कोरोना: भारत में लॉकडाउन से वैक्सीन तक क्या कुछ बदला

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- Author, विज़दान मोहम्मद कवूसा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
कोरोना महामारी शुरू होने के बाद 19 मार्च, 2020 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार टेलीविज़न पर देश को संबोधित किया और 22 मार्च को एक दिन के देशव्यापी कर्फ़्यू की घोषणा की. इसके तीन दिन बाद देश में पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया गया जो कुछ महीनों तक लागू रहा.
तब से लेकर अब तक, कई अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में कोरोना संक्रमण की एक ही बड़ी लहर आई है और कहा जा सकता है कि भारत कोरोना के कारण होने वाली मृत्यु दर को भी कम रखने में क़ामयाब रहा है.
फ़िलहाल देश में कोरोना टीकाकरण का काम पूरे ज़ोर-शोर से चल रहा है. लेकिन सबसे अधिक जोखिम वाले नागरिकों को बचाने के लिए सरकार को इस काम में तेज़ी लाने की ज़रूरत है.

कोरोना की बड़ी लहर
दुनिया के जिन छह देशों में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किये गए हैं, उनमें भारत अकेला ऐसा देश है जो कोरोना संक्रमण की दूसरी ख़तरनाक़ लहर का गवाह नहीं बना.
बीते साल सितंबर के मध्य में कोरोना संक्रमण के मामले ज़रूर तेज़ी से बढ़े थे, लेकिन इस साल फ़रवरी आते-आते मामलों में गिरावट आनी शुरू हो गई.
ये बात सही है कि बीते महीने देश में कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़े हैं, लेकिन अब भी कोरोना की पहली लहर के दौरान आ रहे आंकड़ों के मुक़ाबले ये काफ़ी कम हैं.
18 मार्च को ख़त्म होने वाले सप्ताह में देश में हर रोज़ कोरोना संक्रमण के औसतन 30,000 नए मामले दर्ज किए जा रहे थे. जबकि बीते साल सितंबर के मध्य में जब कोरोना की लहर अपने पीक पर थी, तब कोरोना संक्रमण के रोज़ाना 93,000 नए मामले दर्ज किये जा रहे थे.

अमेरिका, जहाँ कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किये गए हैं, वहाँ अब तक कोरोना की तीन बड़ी लहरें आ चुकी हैं.
ब्राज़ील और रूस में भी स्पष्ट तौर पर कोरोना की दो लहरें आई हैं.
हाल के दिनों में कोरोना संक्रमण के तेज़ी से बढ़ रहे मामले भले की कोरोना की दूसरी ख़तरनाक़ लहर का कारण ना बने, हम ये ज़रूर कह सकते हैं कि राष्ट्रीय पैमाने पर भारत संक्रमण की दूसरी लहर के आने को टालने में अब तक सफल रहा है.
हालांकि, ये पूरी तस्वीर नहीं है क्योंकि कई राज्य ऐसे हैं जहाँ एक के बाद एक कोरोना संक्रमण की कई लहरें दर्ज की गई हैं.
जैसे कि राजधानी दिल्ली में कोरोना की तीन लहरें आई हैं और महाराष्ट्र फ़िलहाल कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के कारण पैदा हुई मुश्किलों से जूझ रहा है.
वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति
भारत में संक्रमण के तेज़ी से बढ़ते मामलों के कारण वैश्विक आंकड़ों में बढ़त से लेकर आंकड़ों में कमी आने तक, बीते कई महीनों से भारत कोरोना वैश्विक महामारी का गवाह रहा है.
सितंबर में कोरोना महामारी के पीक के दौरान दुनिया के किसी और देश के मुक़ाबले भारत में संक्रमितों की संख्या और इस कारण मरने वालों की संख्या सबसे अधिक थी.
इस दौरान दुनिया में कोरोना संक्रमण के जितने मामले दर्ज किये गए उनमें से एक तिहाई और जितनी मौतें हुई उनका पाँचवा हिस्सा भारत से था.
लेकिन इस साल फ़रवरी में स्थिति थोड़ी बेहतर हुई, जब संक्रमण के नए मामलों में भारत सात और देशों से पीछे था और कोरोना के कारण नई मौतों के मामले में 18 देशों से पीछे था.
