सर्बानंद सोनोवाल: हार के बाद दांव पर था राजनीतिक करियर, बीजेपी में मिली सीएम की कुर्सी

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, डिब्रूगढ़ से, बीबीसी हिंदी के लिए
16 मई 2009 और 24 मई 2016. यह वो दो तारीख़ें हैं जिनका सीधा ताल्लुक असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल से है.
दरअसल 16 मई 2009 के दिन सर्बानंद डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे. उस समय वे असम की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी एजीपी अर्थात असम गण परिषद के नेता थे. एजीपी ने उस चुनाव में असम की कुल 14 लोकसभा सीटों में से केवल एक सीट जीती थी.
साल 2001 के बाद प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टी की राजनीतिक ज़मीन तेज़ी से खिसकती जा रही थी. सर्बानंद के लिए वो हार उनके आगे के राजनीतिक भविष्य को तय करने से जुड़ी हुई थी. उस समय पार्टी नेतृत्व के साथ सर्बानंद के मतभेदों की ख़बर मीडिया में सुर्खियां बनने लगी थी.
एजीपी के चुनावी प्रदर्शन से ऐसा नहीं लग रहा था कि यह क्षेत्रीय पार्टी फिर कभी शासन में आ पाएगी. सर्बानंद भी पार्टी में अलग-थलग पड़ने लगे थे और उनके पास कोई बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं थी.
ये वो दौर था जब प्रदेश की सियासत में तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और उनकी कांग्रेस सरकार में नंबर टू रहे हिमंत बिस्व सरमा की तूती बोलती थी.
उस समय असम की राजनीति को कवर करने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों को यह कहते हुए सुना था कि क्षेत्रीय पार्टी में सर्बानंद का राजनीतिक करियर अब आगे बढ़ना मुश्किल है.

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बीजेपी में शामिल हुए
पत्रकारों के अपने तर्क थे क्योंकि जिस एजीपी ने साल 1985 के बाद प्रदेश में दो बार शासन किया था, उस पार्टी के कई बड़े नेता यहाँ की राजनीति में गुमनाम होते जा रहे थे. प्रदेश में लगातार 15 साल कांग्रेस का शासन भी इसका एक बड़ा कारण था.
लेकिन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आसू से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने वाले तेज़तर्रार सर्बानंद कुछ और ही योजना बना रहे थे.
सर्बानंद ने जनवरी 2011 में एजीपी के भीतर सभी कार्यकारी पदों से इस्तीफ़ा देते हुए पार्टी छोड़ दी और उसके ठीक कुछ दिन बाद 8 फ़रवरी को तत्कालीन बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी तथा कई वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में वे बीजेपी में शामिल हो गए.
यह दिन उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ और 24 मई 2016 को वे असम में पहली बार शासन में आई बीजेपी सरकार के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए.

