आरिज़ ख़ान कौन हैं जिन्हें बटला हाउस मुठभेड़ मामले में मिली सज़ा-ए मौत

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली की साकेत कोर्ट ने 2008 के बटला हाउस मुठभेड़ मामले में दोषी आरिज़ खान को मौत की सज़ा सुनाई है.
उन्हें बटला हाउस मुठभेड़ में पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या का दोषी भी पाया गया है.
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने सोमवार को सज़ा सुनाते हुए इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' की श्रेणी में रखा है. कोर्ट ने आरिज़ पर 11 लाख का जुर्माना भी लगाया है. इसमें से 10 लाख रुपये इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के परिवार को दिए जाएंगे.
पुलिस का ये भी आरोप है कि आरिज़ ख़ान का चरमपंथी संगठन “इंडियन मुजाहिदीन” से संबंध हैं. पुलिस ने आरिज़ को मौत की सज़ा दिए जाने की अपील की थी.
पुलिस का कहना था कि ये केवल हत्या का मामला नहीं है बल्कि न्याय की रक्षा करने वाले क़ानून प्रवर्तन अधिकारी की हत्या का मामला है.
आरिज़ ख़ान को कोर्ट ने 8 मार्च को दोषी करार दिया था.

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कौन हैं आरिज़ ख़ान?
आरिज़ ख़ान उर्फ जुनैद का घर उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में है. आरिज़ की स्कूल की पढ़ाई भी वहीं हुई है.
आरिज़ ख़ान के वकील एमएस ख़ान बताते हैं कि आरिज़ के घर में एक मां और एक भाई हैं. उन्होंने पहले बीटेक में एडमिशन लिया था. बाद में बीटेक छोड़कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली आ गए थे और अपने मामा के यहां रह रहे थे.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक वह 2008 में हुए दिल्ली बम विस्फोट मामले में भी अभियुक्त हैं. इस मामले की सुनवाई चल रही है.
आरिज़ ख़ान बटला हाउस मुठभेड़ के दौरान फ्लैट से भाग निकले थे. लेकिन, बाद में दिल्ली पुलिस ने उसे भारत-नेपाल सीमा पर पकड़ा था.
पुलिस के मुताबिक कस्टडी के दौरान 28 फरवरी, 2018 को आरिज़ खान ने अलीगढ़ से रामपुर जाने वाली रोड पर बरोटा गांव में ऊपरी गंगा नहर के पुल पास वो जगह भी दिखाई थी जहां हथियार छुपाए थे.

