रेप पीड़िता से शादी वाली टिप्पणी पर बोले मुख्य न्यायाधीश बोबडे

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सुप्रीम कोर्ट में बलात्कार के एक मामले में सुनवाई के दौरान कथित तौर पर अभियुक्त और पीड़िता की शादी के मामले पर उच्चतम न्यायालय ने नाराज़गी जताते हुए इसे 'पूरी तरह ग़लत सूचना देने का' मामला बताया है.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबडे की खंडपीठ ने सोमवार को सफ़ाई जारी की. चौदह साल की एक रेप पीड़िता के मामले की सुनवाई कर रही इस बेंच में जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन भी शामिल थे. पीड़िता ने सर्वोच्च न्यायालय से गर्भपात की माँग की है.
इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने साफ़ कहा, "हमने स्त्रीत्व को सर्वोच्च सम्मान दिया है. हमने पूछा था कि क्या आप शादी करने जा रहे हो. हमने 'शादी' करने का आदेश नहीं दिया था."
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश के बयान का समर्थन करते हुए कहा, "आपने अलग संदर्भ में सवाल पूछा था. आपकी बात का अलग तरह से हवाला दिया गया."
अधिवक्ता बीजू ने कथित तौर पर ग़लत सूचना देने को 'सर्वोच्च न्यायालय की छवि को ख़राब करने वाला बताया.'
उन्होंने कोर्ट की प्रतिष्ठा को ख़राब करने से रोकने के लिए एक तंत्र बनाने की भी बात की जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने कहा कि 'हमारी प्रतिष्ठा हमेशा बार के हाथों में है.'
न्यायालय ने अंत में पीड़िता के परिजनों से बात करने की इच्छा जताई और इस मामले को 12 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया.

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आख़िर क्या है मामला
बीते सप्ताह कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का हवाला देते हुए कुछ ख़बरें प्रकाशित हुई थीं जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने रेप के अभियुक्त को पीड़िता के साथ विवाह करने को कहा है.
दरअसल, बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में एक दूसरे बलात्कार के मामले की सुनवाई हो रही थी जिसमें एक सरकारी कर्मचारी पर एक नाबालिग़ लड़की के साथ कई बार बलात्कार करने का आरोप है. मुख्य न्यायाधीश ने अभियुक्त से पूछा था कि वो क्या रेप पीड़िता के साथ शादी करने जा रहा है?
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने याचिकाकर्ता को सेशंस कोर्ट से मिली अग्रिम ज़मानत को ख़ारिज कर दिया था जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था. मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि, "क्या आप उससे शादी करेंगे?" इस पर वकील ने जवाब दिया था, "मैं उनसे निर्देश लूंगा."
इस पर मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने कहा, "युवा लड़की के बलात्कार और शोषण से पहले आपको सोचना चाहिए था. आप जानते हैं कि आप एक सरकारी कर्मचारी हैं."
इसके बाद न्यायालय ने याचिकाकर्ता की गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी और उसे चार सप्ताह के लिए अंतरिम राहत दे दी थी. हालांकि, याचिकाकर्ता की माँग थी कि उसे नियमित ज़मानत दी जाए.
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