दुनिया भर के देशों के आंकड़ों की तुलना में फ़रवरी में भारत में संक्रमितों की संख्या 3 फ़ीसदी थी और मौतों की सख्या घटकर 1 फ़ीसदी तक हो गई.
हालांकि, मार्च के महीने में कोरोना संक्रमण के मामलों में एक बार फिर तेज़ी देखी गई जिस कारण नीचे गिर रहा ग्राफ़ फिर बिगड़ गया.
कम रही मृत्यु दर
कोरोना महामारी से जुड़े वैश्विक आंकड़ों को देखें को दुनिया भर में इस कारण जितनी मौतें हुई उनमें से 6 फीसदी भारत में हुईं. वहीं दुनिया भर में कोरोना संक्रमण के कुल मामलों में 9.5 फीसदी हिस्सा भारत का हैं.
जॉन्स हॉप्किन्स युनिवर्सिटी डैशबोर्ड के अनुसार अब तक पूरी दुनिया में कोरोना के कारण 27 लाख लोगों की मौत हुई है जबकि संक्रमितों की कुल संख्या 12.3 करोड़ है. इस हिसाब से वैश्विक स्तर पर कोरोना की मृत्यु दर 2.2 फीसदी है.
भारत में जब कोरोना संक्रमितों की संख्या 1.15 करोड़ थी तब यहाँ कोरोना के कारण 1,59,000 लोगों की मौत हो चुकी थी और कोरोना के कारण मृत्यु दर 1.4 फीसदी थी. जिन 10 देशों में कोरोना के कारण सबसे अधिक मौतें दर्ज की गई हैं उनमें भारत सबसे नीचे है.

जानकार मानते हैं कि भारत में कोरोना मृत्यु दर कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. इनमें से एक अहम कारण कई विकसित देशों के मुक़ाबले यहाँ की अपेक्षाकृत युवा आबादी है.
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, जिन 10 देशों में कोरोना महामारी से सबसे अधिक मौतें हुई हैं उनमें सबसे कम मौतें भारत में हुई हैं. इन देशों के मुक़ाबले भारत में 65 साल से कम उम्र के लोगों की तादाद सबसे अधिक है.
जानकार मानते हैं कि इसके अलावा यहाँ की आबादी की आनुवांशिक पृष्ठभूमि और संक्रमण को लेकर आबादी का एक्सपोज़र भी मृत्यु दर कम होने का कारण है जिस कारण यहां के लोगों की रोग प्रतिरोधक शक्ति थोड़ी अधिक है.
आंकड़े इस ओर भी इशारा करते हैं कि भारत कोविड-19 मृत्यु दर को कम कर रखने में अधिक कामयाब हो रहा है. वैश्विक आंकड़ों के मुक़ाबले, बीते आठ महीनों में भारत में कोरोना संक्रमण के नए मामले और इस कारण होने वाली मौतों की संख्या में फर्क लगातार बढ़ता गया है.
इस कारण बीते साल आई कोरोना की पहली लहर के मुक़ाबले हाल के दिनों में बढ़ रहे कोरोना के मामले चिंता की उतनी बड़ी वजह नहीं रहे. हालांकि स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव पड़ने पर स्थिति अब भी बिगड़ सकती है.
सख़्त लॉकडाउन
जैसे-जैसे देश के अलग-अलग हिस्सों में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ने लगे सरकार ने वायरस को फैलने से रोकने के लिए नए नियम लागू किए. लेकिन पहली बार 22 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की कि वो एक दिन के कर्फ्यू का पालन करें और घर से ना निकलें.
इसके बाद 25 मार्च से लेकर 19 अप्रैल तक तीन सप्ताह के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की गई और इसके लिए सख़्त नियम लागू किये गए.
लॉकडाउन के नियमों में बाद में धीरे-धीरे राहत दी गई लेकिन ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी के बनाए स्ट्रिजेन्सी इंडेक्स (सख़्त नियम सूचिकांक) के अनुसार भारत में लॉकडाउन को लेकर बेहद सख़्त नियम लगाए गए थे.