कोर्ट ने क्या कहा
आरिज़ ख़ान को लेकर फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि ये साबित होता है कि आरिज़ खान और उनके साथियों ने पुलिस अधिकारियों की हत्या की थी और उन पर गोलियां चलाई थीं.
वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने सजा सुनाते हुए कहा, “दोषी के घृणित कृत्य के कारण उनके जीने का अधिकार ख़त्म हो गया है... ये निष्कर्ष निकाला गया है कि ये रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामला है जिसके लिए दोषी क़ानून के तहत अधिकतम सज़ा का हकदार है. इस अपराध के पीछे की क्रूरता का परिमाण, स्तर, गलत काम करने वाली की मानसिकता और रवैये के साथ अन्य कारक इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस बनाते हैं.”
“समाज की रक्षा करना और अपराधी को डराना क़ानून का एक स्वीकृत प्रयोजन है और इसे उचित सज़ा द्वारा प्राप्त करना आवश्यक है. अरिज़ ख़ान जैसे दोषी के लिए सबसे उपयुक्त सज़ा मृत्युदंड होगी.”
कोर्ट ने ये भी कहा, “हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि एके-47 और दो पिस्टल जैसे जानलेवा हथियार फ्लैट से मिले हैं. बचाव पक्ष ये स्पष्ट करने में सक्षम नहीं रहा कि ये जानलेवा हथियार दोषी और उसके साथियों ने किस उद्देश्य से फ्लैट में रखे थे. ये हथियार किस तरह की तबाही मचा सकते थे इसे देखते हुए ये निष्कर्ष निकालना सही है कि ये हथियार आतंकी और गैर-सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के विचार से फ्लैट में रखे गए थे.”
कोर्ट ने आरिज़ ख़ान को अलग-अलग धाराओं में सज़ा दी है जिनमें करावास और जुर्माना भी शामिल हैं. सभी सज़ा एक के बाद एक चलेंगी.
सज़ा पर बहस करते हुए दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त लोक अभियोजक एटी अंसारी ने कहा कि यह कोई सामान्य मामला नहीं है. यह अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी की हत्या का मामला है. इसलिए दोषी को फांसी दी जानी चाहिए.
हालांकि, आरिज़ ख़ान के वकील एमएस ख़ान ने फांसी की सजा का विरोध किया है.
उनका कहना है, “पहले तो हमारा ये कहना था कि शहजाद और आरिज़ ख़ान को इस मामले में अभियोजन पक्ष ने एक जैसी भूमिका दी है. अब शहजाद को उम्रकैद मिली है तो समानता के आधार पर आरिज़ को भी उसी तरह की सज़ा मिलनी चाहिए. दूसरी बात ये थी कि इन अभियुक्त ने पूर्व नियोजित तरीक़े से हमला नहीं किया. उन्हें ना पुलिस के आने की जानकारी थी और ना ही उन्होंने प्लानिंग की थी. वो सब अचानक हुआ. साथ ही इस बात को लेकर भी स्पष्टता नहीं है कि मोहन चंद शर्मा को किस की गोली लगी थी.”
एमएस ख़ान ने बताया कि वो फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करेंगे.
बटला हाउस मुठभेड़
इस फैसले के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी फिर से शुरू हो गई. इस मामले के बाद भी जहां कई तरह के सवाल उठाए गए थे वहीं चुनावों में भी ये एक मुद्दा बना था.
बटला हाउस मुठभेड़ लंबे समय तक विवादों के घेरे में रही है.
दिल्ली में जामिया नगर स्थित बटला हाउस में मुठभेड़ तो 19 सितंबर 2008 को हुई थी लेकिन इसके तार कुछ दिनों पहले हुए बम विस्फोटों से जुड़े हैं.
करीब एक हफ़्ता पहले 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में लगातार पांच बम धमाके हुए थे जिसमें 30 लोग की जा चली गई थी और 100 घायल हो गए थे.
दिल्ली पुलिस के आरोप पत्र के मुताबिक़ आरिज़ ख़ान और उनके साथियों ने 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों की साज़िश रची थी. इन विस्फोटों में 30 लोग मारे गए थे.
पुलिस का दावा था कि ये पूरी साज़िश बटला हाउस के बिल्डिंग नंबर एल-18 के एक फ्लैट में रची गई थी.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक उन्हें सूचना मिली थी कि दिल्ली बम विस्फोट मामले में एक संदिग्ध आतिफ़ अमीन बटला हाउस में छुपा है.
इसके बाद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा 19 सितंबर की सुबह एक टीम लेकर बटला हाउस पहुंचे. सभी पुलिस वाले सादे कपड़ों में थे. पुलिस को बिल्डिंग नंबर एल-18 में फ्लैट नंबर 108 में जाना था.
सब इंस्पेक्टर धर्मेंद्र कुमार एक फोन कंपनी के सेल्समैन बनकर फ्लैट के बाहर पहुंचे. उन्होंने खुद को एक एग्जेक्यूटिव बताते हुए फ्लैट का गेट खटखटाया. बाकी पुलिस वाले नीचे इंतज़ार कर रहे थे. इस बीच इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा सीढ़ियां चढ़ने लगे.
उन्होंने फ्लैट का बाईं ओर का दरवाज़ा अंदर की तरफ धकेला. पुलिस वाले अंदर घुसे और वहां उन्हें चार लड़के मिले. ये आतिफ़ अमीन, मोहम्मद साजिद, आरिज़ ख़ान और शहजाद अहमद थे.
दोनों तरफ से ताबड़तोड़ फायरिंग होने लगी. फायरिंग में इंस्पेक्टर मोहन चंद को दो गोलियां लगी और हवलदार बलवंत के हाथ में गोली लगी.
वहीं, कमरे में मौजूद आतिफ़ अमीन और मोहम्मद साजिद की भी फायरिंग में मौत हो गई. लेकिन, इस बीच आरिज़ खान और शहजाद अहमद उर्फ़ पप्पू वहां से भाग गए और एक लड़के को गिरफ़्तार कर लिया गया.

