केरल में क्या कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर देंगे पिनाराई विजयन

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
दक्षिण भारत के राज्य केरल में आजकल कुछ ऐसा महसूस किया रहा है, जो वहाँ की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बिल्कुल उलट है.
जिस तरह 2016 में जे जयललिता ने तमिलनाडु में लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की थी, ठीक वैसा ही रिकॉर्ड बनाने की बात मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के बारे में की जा रही है.
तमिलनाडु की तरह ही केरल और कुछ हद तक कर्नाटक भी, दक्षिण के वे राज्य हैं, जहाँ की जनता दशकों से लगातार किसी एक पार्टी को दोबारा सत्ता देने से परहेज करती रही है.
अगर एक चुनाव में सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ़) की जीत होती है, तो अगले में कांग्रेस के अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ़) की जीत होती रही है.
ठीक ऐसा ही तमिलनाडु में भी था, जहाँ डीएमके और एआईएडीएमके के बीच यह अदला-बदली हुआ करती थी. यह कहानी जयललिता की लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी तक बदस्तूर चलती रही. केरल में जैसा आजकल महसूस किया जा रहा है, तब तमिलनाडु में वो नहीं किया गया था.
वहाँ इस भावना के उभरने की मुख्य वजह ये है कि एलडीएफ़ को पंचायत, नगरपालिका और नगर निगमों तीनों चुनावों में बहुमत मिला. वास्तव में, स्थानीय निकाय चुनाव कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या होने वाला है, इसे इसका एक संकेत कहा जा सकता है.
दिसंबर में हुए चुनाव में एलडीएफ़ ने 40.2 फ़ीसद वोट हासिल किए और अधिकांश स्थानीय निकायों पर उसका नियंत्रण रहा. यूडीएफ़ ने 37.9 फ़ीसद वोट हासिल किए जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए को 15 फ़ीसद वोट मिले.
हालाँकि, परिणाम आने के दो महीने बाद भी काँग्रेस सदमे में है. आलाकमान ने तुरंत कार्रवाई की और पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए लाया गया. इसके बावजूद कम्युनिस्टों को अभी पूरा यक़ीन है कि उनकी सत्ता इस बार भी कायम रहेगी.
सीपीएम और एलडीएफ़ के संयोजक ए विजयराघवन ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''इस बार हमारी पार्टी की सरकार के सत्ता में बने रहने की पूरी संभावना है. कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं है. स्थानीय निकाय के चुनाव नतीजे भी यही संकेत दे रहे हैं.''

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क्या है इस विश्वास की वजह?
पूर्व सांसद एमपी राजेश ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''इस विश्वास के पीछे कारण है सरकार का अब तक का प्रदर्शन. कोरोना वायरस महामारी होने के बावजूद पेंशन योजना में दायरे में 60 लाख लोगों को लाया गया और राशन किट 88 लाख लोगों के घरों तक पहुँचाए गए. कोविड-19 के रोगियों का इलाज अब भी मुफ़्त हो रहा है और हमारे सरकारी अस्पतालों इसके इलाज की कहीं बेहतर व्यवस्था है.''
सीपीएम नेताओं का कहना है कि केंद्रीय एजेंसियों के सोने की तस्करी के रैकेट के बारे में जो हो-हल्ला मचाया या राज्य पार्टी के सचिव कोडिएरी बालकृष्ण के बेटे की मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कथित संलिप्तता पर जो राजनीति की गई, उसने चुनाव में कुछ ज़्यादा असर नहीं डाला.
राजेश के साथ ही अन्य नेता जैसे कि पोलितब्यूरो सदस्य प्रोफ़ेसर एमए बाबी हालाँकि यह स्पष्ट करते हैं कि एलडीएफ के कार्यों को केवल महामारी या बाढ़ के दौरान ही नहीं बल्कि कई अन्य मोर्चों पर भी नहीं मापा जा सकता है, ख़ास कर ढांचागत विकास के मामलों में.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और जाने माने रणनीतिकार चांडी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''सत्ता में उनकी वापसी का सवाल ही नहीं उठता. हाँ, उनके दावे कई हैं लेकिन ये केवल मीडिया विज्ञापनों तक सीमित हैं. एलडीएफ़ के कामकाज को चिह्नित करने जैसा कुछ भी नहीं है.''

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जाने माने राजनीतिक टीकाकार बीआरपी भास्कर ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि विजयन की एक सफल मुख्यमंत्री की छवि है. शायद, पिछली एलडीएफ़ सरकारों की तुलना में सबसे अच्छी. उनके संवाद कौशल अच्छे हैं और एक संकटकालीन स्थिति में उनकी रोज़ाना ब्रीफिंग ने अच्छा प्रभाव डाला है.''
राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि एलडीएफ़ के पास स्थानीय निकाय चुनाव में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले केरल कांग्रेस (मणि) के एक धड़े का साथ है. केरल कांग्रेस (मणि) के नेता जोस के मणि हैं, जो इसके दिवंगत संस्थापक और कद्दावर राजनीतिज्ञ केएम मणि के पुत्र हैं. जोस यूडीएफ से एलडीएफ़ में शामिल होने के लिए अलग हो गए थे क्योंकि कांग्रेस ने केरल कांग्रेस (मणि) की आंतरिक लड़ाई में उनके प्रतिद्वंद्वी का साथ देने का फ़ैसला किया था.
पार्टी में उनके आने से केरल के मध्य और दक्षिणी ज़िलों (कोट्टायम, पठानमथिट्टा, इडुक्की आदि) के ईसाई समुदाय के गढ़ की निष्ठा एलडीएफ की ओर चली गई. जोस मणि ने वो किया जो बीते वर्षों के दौरान सीपीएम के लिए हासिल कर पाना संभव नहीं हो सका था.
मुख्यमंत्री विजयन ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान बतौर पार्टी सचिव, आर्थिक रूप से कमज़ोर ईसाइयों और मुसलमानों के बीच पार्टी का जनाधार बढ़ाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया था. एलडीएफ में जोस मणि का आना इस ओर एक वरदान के रूप में देखा जा सकता है.