स्ट्रिजेन्सी इंडेक्स के अनुसार, लॉकडाउन के वक़्त भारत का आंकड़ा सबसे अधिक 100 था, यानी यहाँ सख़्त नियम लगाये गए थे. जिन 10 देशों में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए थे उनमें सबसे सख्त नियम भारत में लागू किए गए थे.
भारत में लागू किए गए पूर्ण लॉकडाउन का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा.
जून 2019 की चौमाही की तुलना में जून 2020 की चौमाही में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 23.9 फीसदी तक सिकुड़ा.
इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, भारत विश्व की उन अर्थव्यवस्थाओं में से एक था जिस पर कोरोना महामारी की सबसे बुरा असर पड़ा.
आम जनजीवन का फिर से पटरी पर लौटना
लॉकडाउन के दौरान लगाए गए नियमों में जैसे-जैसे राहत दी जाने लगी और नागरिक पहले की तरह अपना काम फिर से शुरू करने लगे.
कोविड-19 कम्युनिटी मोबिलिटी रिपोर्ट में गूगल ने कोविड-19 महामारी से पहले की तुलना में लोगों की गतिशालता यानी अलग-अलग जगहों पर उनकी आवाजाही को मापा है. इसके अनुसार जिन 10 देशों में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए उसकी तुलना में भारत में लॉकडाउन के नियमों में राहत दिए जाने के साथ-साथ लोगों की आवाजाही बढ़ी है.
ये रिपोर्ट छह क्षेणियों में लोगों की गतिशीलता को मापता है - इनमें खुदरा व्यापार और मनोरंजन, सुपरमार्केट और दवा की दुकानें, पार्क, सार्वजनिक परिवहन, दफ्तर और निवास स्थान शामिल है.
टीकाकरण की सुस्त रफ़्तार
16 जनवरी को भारत ने बड़े पैमाने पर कोविड-19 टीकाकरण शुरू किया.
आवर वर्ल्ड इन डेटा की वेबसाइट के अनुसार, टीकाकरण अभियान के दो महीने पूरे होने तक, यानी 16 मार्च तक भारत में कोरोना वैक्सीन के क़रीब 3.51 डोज़ लगाए जा चुके थे.
जिन 10 देशों में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं उनमें देखा जाए तो भारत केवल अमेरिका से पीछे है जहां अब तक कोरोना के टीके के क़रीब 11.1 करोड़ डोज़ लगाए जा चुके हैं.
अमेरिका में कोरोना टीकाकरण अभियान की शुरूआत भारत से क़रीब एक महीने पहले हुई थी.
कोरोना टीकाकरण के आंकड़ों को देखने पर लगता है कि इस मामले में भारत दूसरों के मुक़ाबले बेहतर कर रहा है, लेकिन अगर प्रति सौ व्यक्ति के आधार पर आंकड़ों को देखा जाए तो, प्रत्येक सौ लोगों में केवल 2.54 लोगों को ही कोरोना का टीका लगाया गया है, जो इन दस देशों की तुलना में सबसे कम है.
लेकिन अब भारत में कोरोना टीकाकरण की रफ्तार तेज़ हो रही है.
16 मार्च को ख़त्म होने वाले सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार देश में हर दिन क़रीब 15 लाख लोगों को कोरोना का टीका लगाया जा रहा है. पंद्रह दिन पहले तक ये आंकड़ा 5 लाख था.
जनसंख्या के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है और पूरी आबादी को कोरोना का टीका लगाना यहाँ की सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.
अगर हम ये मानें कि फिलहाल जिस रफ्तार से कोरोना की वैक्सीन लगाई जा रही है (प्रति दिन 15 लाख डोज़) उस रफ्तार को आगे भी कायम रखा जाएगा और हर व्यक्ति को कोरोना वैक्सीन की दो डोज़ दी जाएगी, तो भी भारत को अपनी आधी आबादी तक टीका पहुंचाने में कम से कम ढाई साल का वक्त लगेगा.
लेकिन जिस तरह से सरकार कोरोना टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाती जा रही है, उसके देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि देश की सबसे जोखिम वाली आबादी के एक बड़े हिस्से को अनुमान से पहले वैक्सीन ज़रूर मिल सकेगी.
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