बिहार विधानसभा हंगामा: आरजेडी का बिहार बंद, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कैसा टकराव है?

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- Author, नीरज सहाय
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार विधानसभा में मंगलवार को हुए हंगामे और विपक्ष के नेताओं को ज़बरदस्ती बाहर निकाले जाने के बाद विपक्ष का विरोध प्रदर्शन जारी है. विपक्ष का आरोप है कि उनके कई विधायकों को चोटें आई हैं.
विरोध दर्ज करने के लिए विपक्ष के नेता आरजेडी के तेजस्वी यादव ने अपने बंद का आह्वान किया है.
उन्होंने एक ट्वीट कर लिखा, "बिहार विधानसभा में सीएम द्वारा लोकतंत्र का चीरहरण, विधायकों की पिटाई, बेरोज़गारी, महँगाई, किसान बिल के विरुद्ध कल 26 मार्च को पूरे महागठबंधन ने बिहार बन्द का आह्वान किया है."
क्यों हुआ टकराव
बिहार विधानसभा में मंगलवार की हुई घटना विधायी इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानी जा रही है. जानकार कह रहे हैं कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अहम की ये लड़ाई शायद विधानसभा के संख्या बल में छिपी हुई है.
विपक्ष की सबसे प्रमुख पार्टी राष्ट्रीय जनता दल सदन में सबसे बड़ी पार्टी है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी भारतीय जनता पार्टी के बाद तीसरी बड़ी पार्टी है.
बिहार विधानसभा में एनडीए के कुल 127 विधायक हैं, जिनमें भाजपा के 74, जदयू के 44 और हम और वीआईपी पार्टी के चार-चार विधायक हैं.
उधर विपक्षी गठबंधन के पास 110 सदस्य हैं, जिनमें राजद के 75, कांग्रेस के 19, सीपीआई (माले) के 12 और सीपीआई-सीपीएम के दो-दो विधायक हैं.
दरअसल मंगलवार को बिहार विधानसभा में सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को लेकर जमकर हंगामा हुआ. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आख़िरकार पुलिस को बुलाना पड़ा. विधेयक को पास नहीं कराने पर अड़े विपक्ष के विधायकों को हटाने के लिए पुलिस वालों ने उन पर जमकर लात-मुक्के चलाए.
महिला प्रतिनिधि भी सदन के अंदर पुलिसिया कार्रवाई से अछूती नहीं रहीं. बिहार विधानसभा के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना घटी.
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहना है, "बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक- 2021 लागू होता है, तो बिना वारंट के पुलिस कहीं भी चली जाएगी. पहले ही पुलिस लोगों को परेशान करती रही है और अब उनका अधिकार क्षेत्र बढ़ाया गया, तो आम लोगों को पुलिस और डराएगी और भयादोहन करेगी. अगर दोषी पदाधिकारियों पर कारवाई नहीं होगी, तो अगले पाँच सालों तक विपक्ष का एक भी विधायक सदन की कार्रवाही में हिस्सा नहीं लेगा. ऐसा हम विचार कर रहे हैं."

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विपक्ष मंगलवार की घटना पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर लगातार हमलावर है. नए पुलिस क़ानून को लेकर उन्हें तानाशाह बता रहा है.
उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार की घटना से ख़ुद को अलग करते हुए बुधवार को कहा, "विधानसभा में घटित कोई भी घटना सदन के अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आती है. उस स्थान की किसी भी घटना के लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती, क्योंकि सरकार की वहाँ कोई जवाबदेही नहीं रहती है."
वहीं सांसद और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस घटना पर कहा कि "पुलिस क़ानून के बहाने विपक्ष भ्रम फैलाने और सदन से सड़क तक हिंसा फैलाने की उसी स्क्रिप्ट पर काम कर रहा है, जिस पर किसान आंदोलन को आक्रामक बना कर भारत की छवि बिगाड़ने की कोशिश की गई थी. जैसे तय रूट को तोड़ते हुए रैली निकाल कर पुलिस को गोली चलाने पर मजबूर किया था, उसी तर्ज़ पर राजद की मंशा सड़क पर गोली चलवाने और सदन के भीतर मार्शल बुलाने को मजबूर करने जैसी थी."

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क्या हैं पुलिस विधेयक के प्रावधान?
नया क़ानून बिहार सैन्य पुलिस (बीएमपी) को और अधिक अधिकारों से लैस करेगा. बिना वारंट तलाशी लेने की शक्ति के तहत सक्षम अधिकारी को किसी घटना के बाद आशंका के आधार पर संदेहास्पद व्यक्ति की तलाशी और गिरफ़्तारी करने का अधिकार होगा और अगली क़ानूनी कारवाई के लिए थाने को सौंप सकता है.
बदले हालात में औद्योगिक इकाईयों, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान, एयरपोर्ट, मेट्रो, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के केंद्रों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी गई है. इसके तहत विभिन्न प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में तैनात अधिकारी को बिना वारंट और बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के किसी संदिग्ध को गिरफ़्तार करने का अधिकार मिल जाएगा.
बिहार विधानसभा के इतिहास में मंगलवार को पहली बार पुलिस बुलाई गई, तो क्या इसके लिए सिर्फ़ विपक्ष ज़िम्मेदार था या सरकार का दमनकारी चेहरा उजागर हुआ है?

