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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021: ममता का चंडीपाठ के बहाने बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड पर निशाना
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी को बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड का डर सता रहा है?
क्या इसकी काट के लिए ही उन्होंने उम्मीदवारी के एलान के बाद मंगलवार को अपने पहले नंदीग्राम दौरे में ख़ुद को बार-बार ब्राह्मण की बेटी और स्थानीय बताया?
क्या ख़ुद को बीजेपी से ज़्यादा हिंदू साबित करने के लिए रैली के मंच से ही उन्होंने चंडीपाठ भी किया? कम से कम राजनीतिक हलक़ों में तो यही माना जा रहा है.
चंडीपाठ राज्य के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा के समय करने की परंपरा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सबसे हाई प्रोफ़ाइल सीट बनी नंदीग्राम पर अबकी सत्ता के दोनों दावेदारों यानी टीएमसी और बीजेपी का सब कुछ दांव पर लगा है.
यह सीट दोनों के लिए नाक और साख का सवाल बन गई है. यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस सीट का नतीजा दोनों दलों और उनके उम्मीदवारों के साथ ही राज्य का भविष्य भी तय करेगा.
सत्ता के शिखर तक पहुँचने की नींव
बीजेपी ने इस सीट पर हाल तक ममता का दाहिना हाथ रहे नंदीग्राम के पूर्व विधायक शुभेंदु अधिकारी को ममता के मुक़ाबले मैदान में उतारा है.
पूर्व मेदिनीपुर ज़िले में हल्दिया नदी के किनारे बसा अनाम-सा क़स्बा वर्ष 2007 में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन और पुलिस की फ़ायरिंग में 14 लोगों की मौत के बाद रातों रात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में आ गया था.
इस आंदोलन ने ही वर्ष 2011 में ममता के सत्ता के शिखर तक पहुँचने की नींव डाली थी.
दूसरी ओर, उस समय इस आंदोलन के सबसे मज़बूत स्तंभ रहे शुभेंदु अधिकारी अब बीजेपी में शामिल होकर ममता के ख़िलाफ़ मैदान में हैं.
ममता के इस सीट से मैदान में उतरने के बाद से ही शुभेंदु और बीजेपी उन पर बाहरी होने का आरोप लगाते रहे हैं.
हिंदुत्व की विचाराधारा
लेकिन अपने पहले नंदीग्राम दौरे में जहां ममता ने बीजेपी के इस आरोप का जवाब दिया, वहीं उसके हिंदुत्व की विचाराधारा पर भी सवाल खड़े किए.
उन्होंने अपने भाषण में इमोशन का तड़का भी लगाया. ममता का कहना था, "अगर आप लोग नहीं चाहते तो मैं यहां से नामांकन दाख़िल नहीं करूंगी."
दरअसल, नंदीग्राम का जातीय गणित बताता है कि यहां बीजेपी और ममता को हिंदुत्व कार्ड खेलने की ज़रूरत क्यों पड़ी है.
इस विधानसभा क्षेत्र में 30 फ़ीसद अल्पसंख्यक हैं और 70 फ़ीसद हिंदू. बीजेपी को इन हिंदू वोटरों पर भरोसा है तो ममता को अल्पसंख्यक वोटरों पर.
नंदीग्राम में दलित वोटरों की तादाद क़रीब 40 फ़ीसद है. बीजेपी को इन वोटरों के समर्थन का भरोसा है.
तुष्टिकरण के आरोप
इसके अलावा दोनों पार्टियां एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए तरह-तरह की रणनीति अपना रही हैं.
इसी के तहत बीजेपी कहीं ममता को बाहरी बता रही है तो कहीं उन पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए जा रहे हैं.
नंदीग्राम के संग्राम का एक और दिलचस्प पहलू है. लेफ़्ट-कांग्रेस-आईएसएफ़ गठजोड़ ने पहले यह सीट पीरज़ादा अब्बास की पार्टी को देने का फ़ैसला किया था.
इससे बीजेपी ख़ुश थी. उसे लग रहा था कि इससे ममता के अल्पसंख्यक वोट बैंक में कुछ सेंध ज़रूर लगेगी. लेकिन अब सीपीएम ख़ुद इस सीट पर अपना उम्मीदवार खड़ा करने पर विचार कर रही है.
इससे भड़के बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी, लेफ़्ट, कांग्रेस और भाईजान अब्बास सिद्दीक़ी के बीच गोपनीय तालमेल है.
उधर, ममता भी बीजेपी के हिंदुत्व की रणनीति की काट की राह पर चल रही हैं.
बीजेपी को हिंदू कार्ड
नंदीग्राम में उन्होंने अपना परिचय 'घरेर मेये' यानी घर की लड़की के तौर पर देते हुए बीजेपी को हिंदू कार्ड खेलने से बाज़ आने की चेतावनी दी.
उन्होंने कहा, "धर्म से मत खेलें. खेल होगा. मैं अपना नाम भूल सकती हूं. लेकिन नंदीग्राम को नहीं."
ममता ने नंदीग्राम में दो कमरों वाला एक मकान किराये पर लिया है. उन्होंने एलान किया कि वे साल के कम से कम तीन महीने यहीं रहेंगी.
ममता ने बीजेपी का नाम लिए बिना कहा, "जो लोग हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेल रहे हैं, उनको साफ़ बताना चाहती हूं कि मैं भी एक हिंदू ब्राह्मण परिवार की लड़की हूं और रोज़ सुबह चंडीपाठ करती हूं. मेरे साथ हिंदू कार्ड मत खेलें."