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गाँव से प्रदेश की राजनीति के सबसे बड़े पद तक का सफ़र
59 साल के सर्बानंद का जन्म 31 अक्तूबर 1961 को असम में डिब्रूगढ़ ज़िले के एक छोटे से मोलोक गाँव में हुआ था.
उनकी बड़ी बहन डालिमी सैकिया ने बीबीसी को बताया कि आठ भाई-बहनों में सर्बानंद सबसे छोटे हैं. उनके पिता जिबेश्वर सोनोवाल चबुआ बोकदुम पंचायत में सचिव थे और माँ दिनेश्वरी सोनोवाल एक गृहिणी थीं.
सर्बानंद ने कुछ हद तक समाज सेवा अपने पिता से ही सीखी थी. दरअसल मोलोक गाँव में बाढ़ आती थी और वहाँ के लोग अपनी तकलीफ़ सुनाने उनके पिता के पास आते थे और इसका सर्बानंद पर काफी असर पड़ा.
कक्षा छह तक की शुरुआती पढ़ाई गाँव के प्राथमिक स्कूल से करने के बाद बड़े भाई मिस्टा प्रसाद सोनोवाल उन्हें अपने पास डिब्रूगढ़ ले आए और आगे की पढ़ाई यहाँ के डॉन बोस्को स्कूल से पूरी की. दरअसल सर्बानंद जब महज 15 साल के थे उस समय उनके पिता का देहांत हो गया था.
इसलिए डिब्रूगढ़ स्टेट बैंक में नौकरी करने वाले उनके सबसे बड़े भाई मिस्टा प्रसाद ने ही सभी पाँच भाइयों को पढ़ाया. उस दौरान डॉन बोस्को स्कूल में सर्बानंद के और दो भाई पढ़ा करते थे.
सर्बानंद के बड़े भाई नरेश्वर सोनोवाल ने बीबीसी को बताया, "अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद सर्बानंद जब कॉलेज पहुंचे उस दौरान राज्य में असम आंदोलन की शुरुआत हुई थी. सर्बानंद को स्कूली दिनों से खेल और बॉडी बिल्डिंग का शौक था. उन्होंने कानोई कॉलेज में एक बार मिस्टर डिब्रूगढ़ स्ट्रॉन्गमैन का ख़िताब भी जीता था. वे कॉलेज के छात्रों के बीच लोकप्रिय थे. इस तरह वे अपने दोस्तों और कुछ शिक्षकों के प्रोत्साहन से छात्र आंदोलन में शामिल हो गए."

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पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री
असम में बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ के ख़िलाफ़ आसू के नेतृत्व में साल 1979 से छह साल तक चला असम आंदोलन आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था.
यही वजह थी कि साल 1985 में भारत सरकार और आंदोलनकारी छात्र नेताओं के बीच हुए असम समझौते के बाद आसू से आए प्रफुल्ल कुमार महंत महज 33 साल की उम्र में असम के मुख्यमंत्री बन गए थे और उनके कई साथी सरकार में मंत्री बनाए गए. आसू ने साल 1985 में असम गण परिषद को जन्म दिया था.
लिहाजा आसू में रहकर छात्र राजनीति करने वाले कई युवाओं ने उस समय प्रदेश का बड़ा नेता बनने के सपने संजोए थे, उनमें सर्बानंद भी एक थे.
डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के तहत हनुमानबक्श कानोई कॉलेज से अंग्रेज़ी ऑनर्स के साथ अपनी स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद इसी विश्वविद्यालय से उन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त की. इसके अलावा सर्बानंद ने गौहाटी विश्वविद्यालय से संचार और पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री भी ली है.
उनके बड़े भाई नरेश्वर सोनोवाल कहते हैं, "डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हमें इस बात का अहसास हो गया था कि सर्बानंद राजनीति के क्षेत्र में अपना करियर बनाएंगे. वे आसू में शामिल हो गए थे. लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि वे एक दिन असम के मुख्यमंत्री बन जाएंगे. दरअसल वे अपने छात्र जीवन के समय से ही कई सामाजिक मुद्दों को लेकर व्यस्त हो गए थे. डिब्रूगढ़ में रहते हुए भी कई बार लंबे समय तक हमारी मुलाक़ात नहीं होती थी."

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मोरान विधानसभा से पहला चुनाव
सर्बानंद की असली राजनीतिक यात्रा साल 1992 में शुरू हुई जब वे आसू के अध्यक्ष बने. इस तरह वे साल 1999 तक आसू प्रमुख रहे और घुसपैठ के मसले पर बेबाकी से अपनी बात कहते रहे. अपने छात्र जीवन से ही सोनोवाल अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर मुखर रहे हैं.
यह वो समय था जब सर्बानंद खुद को असमिया समुदाय के नेता के तौर पर स्थापित कर रहे थे. उनकी इसी बेबाकी के कारण पूर्वोत्तर राज्यों के छात्र संगठनों ने उन्हें साल 1996 से साल 2000 तक नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष तौर पर चुना.
असल में आसू से क़रीब सभी छात्र नेताओं का अगला पड़ाव क्षेत्रीय पार्टी एजीपी ही थी. लिहाजा साल 2001 में सर्बानंद एजीपी में शामिल हो गए और उसी साल पार्टी ने उन्हें मोरान विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया. पहली बार वे महज 850 वोटों से विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे.

