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कोरोना महामारी और चुनाव आयोग के तौर-तरीक़ों पर उठते गंभीर सवाल
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कोविड प्रोटोकॉल का पालन करवाना चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी नहीं थी? क्या इन हालात से बेहतर तरीक़े से निबटा जा सकता था?
ऐसे कई सवाल हैं जो लगातार उठ रहे हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने रैलियों पर तब जाकर रोक लगाई, जब भारी आलोचना के बाद बीजेपी ने अपना चुनाव प्रचार बंद करने का ऐलान कर दिया.
27 अप्रैल को मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि भारत का चुनाव आयोग देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए ज़िम्मेदार है और इसके अधिकारियों पर कोविड-19 के मानकों का पालन किए बिना राजनीतिक दलों को बड़े पैमाने पर रैलियों की अनुमति देने के लिए संभवत: हत्या का मुक़दमा चलाया जाना चाहिए.
इस कड़ी टिपण्णी के एक दिन बाद, चुनाव आयोग ने आदेश जारी किया कि 2 मई को होने वाली मतगणना के बाद किसी भी विजय जुलूस की अनुमति नहीं होगी और जीतने वाले उम्मीदवार या उसके अधिकृत प्रतिनिधि को रिटर्निंग अफसर से चुनाव प्रमाणपत्र लेने जाते हुए दो से अधिक लोगों को साथ ले जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
साथ ही, चनाव आयोग ने यह कहकर भी अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि 2005 के आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत निर्देशों को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और अन्य अधिसूचित अधिकारियों की है, न कि चुनाव आयोग की.
आयोग ने यह भी कहा उसने हमेशा ज़ोर दिया है कि चुनावी जनसभाओं में कोविड से संबंधी दिशा निर्देशों का पालन करवाना राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है और किसी भी अवस्था में चुनाव आयोग कोविड सम्बंधित दिशा निर्देशों को लागू करवाने का काम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अपने हाथों में नहीं लेता है.
पिछले साल हुए बिहार चुनाव का उदाहरण देते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि वो चुनावी प्रक्रिया आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के लॉकडाउन के बावजूद पूरी कर ली गई थी.
क्या कहते हैं चुनाव आयोग के पुराने अधिकारी
बीबीसी ने इस मामले की गहराई को समझने के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों से बात करने की कोशिश की. इनमें से पाँच ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बात की.
केवल एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने खुलकर बात की, उन्होंने कहा कि उनकी बातों को किसी भी तरह मद्रास उच्च न्यायालय की बात पर टिप्पणी न समझा जाए.
रावत ने कहा, "मेरी नज़र में यह गंभीर मुद्दा नहीं है. पूरी महामारी में सारे विश्व और भारत में कई जगह चुनाव हुए और इस वजह से एक भी कोविड का केस नहीं सामने आया. हमारे देश में भी इन चुनावों के शुरू होने से पहले महाराष्ट्र में कोविड मामलों की भरमार थी जबकि वहां न चुनाव थे, न ही कुम्भ मेला था. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे कई राज्य कोविड की दूसरी लहर में सबसे आगे थे, वहां तो कोई चुनाव नहीं थे. जितने मामले पहले महराष्ट्र में आ रहे थे, उतने तो पश्चिम बंगाल में अभी भी नहीं आ रहे हैं."
रावत के अनुसार चुनाव आयोग ने कोविड प्रोटोकॉल निर्धारित किया है और उसका पालन कराने की पूरी व्यवस्था की है और यही कारण है कि बिहार चुनाव के बाद वहाँ मामले नहीं बढ़े. वे कहते हैं, "दूसरी लहर तो हर जगह आनी ही थी. जब महाराष्ट्र से या अन्य जगहों से प्रवासी मज़दूर पलायन करके वापस अपने राज्यों में जा रहे हैं तो वे तो संक्रमण लेकर आएंगे ही. इसे चुनावों से कैसे जोड़ा जा सकता है?"
एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "जनता और नेताओं को टिप्पणी करने का अधिकार है और वे बड़े सख्त शब्दों में टिप्पणी कर रहे हैं. उच्च न्यायालय ने कड़े शब्दों में आलोचना की है. हमारे समय में ऐसा कभी नहीं हुआ. न सुप्रीम कोर्ट और न ही चुनाव आयोग ने भी कभी लक्ष्मण रेखा को पार किया. जो कुछ भी है सबके सामने है. कई वर्ष पहले इन्हीं राज्यों के चुनाव एक दिन में करवाए गए थे जबकि उस समय भी असम में हिंसा का ख़तरा था. अब इस विषय में किसी की दिलचस्पी नहीं है कि चुनाव कैसे करवाए गए. अब सबका ध्यान नतीजों पर है."
चुनाव आयुक्त के पद से रिटायर हो चुके एक अधिकारी कहते हैं, "चुनाव आयोग सक्रिय होने की जगह प्रतिक्रिया में काम करने लगा है. करोना महामारी के वक़्त जिस तरह चुनाव आयोग ने कार्य किया है, उसके बाद उसकी छवि को बहाल करने के लिए बड़ी मेहनत करनी होगी."
उन्होंने यह भी कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि चुनाव आयोग की कई कार्रवाइयों को निष्पक्ष नहीं माना जा रहा है.
वे कहते हैं, "चुनाव आयोग ने विजय जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन काउंटिंग हॉल में होने वाली गिनती का क्या? अंतत: हम सभी जानते हैं कि बंद जगहें वास्तव में ख़तरनाक हैं. यदि आप यह सुनिश्चित करते हैं कि हॉल के अंदर केवल नेगेटिव रिपोर्ट वाले लोगों को अनुमति है, तो यह एक बेहतर सुरक्षा होगी. मतगणना के लिए, आप यह अनिवार्य क्यों नहीं कर सकते कि मतगणना हॉल में प्रवेश करने से पहले सभी लोगों को निगेटिव रिपोर्ट दिखानी होगी? मतगणना हॉल में प्रवेश करने वाले लगभग 99 प्रतिशत लोग सरकारी कर्मचारी हैं और आरटी-पीसीआर परीक्षण कराना उनके लिए बहुत आसान है. गिनती के एजेंट भी इसे करवा सकते हैं."
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि जब पिछले साल कोविड के हालत बिगड़ने लगे तो तुरंत यह मुद्दा चुनाव आयोग में उठा कि इस महामारी में चुनाव कैसे कराए जाएँ. एक अधिकारी कहते हैं, "उस समय दक्षिण कोरिया एक शानदार मिसाल था जिसने महामारी के दौरान भी चुनाव कराए थे. हमने कहा कि हमें यह देखना चाहिए कि विभिन्न देशों में कैसे चुनाव प्रबंधन किया जा रहा है और क्या उन तरीक़ों में से कोई हमारे लिए कारगर हो सकता है."
पिछले साल चुनाव आयोग के अधिकारियों ने आयोग को यह सलाह दी कि अगर वो एक महामारी में चुनाव कराने के लिए कुछ बदलाव करना चाहता है तो इसका परीक्षण छोटे चुनावों--जैसे राज्यसभा या राज्यों के उपचुनाव--से किया जा सकता है. अधिकारी कहते हैं कि इससे यह समझ आ जाता कि सुरक्षित वातावरण में प्रबंधन कर पाना मुमकिन है या नहीं. लेकिन इन छोटे चुनावों को परीक्षण के तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय सीधे बिहार विधानसभा चुनाव करवाया गया.
अधिकारी कहते हैं कि बिहार चुनाव के बाद लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि महामारी की आशंका बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त की जा रही है क्योंकि बिहार में कोरोना मामलों में कोई तेजी नहीं आई.
विरोध
एक अन्य रिटायर्ड चुनाव आयुक्त कहते हैं कि पिछले साल जब एक राजनीतिक दल (बीजेपी) ने बिहार चुनाव से कई हफ्ते पहले एक बड़ी वर्चुअल रैली की, तो बहुत से राजनीतिक दलों ने आयोग को लिखित में इस पर विरोध जताया और कहा कि कई दलों के पास वर्चुअल रैली करने के लिए संसाधन नहीं हैं.