हिंदू-विरोधी होने के बीजेपी के आरोपों को ख़ारिज करते हुए उनका कहना था कि वे हिंदू धर्म और इसकी परंपराओं के बारे में भगवा पार्टी के नेताओं से कहीं ज़्यादा जानती हैं.
ममता ने चुनौती दी कि अगर किसी को मेरे धर्म के बारे में शक है तो मैं उससे बहस करने और हिंदू श्लोकों के पाठ में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हूं.
मुख्यमंत्री का सवाल
ममता का कहना था, "जो लोग यहां हिंदुओं और मुसलमानों में विभाजन पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं, उनको पहले यह साबित करना होगा कि वे कितने बेहतर हिंदू हैं. वह पार्टी 70-30 के आंकड़ों से खेल रही है."
उसके बाद ही ममता ने मंच से चंडीपाठ शुरू कर दिया. मुख्यमंत्री का सवाल था कि बीजेपी उन पर बाहरी होने के आरोप लगा रही है. लेकिन अगर बाहरी होतीं तो दस साल से मुख्यमंत्री कैसे हैं?
ममता ने अपनी पहली सभा में नंदीग्राम को मॉडल बनाने का भरोसा देते हुए इलाक़े में एक विश्वविद्यालय और हल्दिया से जोड़ने वाला एक ब्रिज बनवाने की भी बात कही.
ममता ने इलाक़े के एक मंदिर में दर्शन-पूजन किया. अब बुधवार को नामांकन दाख़िल करने के बाद बृहस्पतिवार को शिवरात्रि के मौक़े पर मंदिर में पूजा के बाद वे कोलकाता लौटेंगी.
यहां शाम को उनको पार्टी का चुनाव घोषणापत्र जारी करना है. यहां इस बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि सोमवार को सुबह नंदीग्राम के विभिन्न इलाक़ों में ममता को बाहरी बताते हुए पोस्टर लगे थे.
उनमें लिखा था, "नंदीग्राम मेदिनीपुर के भूमिपुत्र को चाहता है, किसी बाहरी को नहीं." दूसरी ओर, बीजेपी ने अब ममता के नए हिंदुत्व पर सवाल उठाया है.
बंगाल की संस्कृति
हाल तक टीएमसी के राज्यसभा सदस्य रहे बीजेपी नेता दिनेश त्रिवेदी कहते हैं, "हालत यहां तक पहुँच गई है कि ममता को अब हिंदू के तौर पर नए सिरे से अपना परिचय देने की नौबत आ गई है. अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोपों से बचने के लिए ही वे हिंदू ब्राह्मण होने का दावा करते हुए चंडीपाठ कर रही हैं. इससे साफं है कि उन्होंने आम लोगों का भरोसा खो दिया है."
नंदीग्राम सीट पर बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने ममता पर चंडीपाठ ग़लत पढ़ने और बंगाल की संस्कृति का अपमान करने का आरोप लगाया है.
उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा, "इससे पहले मुख्यमंत्री भगवान राम का कई बार अपमान कर चुकी हैं. सरस्वती मंत्र का ग़लत पाठ किया और अब रैली में चंडीपाठ का ग़लत जाप किया है. उन्होंने बंगाल की संस्कृति का बार-बार अपमान किया है. बंगाल के लोग राज्य का अपमान करने वाले का कभी समर्थन नहीं करेंगे."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ख़ासकर नंदीग्राम के जातीय समीकरणों और बीजेपी के हिंदू कार्ड के बढ़ते इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए ममता ने तीन दिन के इस दौरे पर ख़ुद को हिंदू साबित करने का प्रयास किया है.
इलाक़े के वरिष्ठ पत्रकार आरके साहू कहते हैं, "यह सीट दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है. इसलिए तमाम पार्टियां यहां साम-दाम-दंड-भेद अपनाने से नहीं चूक रही हैं."
दुर्गा पूजा समितियों को अनुदान
ममता बनर्जी पर अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण के आरोप कोई नए नहीं हैं. वर्ष 2011 में राज्य की सत्ता में आने के साल भर बाद ही ममता ने इमामों को ढाई हज़ार रुपए का मासिक भत्ता देने का एलान किया था. उनके इस फ़ैसले की काफ़ी आलोचना की गई थी. कलकत्ता हाईकोर्ट की आलोचना के बाद अब इस भत्ते को वक्फ़ बोर्ड के ज़रिए दिया जाता है.
यही वजह है कि अपनी छवि पर लगे इस दाग़ को धोने के लिए उन्होंने बीते साल से ही हिंदू वोटरों को लुभाने की क़वायद शुरू की था. पहली बार हिंदू-हिंदी और दलितों पर ध्यान देते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के आठ हज़ार से ज़्यादा ग़रीब ब्राह्मण पुजारियों को एक हज़ार रुपये मासिक भत्ता और मुफ़्त आवास देने की घोषणा की थी.
हिंदी भाषी वोटरों को अपने साथ जोड़ने के लिए तृणमूल कांग्रेस की हिंदी सेल का गठन किया और पश्चिम बंगाल हिंदी समिति का विस्तार करते हुए कई नए सदस्यों और पत्रकारों को इसमें शामिल किया गया है.
इसके साथ ही पहली बार दलित अकादमी के गठन का एलान करते हुए सड़क से सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाले मनोरंजन ब्यापारी को इसका अध्यक्ष बनाया गया.
ममता ने राज्य की लगभग 37 हज़ार दुर्गा पूजा समितियों को 50-50 हज़ार रुपये का अनुदान भी दिया था. इसके साथ ही आयोजन समितियों के टैक्स भी माफ़ कर दिए गए.
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