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तीन साल असम विधानसभा के सदस्य के तौर पर काम करने के बाद एजीपी ने उन्हें साल 2004 में डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट से खड़ा किया और वे जीतकर संसद पहुँचे.
असम की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहे समीर के. पुरकायस्थ कहते हैं, "असल में लोकसभा पहुँचने से सर्बानंद को आगे अपने राजनीतिक करियर को संवारने में काफी फायदा मिला. वहीं उनकी मुलाक़ात अरुण जेटली समेत कई शीर्ष बीजेपी नेताओं से हुई."
"हमेशा चेहरे पर मुस्कान और उनका शांत स्वभाव ख़ासकर जेटली को बहुत पसंद आया. उस दौरान दोनों जगह सत्ता में काँग्रेस थी और एजीपी सांसद एनडीए के साथ थे. लिहाजा सर्बानंद बीजेपी नेताओं के क़रीब आ गए. इसका फ़ायदा उन्हें साल 2011 में मिला जब उन्होंने बीजेपी में शामिल होने का निर्णय लिया."
"उनके पुराने रिश्तों की वजह से बीजेपी ने पार्टी में शामिल होते ही उन्हें तत्काल बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में नियुक्त कर दिया. इसके ठीक एक साल बाद साल 2012 में सर्बानंद को पार्टी ने असम प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष बना दिया."

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नरेंद्र मोदी के पीएम बनते ही सर्बानंद के आए अच्छे दिन
जब राजनाथ सिंह जनवरी 2013 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उसी साल 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया, उस चुनाव में सर्बानंद ने असम में बीजेपी के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का नेतृत्व किया था और असम में 7 सीटें जीती थी.
वे खुद लखीमपुर सीट से सांसद चुने गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर्बानंद को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करते हुए खेल और युवा मामलों का मंत्री बनाया.
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "असम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली पसंद सर्बानंद सोनोवाल ही हैं. क्योंकि सोनोवाल मोदी के प्रति शुरू से बहुत वफादार रहे हैं. मौजूदा राजनीति में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं. पीएम मोदी सर्बानंद पर काफी भरोसा करते हैं और इसका एक कारण उनकी साफ़-सुथरी छवि भी है."
"यही कारण था कि बीजेपी ने सर्बानंद को नवंबर 2015 में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था. पीएम मोदी एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो पहली बार सर्बानंद के चुनावी प्रचार के लिए माजुली आए थे. सोनोवाल ने यहाँ भारी मतों से जीत दर्ज की थी."
24 मई 2016 असम के इतिहास की वो तारीख़ है जब सोनोवाल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वे जोगेंद्र नाथ हज़ारिका के बाद सोनोवाल कछारी जनजाति से आने वाले असम के दूसरे मुख्यमंत्री हैं. हज़ारिका 1979 में केवल 94 दिनों के लिए राज्य के सीएम थे.