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बाद में आरिज़ ख़ान को भारत-नेपाल सीमा से गिरफ़्तार कर लिया गया.
उसी दिन शाम को होली फैमिली हॉस्पिटल में इलाज के दौरान इंस्पेक्टर मोहन की इस मौत हो गई.
राजनीति और कई सवाल
इस मुठभेड़ पर जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए थे वहीं राजनीति भी शुरू हो गई थी.
पुलिस जांच में खामियों की बात कही गई थी. मोहन चंद शर्मा के बुलैट प्रूफ जैकेट ना पहनने और अन्य पुलिसकर्मियों के पास बंदूक ना होने पर सवाल उठे थे.
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया था कि ये मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी. 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने आज़मगढ़ पहुंचकर इस मुठभेड़ में मारे गए लोगों को न्याय दिलाने का वादा किया था.

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समाजवादी पार्टी ने भी मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की थी. साल 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए थे. दो महीने बाद जुलाई 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुठभेड़ असली थी और पुलिस की कार्रवाई नियमों के मुताबिक़ थी.
तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दिग्विजय सिंह के दावों को ख़ारिज कर दिया था. कुछ मुसलमान सांसदों ने मामले की जांच की मांग की थी जिस पर चिदंबरम ने कहा था कि मुठभेड़ असली थी. उन्होंने साथ ही कहा था कि मामले की दोबारा जांच की कोई ज़रूरत नहीं है.
ये मुठभेड़ आने वाले चुनावों में भी गर्म रहा. वर्ष 2012 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के उस बयान को लेकर भी खूब विवाद हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि बाटला हाउस एनकाउंटर में मृत लड़कों की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी की आंखों में आंसू भर आए और उन्होंने पीएम से बात करने के लिए कहा.
हालांकि, बाद में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी नहीं रोईं थीं.
साल 2008 में केंद्र और राजधानी दिल्ली में कांग्रेस की ही सरकार थी.
आरिज़ ख़ान पर फ़ैसला आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस के इसी बयान को लेकर फिर से निशाना साधा है. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और दिग्विजय सिंह ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए थे और आतंकियों का पक्ष लिया था.
उन्होंमे कहा था, "मैं मांग करता हूं कि उन्हें देश से माफ़ी मांगनी चाहिए."

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न्यायिक जांच की मांग
इस दौरान मानवाधिकार संगठनों ने बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्ज़ी बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करके मामले की न्यायिक जांच करने की मांग की थी.
इस पर 21 मई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को जांच कर दो महीने में रिपोर्ट देने के लिए कहा था.
इसके बाद 22 जुलाई 2009 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की. रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दी गई थी.
दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2009 को मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए न्यायिक जांच से इनकार कर दिया था. इसी साल अक्टूबर में हाईकोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई लेकिन वहां भी न्यायिक जांच से इनकार कर दिया गया.
इस मामले में शहजाद उर्फ पप्पू को जुलाई 2013 में आजीवन कारावास की सज़ा हो चुकी है.
इस मामले सज़ा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट ने इस बात पर हैरानी ज़रूर जताई थी कि फायरिंग का ख़तरा जानते हुए भी पुलिसकर्मियों ने अपनी सुरक्षा पर ध्यान क्यों नहीं दिया. हालांकि, चाहे जो भी हो इससे उन्हें जांच करने आए पुलिसकर्मियों पर फायरिंग करने का अधिकार नहीं मिल जाता. उन्हें पुलिसकर्मियों का सहयोग करना चाहिए था ना कि उन पर हमला.
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