विरोध करने वाले दलों की चिंता ये थी कि वर्चुअल रैलियों के दौरान होने वाले ख़र्च का हिसाब रखना मुश्किल है. अधिकारी कहते हैं कि चुनाव आयोग को यह दिशा-निर्देश देने चाहिए थे वर्चुअल रैलियों पर किए गए ख़र्च का हिसाब कैसे रखा जाएगा?
चुनाव के आयोग के कई पूर्व आयुक्त मानते हैं कि वर्चुअल रैलियों को इन पाँच राज्यों के चुनवों में बहुत प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता था.
एक और बात जिस पर चुनाव आयोग कार्रवाई कर सकता था, वो चुनाव प्रचार के दिन घटाने की थी. पूर्व चुनाव आयुक्त नाम न लिखने की शर्त पर कहते हैं, "जनप्रतिनिधित्व अधिनियम कहता है कि चुनाव प्रचार के लिए आपके पास न्यूनतम 14 दिन की अवधि होनी चाहिए. चुनावी ख़र्च इतना बड़ा मुद्दा है, जो हर समय उठाया जाता है और हम इस बात से भी अवगत हैं कि लोग बहुत सारा पैसा ख़र्च करते हैं, जिसका कोई हिसाब भी नहीं होता, तो आयोग के लिए चुनाव प्रचार की अवधि को कम करने का यह एक अच्छा अवसर था जिसे गँवा दिया गया."
कई पुर्व अधिकारी मानते हैं कि महामारी के कारण चुनावों को कुछ समय के लिए टाला भी जा सकता था. एक पूर्व अधिकारी ने कहा, "अगर स्थिति ऐसी है कि लोगों के जान पर ख़तरे की आशंका है, तो आयोग कह सकता है कि हम चुनाव कराने की स्थिति में नहीं हैं. लेकिन चुनाव आयोग के निष्पक्ष होने के लिए, यह मूल्यांकन स्वतंत्र रूप से आयोग नहीं कर सकता है और इसमें राज्य सरकारों के परामर्श की ज़रूरत है."
वे कहते हैं कि अतीत के उदाहरण हैं जब 2002 में गुजरात में चुनाव आयोग ने दंगों के बाद यह कहा था कि वो गुजरात चुनाव कराने की स्थिति में नहीं है.
एक अधिकारी कहते हैं, "मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह की अगुवाई में आयोग की टीम ने कहा था कि हम चुनाव नहीं करा सकते क्योंकि हमें लगता है कि कई मतदाताओं को अपना मताधिकार इस्तेमाल करने का मौका नहीं मिलेगा. इस फ़ैसले के खिलाफ उस वक़्त की गुजरात सरकार सर्वोच्च न्यायालय गई और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया, पर अदालत ने आयोग का समर्थन किया."
अधिकारी यह भी कहते हैं कि चुनाव आयोग एक सदन के कार्यकाल की समाप्ति के 180 दिनों के भीतर चुनाव कराने के लिए बाध्य है, इसलिए ऐसे हालात में इस 180 दिनों की अवधि का उपयोग भी किया जा सकता था.
पश्चिम बंगाल में कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आख़िर के चरणों को एक साथ जोड़कर मतदान कराने की माँग रखी थी. क्या यह संभव था?
इस पर एक पूर्व चुनाव आयुक्त कहते हैं, "आयोग को केवल एक नई अधिसूचना जारी करनी पड़ती. आयोग चुनाव की तारीख़ बदल सकता है और छठे और सातवें चरणों को 8वें चरण के साथ जोड़ा जा सकता था. जहाँ चाह, वहाँ राह वाली बात है. यह इतना ही सरल है. चुनावों के संचालन के दौरान, आयोग के पास बहुत से अधिकार और शक्तियाँ होती हैं."
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