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आईएमडीटी क़ानून को रद्द करवाने से चर्चा में आए
राज्य में सर्बानंद तब सुर्खियों में आए जब उनकी एक याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में 22 साल पुराने विवादास्पद अवैध प्रवासी पहचान ट्रिब्यूनल (आईएमडीटी) क़ानून को असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया था.
सर्बानंद ने इसे स्थापित किया कि आईएमडीटी एक्ट के रहते असम में विदेशियों की पहचान या निष्कासन का काम संभव नहीं है. इसके बाद प्रदेश में उनकी छवि एक अहम नेता के रूप में बनी. हालाँकि आइएमडीटी एक्ट ख़ारिज कराने का श्रेय अकेले लेने से पार्टी के कुछ शीर्ष नेता सर्बानंद से नाराज़ भी हो गए थे.
एजीपी में लंबे समय तक उनके साथ रहे और अब असम कांग्रेस के प्रवक्ता अपूर्व भट्टाचार्य के मुताबिक़ क़ानूनी लड़ाई का खर्च एजीपी के पार्टी फंड से दिया गया था. इस मसले पर एजीपी के नेतृत्व के साथ सर्बानंद की अनबन यहीं से शुरू हुई थी.
सर्बानंद पर ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि जब प्रदेश में एजीपी की सरकार थी तब उन्होंने 'सीक्रेट किलिंग' का कभी विरोध नहीं किया. साल 1998 से 2001 के बीच प्रफुल्ल कुमार महंत की सरकार के दौरान अज्ञात हमलावरों ने चरमपंथी संगठन उल्फा चरमपंथियों के रिश्तेदारों और समर्थकों की बड़ी तादाद में हत्या की थी.

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एक छात्र नेता की हत्या के लगे थे आरोप
2016 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन उल्फा-आई के सहायक प्रचार सचिव अरुणोदय असोम ने मीडिया को एक ईमेल पर बयान भेजकर आरोप लगाया था कि डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के छात्र नेता सौरव बोरा की हत्या के समय सोनोवाल उल्फा कैडरों के साथ मौजूद थे.
छात्र नेता सौरव बोरा की 27 मई 1986 में डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय परिसर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस और सीआइडी को सौंपी गई और 1988 में यह मामला सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया गया था.
इस हत्या के मामले में सोनोवाल और पाँच अन्य लोगों को मुख्य अभियुक्त बनाया गया था, लेकिन जून 2012 में गौहाटी उच्च न्यायालय ने इस मामले में सोनोवाल को बरी कर दिया था. यह ख़बर 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले द टेलीग्राफ़ समेत कई प्रमुख अख़बारों में छपी थी.
असम में सीएए के ख़िलाफ़ 2019 में हुए आंदोलन में सर्बानंद को प्रदेश के मूल असमिया लोगों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा था. साल 2005 में आइएमडीटी क़ानून को रद्द करवाने के लिए सोनोवाल को आसू ने जातीय नायक की उपाधि दी थी जिस पर सीएए आंदोलन के दौरान सवाल खड़े किए गए.
जिस डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में कभी सोनोवाल लोकप्रिय छात्र नेता हुआ करते थे वहाँ सीएए आंदोलन के दौरान उनके प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी. सीएए को लेकर लोग उनकी भूमिका से बेहद नाराज़ था और उनके काफिले को काला झंडा दिखाते थे.

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शादी नहीं की, आखिर क्यों?
डालिमी कहती हैं कि सर्बानंद काफी भावुक और ईश्वर को मानने वाले व्यक्ति हैं. जब वह कॉलेज में थे तो असम आंदोलन हुआ था और वह समाज-जाति के काम में इतनी गंभीरता से जुड़ गए कि कई-कई दिन तक घर नहीं आते थे. परिवार के सभी लोगों ने उनपर शादी करने का दबाव भी बनाया था लेकिन उन्होंने शादी नहीं की. वह हमेशा शादी की बात को टालते रहे.
हालाँकि सर्बानंद को बिहू गीत गाने का बड़ा शौक है. इसके अलावा वे क्रिकेट और पुरानी फ़िल्में देखना काफी पसंद करते हैं.
माजुली से एक बार फिर चुनाव लड़ रहे सर्बानंद के चुनावी गीत "सभी जगह आनंद.. सर्बानंद ...असम का आनंद सर्बानंद" ने यहाँ के गाँव-कस्बों में धूम मचा रखी है. लेकिन उनका यह आनंद आगे बरकरार रहेगा या नहीं वो 2 मई को आने वाले चुनावी नतीजे तय करेंगे.
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