवाल ये है कि: क्या पिनराई विजयन अपने दूसरे कार्यकाल में अपनी पार्टी के भविष्य के लाभ के लिए अपने तरीक़ों में बदलाव लाएंगे?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)