क्या भारत के वैक्सीन निर्माता उतनी वैक्सीन बना पाएँगे, जितनी ज़रूरत है?

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- Author, श्रृति मेनन
- पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक
तेज़ी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के मामलों के बीच एक ओर जहां भारत अधिक से अधिक लोगों को वैक्सीन देने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के मुख्य वैक्सीन निर्माता घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जूझ रहे हैं.
भारत सरकार ने अपने वैक्सीन निर्माताओं को उत्पादन में तेज़ी लाने के लिए आर्थिक मदद की पेशकश की है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया और भारत बायोटेक भारत के दो मुख्य वैक्सीन निर्माता हैं जिन्हें सरकार से क्रमश: 40 करोड़ डॉलर (यानी क़रीब तीन हज़ार करोड़) और 21 करोड़ डॉलर ( यानी क़रीब 1586 करोड़) मिलेंगे.
ये दोनों वैक्सीन निर्माता कोविशील्ड और कोवैक्सीन नामक वैक्सीन बनाते हैं जिनका फ़िलहाल इस्तेमाल किया जा रहा है.
भारत ने मार्च में वैक्सीन के बड़े पैमाने पर निर्यात पर रोक लगा दी थी ताकि घरेलू मोर्चें पर टीकाकरण कार्यक्रम की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके.
हालांकि कुछ देशों को अनुदान के रूप में वैक्सीन अभी भी दी जा रही है. वैश्विक स्तर पर वैक्सीन साझा करने की योजना के तहत भी भारत ने मदद करने का वादा किया है.
भारत ने अब विदेशों में बनी फ़ाइज़र, मोडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन के आयात को भी मंज़ूरी दे दी है.
लेकिन इनमें से किसी भी वैक्सीन निर्माता ने अब तक भारत में 'इमरजेंसी यूज़ लाइसेंस' के लिए आवेदन नहीं किया है.

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हालांकि भारत के कई राज्यों में वैक्सीन की कमी की ख़बरों के बीच भारत के ड्रग कंट्रोलर ने रूस की स्पूतनिक V को आपात इस्तेमाल के लिए मंज़ूरी दी है.
स्पूतनिक V के शोध और विकास के लिए आर्थिक मदद देने वाले रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फ़ंड के मुताबिक़, पाँच फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियां इसे बनाएंगी और भारत में सालाना 8.5 करोड़ वैक्सीन डोज़ तैयार करेगी.
ये डोज़ घरेलू बाज़ार और निर्यात दोनों के लिए होंगे, हालांकि इनका उत्पादन अभी आरंभ नहीं हुआ है.
वैक्सीन निर्माताओं की दिक़्क़तें

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नोवावैक्स और एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन बनाने वाले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने कच्चे माल की कमी की मार्च में चेतावनी दी थी और इसके लिए कुछ ख़ास चीज़ों पर अमरीकी निर्यात पाबंदी को ज़िम्मेदार बताया था.
पिछले ही हफ़्ते सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अदार पूनावाला ने इस सिलसिले में अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन से वैक्सीन बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर निर्यात पाबंदी ख़त्म करने की अपील की थी.
जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन बनाने वाली भारतीय फ़र्म 'बायोलॉजिकल ई' ने भी ज़रूरी कच्चे माल की कमी की आशंका से वैक्सीन उत्पादन पर बुरा असर पड़ने के संबंध में चिंता जताई थी.
अमरीका कम आपूर्ति क्यों कर रहा है?
1950 के दशक में बना डिफ़ेंस प्रोडक्शन एक्ट (डीपीए) अमरीकी राष्ट्रपति को आपात स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था और घरेलू हालात को बेहतर बनाने के लिए कई शक्तियां देता है.
अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसी क़ानून का इस्तेमाल करते हुए वैक्सीन बनाने में कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होने वाली कई चीज़ों के निर्यात पर रोक लगा दी है.
वैक्सीन बनाने वाली दुनियाभर की कंपनियों के प्रतिनिधियों ने मार्च की शुरुआत में ही अमरीकी राष्ट्रपति के इस फ़ैसले पर चिंता जताई थी कि इसकी वजह से वैक्सीन के वैश्विक उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है.
लीवरपूल स्थित जॉन मोरेस यूनिवर्सिटी में वैक्सीन एक्सपर्ट डॉक्टर सारा शिफ़लिंग का कहना है कि 'फ़ार्मास्यूटिक सप्लाई चेन' बहुत जटिल है.
वो कहती हैं, ''जब माँग बहुत अधिक है, नए आपूर्तिकर्ता बाक़ी उद्योगों की तरह बहुत तेज़ी से माँग को पूरा नहीं कर सकते हैं. नए आपूर्तिकर्ताओं पर उतना भरोसा भी नहीं किया जाएगा.''
साथ ही वो कहती हैं, ''कच्चे माल की आपूर्ति में कमी को कुछ हद तक रोका नहीं जा सकता जहां किसी उत्पाद की पूरी दुनिया में माँग अचानक बढ़ गई हो.''
वैक्सीन उत्पादन पर असर

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इस साल जनवरी से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से उत्पादित कोविशील्ड के 17.5 करोड़ डोज़ घरेलू टीकाकरण में इस्तेमाल किए जा चुके हैं या उसका निर्यात किया जा चुका है.
कंपनी का दावा है कि वो हर महीने वैक्सीन के 6-7 करोड़ डोज़ तैयार कर रही है. इनमें अमरीका में विकसित हुई नोवावैक्स के डोज़ भी शामिल हैं जिसे भारत में इस्तेमाल के लिए अभी लाइसेंस नहीं मिला है.
एक महीने के भीतर 10 करोड़ डोज़ तैयार करने का लक्ष्य अब मार्च से जून तक पहुँच गया है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने पिछले साल वादा किया था कि वो विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैक्सीन प्रोग्राम के लिए कोवैक्स के 20 करोड़ डोज़ देगा. लेकिन वो अभी तक सिर्फ़ तीन करोड़ डोज़ ही दे पाया है.
कोवैक्स एग्रीमेंट के तहत भारत को वैक्सीन के अभी तक एक करोड़ डोज़ मिले हैं. ग्लोबल वैक्सीन एलायंस (गावी) का कहना है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया समझौते के मुताबिक़ वैक्सीन देने के लिए बाध्य है.
गावी ने चेतावनी भी दी है कि कोवैक्स में शामिल देशों को वैक्सीन मिलने में देर हो सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के 90 करोड़ और नोवावैक्स के 14.5 करोड़ डोज़ देने के लिए द्विपक्षीय कारोबारी समझौते भी किए हैं.
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