असम चुनाव से पहले बोडोलैंड चुनाव को क्यों कहा जा रहा 'सेमीफाइनल'

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
असम में बोडोलैंड टैरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) चुनाव में सत्तारुढ़ बीजेपी एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते दिख रही है.
मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समेत पार्टी के कई शीर्ष नेता पिछले कई दिनों से बोडोलैंड टैरिटोरियल एरिया में लगातार चुनावी रैलियाँ कर रहे हैं.
कांग्रेस भी अपने नए गठबंधन सहयोगी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) को साथ लेकर चुनाव लड़ रही है.
बोडोलैंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लंबे समय तक छात्र आंदोलन करने वाले ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद बोडो की पार्टी यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) भी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
बीटीसी की 40 सीटों के लिए 7 और 10 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे.

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
क्या है बीटीसी?
पश्चिम असम के चार ज़िलों को शामिल कर 10 फ़रवरी 2003 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत बीटीसी का गठन किया गया था.
बीटीसी के गठन के बाद से ही यहां बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ़) का शासन रहा है. लेकिन इस बार बीटीसी चुनाव में मुख्य टक्कर बीजेपी और बीपीएफ़ के बीच बताई जा रही है.
बीजेपी नेताओं ने चुनावी रैलियों में विपक्षी पार्टियों से ज़्यादा अपने सहयोगी दल बीपीएफ़ के ख़िलाफ़ जमकर हमला बोला और कई गंभीर आरोप लगाए हैं.
राजनीति के जानकार बीटीसी के इस चुनाव को अगले साल असम में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफ़ाइनल मान रहे हैं.

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
सेमीफ़ाइनल क्यों कहा जा रहा है?
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि बीटीसी चुनाव में बीजेपी अपनी सरकार में शामिल बीपीएफ़ से अलग अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ रही है.
वहीं 15 साल लगातार असम की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस ने मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ से हमेशा दूरी बनाए रखी लेकिन अब दोनों पार्टियाँ गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में हैं. लिहाज़ा इस चुनाव में कई तरह के राजनीतिक प्रयोग देखने को मिल रहे हैं.
बीटीसी चुनाव पर नज़र रख रहे प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया कहते हैं, "इस बार बीजेपी जिस क़दर बीटीसी चुनाव में उतरी है उससे तो यह साफ़ लग रहा है कि यह 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफ़ाइनल है. बीजेपी नेता अपनी सरकार में अलायंस पार्टनर बीपीएफ़ के इलाक़े में उसकी विश्वसनीयता को सीधे चुनौती दे रहे हैं. बीपीएफ़ के 17 साल के शासन पर सवाल खड़े कर रहे हैं."

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
पत्रकार ठाकुरिया आगे कहते हैं, "बीजेपी ने अपनी कार्यनीति से सालों से चले आ रहे अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को नए शांति समौझोते के ज़रिए पूरी तरह ख़त्म कर दिया है. जबकि इलाक़े में सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत अलग देश की मांग पर हुई थी. फिर विद्रोही नेताओं ने अलग राज्य की मांग उठाई जिसे बीपीएफ़ का समर्थन रहा."
"अब बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति से बोडो लोगों को अपने पाले में ले आएगी. क्योंकि बोडो इलाक़े में विधानसभा की 12 सीटें हैं जिसमें फ़िलहाल एक भी बीजेपी के पास नहीं है. लिहाज़ा इस बार के बीटीसी चुनाव की सारी रणनीति विधानसभा की इन सीटों के लिए है. क्योंकि बीजेपी प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ शासन में दोबारा आना चाहती है. वह महाराष्ट्र जैसा हाल यहां नहीं चाहती. भले ही पार्टी को कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन करना पड़े लेकिन उसका लक्ष्य अकेले पूर्ण बहुमत हासिल करना ही है."
बीटीसी का आख़िरी चुनाव

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
राज्य के एक और वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते हैं, "बीटीसी का यह आख़िरी चुनाव है क्योंकि मोदी सरकार के साथ 27 जनवरी, 2020 को हस्ताक्षरित हुए नए बोडो शांति समझौते के प्रावधानों को लागू करने के बाद यह इलाक़ा बोडोलैंड टैरिटोरियल क्षेत्र अर्थात बीटीआर बन जाएगा.
इसके तहत काउंसिल की सीटें 40 से 60 हो जाएंगी. इलाक़े में कई नए ज़िलों का गठन किया जाएगा. इसके अलावा काउंसिल को ज़्यादा स्वायत्तता और पावर हासिल होगा. एक तरह से बीटीआर को एक मिनी स्टेट जितना पावर मिल जाएगा. लिहाज़ा बीजेपी इस इलाक़े की सत्ता किसी भी क़ीमत पर हासिल करना चाहेगी."
2021 में असम में होने वाले विधानसभा चुनाव से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए पत्रकार गोस्वामी कहते हैं, "दरअसल जो नया बीटीआर क्षेत्र बनने वाला है उसकी सत्ता हासिल करने के लिए ही बीजेपी इस बार चुनावी मैदान में इतनी ताक़त झोंक रही है. यह दरअसल बीटीआर की सत्ता हासिल करने से पहले का सेमीफ़ाइनल है."
"इसके अलावा बोडोलैंड क्षेत्र की 12 विधानसभा सीटों पर भी बीजेपी की नज़र है. लेकिन ये तब ज़्यादा आसान होगा जब बीजेपी बीटीसी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी. बीजेपी यहां छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के वर्चस्व को पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहती है."
2015 के बीटीसी चुनावों में बीपीएफ़ 20 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी जबकि बीजेपी को केवल एक सीट ही मिली थी. हालांकि उस दौरान राज्य में कांग्रेस की सरकार थी.
बीपीएफ़ से अलग चुनाव लड़ने पर बीजेपी का तर्क

इमेज स्रोत, Dilip Kumar Sharma
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास ने हाल ही में बीटीसी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने यहां के लोगों के विकास के लिए पैसे भेजे थे लेकिन बीपीएफ़ प्रशासन के कारण वो पैसा लोगों तक नहीं पहुंचा. यहां के लोग इलाक़े का विकास चाहते हैं और इसलिए चुनावी रैलियों में वे बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं.
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "हमारी पार्टी ने इससे पहले भी बीटीसी का चुनाव अकेले ही लड़ा था. भले ही बीपीएफ़ राज्य सरकार में हमारी सहयोगी है लेकिन जब कोई पार्टी लोगों की अपेक्षा में खरी नहीं उतरती तो उसकी ग़लतियाँ जनता को बतानी पड़ती हैं."
बीटीसी की 40 सीटों में केवल पांच सीट ग़ैर बोडो लोगों के लिए हैं और पांच सीट ऐसी हैं जिस पर इलाक़े से कोई भी चुनाव लड़ सकता है फिर चाहे वह बोडो ही क्यों न हो. जबकि 30 सीट केवल बोडो जनजाति के लोगों के लिए रिज़र्व हैं.
बीजेपी, बीपीएफ़, यूपीपीएल, कांग्रेस, एआईयूडीएफ़, गण सुरक्षा परिषद और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिलाकर कुल 72 उम्मीदवार मैदान में हैं. मतों की गिनती 12 दिसंबर को होगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकतेहैं.)