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आसान नहीं है आकलन करना
स्थानीय निकाय चुनाव में ख़ासकर अपने गढ़ में हुई हार ने काँग्रेस आलाकमान की नींद उड़ा दी है. तारिक़ अनवर के नेतृत्व वाली टीम की रिपोर्ट के बाद पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी ने पार्टी के नेताओं के बीच मतभेद सुलझाने की कोशिश की.
उनके हस्तक्षेप के बाद बीमार चांडी की सक्रिय राजनीति में वापसी हुई. वे विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्नीथला और केरल काँग्रेस अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन के साथ पार्टी के चुनावी अभियान की महत्वपूर्ण तिकड़ी का हिस्सा बन गए.
हालाँकि, चांडी ने कहा है कि ''केरल काँग्रेस (मणि) का प्रभाव लंबे वक़्त तक नहीं रहेगा क्योंकि केएम मणि और उनके प्रशंसक जानते हैं कि सीपीएम ने झूठे आरोप लगाकर और यहाँ तक कि विरोध प्रदर्शन के ज़रिए भी उनके साथ क्या किया. सीपीएम को उनके इस कदम से ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा.''
राजनीतिक टीकाकार बीआरपी भास्कर ने कहा, ''चांडी को लाने का प्रयास स्पष्ट रूप से काँग्रेस (मणि) के प्रभाव को बेअसर करने के लिए है.''
एलडीएफ नेता चांडी से चुनौती मिलने को लेकर ज़्यादा चिंतित नहीं दिखते और इसे ''काँग्रेस में नेतृत्व के संकट का उदाहरण'' मानते हैं. इन नेताओं ने पीरियड्स के दौरान महिलाओं के सबरीमला मंदिर में अयप्पा स्वामी के दर्शन को मिली एलडीएफ़ की अनुमति को मुद्दा बनाने के काँग्रेस के प्रयास को भी ख़ारिज कर दिया.

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एक राजनीतिक जानकार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, ''सबरीमला मुद्दा इसिलिए उठा क्योंकि एलडीएफ़, काँग्रेस के एक मुस्लिम पार्टी के साथ साझेदारी की संभावना के मुद्दे को उठा रहा था.''
राजनीतिक हलकों में यह माना जाता है कि स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम में एलडीएफ़ की जीत ने पार्टी को एक गति प्रदान की है, और इसका बखूबी साथ दिया कोविड-19 के शुरुआती महीनों के दौरान ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता का लोगों के बीच राशन और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में काम करना.
राजनीतिक जानकार जोसेफ मैथ्यू बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ''यह जीत तक ले जा सकती है या नहीं, यह कहना जल्दबाज़ी होगी. जो तय है वो ये कि यह दोतरफ़ा नहीं होगा. बीजेपी बहुत अधिक सीटें नहीं जीत सकती है, लेकिन वे कम से कम दो दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों में अन्य पार्टियों की रणनीति को बिगाड़ सकते हैं.''
मैथ्यू ने सदियों पुराने केरल मलनकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च और जैकोबाइट सीरियन क्रिश्चियन चर्च के बीच विवाद की ओर इशारा किया. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद दोनों के बीच विवाद अभी सुलझा नहीं है.
और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप से, कम-से-कम अब तक, मदद मिलने की संभावना नहीं लगती. लेकिन, इससे बीजेपी को ईसाइयों के कुछ वोट मिलने की संभावना से भी कोई इनकार नहीं कर सकता.
सीपीएम राज्य सचिवालय सदस्य पी राजीव ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह मुख्य मुद्दा नहीं है. हम सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के दायरे में ही आम सहमति लाने का प्रयास कर रहे हैं. प्रभावकारी व्यवस्था तय की जाएगी. फ़िलहाल, यह प्रक्रिया चल रही है.''
यह स्थापित तथ्य है कि केरल में एलडीएफ़ और यूडीएफ़ दोनों की अच्छी ख़ासी पकड़ है. यह भी सर्वविदित है कि केरल के दक्षिण और मध्य ज़िलों में मतदाताओं का एक छोटा वर्ग इन दोनों में से किसी न किसी एक पार्ट को मजबूत स्थिति प्रदान करता है.
भास्कर कहते हैं, ''फिलहाल, आप किसी एक पार्टी को ख़ारिज नहीं कर सकते. यह बेहद क़रीबी चुनाव हो सकता है.''

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