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इस पर राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह कहते हैं, "मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि हमने कोई क़ानून नहीं बनाया है, केवल नाम बदला है. नाम बदलने के लिए केवल एक संशोधन काफ़ी था."
"आज कोई आपातकाल है क्या? विधानसभा की कमेटी में इसे भेज देते, बहस हो जाती, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती. सदन के भीतर आपातकालीन स्थिति पैदा करने की जब भी चेष्टा सरकार करेगी, तो प्रतिरोध करने वाले को कभी दोषी नहीं कहा जा सकता है. संसदीय इतिहास में कहीं भी ऐसा नहीं दिखा होगा कि सदन में पुलिस की मौजूदगी में पुलिस बिल पास कराया गया. जो हुआ उसके लिए संपूर्ण रूप से नीतीश कुमार दोषी हैं."
उधर जनता दल यूनाइटेड के नेता अजय आलोक विपक्ष को समूचे घटनाक्रम के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं. उनके अनुसार, "बिहार विधानसभा के इतिहास में आज तक कभी नहीं हुआ कि अध्यक्ष के आसन पर दो- दो व्यक्ति पाँव रख दें. आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि सचिव की टेबल पर कुर्सी लगाकर बैठा जाएं और प्रति फाड़ी जाए."

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"आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यक्ष को बंधक बना लिए जाए, ऐसी अभूतपूर्व परिस्थिति के बीच अगर पुलिस आती है, तो कौन सी बड़ी बात है. सत्ता पक्ष वहाँ अखाड़ा नहीं बनाना चाह रहा था. फ़्लोर मैनेजमेंट तब होता है, जब विपक्ष बात करने को तैयार हो. यह सब पहले से तय साज़िश के तहत किया गया है."
मंगलवार से जारी राजनीतिक तनातनी के बीच वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ तिवारी का मानना है, "सत्तापक्ष को बिल लाने के पहले इसकी जानकारी सामूहिक करनी चाहिए थी. सदन से बिल पास करा लेने के बाद मुख्यमंत्री अब कह रहे हैं कि गृह विभाग की ओर से इसकी जानकारी लोगों को दी जाएगी. इसे पहले करना चाहिए था. ऐसा लगता है कि इस बिल के पास हो जाने से पुलिस सत्तापक्ष का एक औज़ार बन कर रह जाएगी."
"क़रीब 26 हज़ार संख्या बल वाले बीएमपी को नए क़ानून के दायरे में लाया गया है. आख़िर राज्य में कितनी औद्योगिक इकाइयाँ हैं, कितने एयरपोर्ट हैं? वहाँ पहले से ही केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ तैनात हैं. ऐसे में विपक्षी दलों का जो दावा है कि इस बिल के माध्यम से सरकार पुलिस का दुरुपयोग करेगी, वह संदेश लोगों के बीच जाता दिख रहा है. विगत कुछ वर्षों में यह पहली घटना है, जब ज़िला पुलिस बल सदन के भीतर आई और बलपूर्वक विपक्षी दलों के सदस्यों को बाहर ले गई."
वरिष्ठ पत्रकार विनोद बंधु कहते हैं, "विपक्ष ही ज़िम्मेदार है ऐसा नहीं कह सकते, लेकिन विपक्ष की ग़लती है. सरकार को विधेयक लाने से विपक्ष नहीं रोक सकता. यह सोच ही ग़लत है. विधेयक आने के बाद उसपर चर्चा और उसके बाद की प्रक्रिया में विरोध करना चाहिए था, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष को बंद कर देना अप्रत्याशित घटना रही. घेराव करना था, तो मुख्यमंत्री का घेराव करते. फ़्लोर पर पुलिस को बुलाना यह क़दम थोड़ा ज़्यादा सख़्त था, बातचीत करनी चाहिए थी, जिसकी पहल नहीं हुई."
उधर वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का कहना है, "सत्ता पक्ष इसके लिए जितना ज़िम्मेदार है, विपक्ष की भी उतनी ही ज़िम्मेदारी बनती है. अपरिपक्व लोकतंत्र का बड़ा उदाहरण सदन में देखने को मिला. फ़्लोर मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है, उस बिंदु पर वह नाकाम रही, तो विपक्ष की नाकामी यह रही वो विरोध करने में ही लगी रही. अप्रत्याशित घटना थी, लेकिन पुलिस को सदन में बुलाना बहुत ज़्यादा सख़्त क़दम था."
बिहार सशस्त्र पुलिस विधेयक अब बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों से पास हो चुका है. इस बीच विपक्ष ने सदन का फिर बहिष्कार किया और बाहर सामानांतर सदन चलाया. जानकारों के अनुसार विपक्ष का सदन से बार-बार वॉकआउट करना उसकी अपरिपक्वता को बतलाता है, जो सत्तापक्ष को विपक्ष को बदनाम करने का मौक़ा देता है, साथ-साथ काम निकाल लेने का अवसर भी दे देता है.
हालाँकि राष्ट्रीय जनता दल के विधायक सुधाकर सिंह का कहना है कि, "विपक्ष कार्यस्थगन प्रस्ताव के ज़रिए पुलिस बिल पर चर्चा की मांग कर रहा था. हमने यहाँ तक कहा कि अगर सरकार को इससे परेशानी है, तो सेलेक्ट कमेटी के समक्ष बिल भेज कर उस पर चर्चा करा ली जाए, लेकिन सत्तापक्ष मोशन के ज़रिये चर्चा करने को अड़ा था."
"जब विपक्ष के किसी प्रस्ताव को सत्तापक्ष मानने को तैयार ही नहीं था, तो वैसे सदन में जाकर क्या करेंगे? हमारी ड्यूटी सदन में आकर केवल वेतन लेने की नहीं मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए भी है."
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