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उत्तराखंड ग्लेशियर हादसा: तपोवन टनल से 200 मीटर की दूरी पर अपनों की तलाश में भटकते परिजन
- Author, ध्रुव मिश्रा
- पदनाम, तपोवन से, बीबीसी हिंदी के लिए
संजय यादव दिल्ली में अपना नौकरी छोड़कर उत्तराखंड के तपोवन में बाराबंकी निवासी अपने साले संतोष यादव को ढूँढने के लिए आए थे.
संजय ने बताया, "मेरे साले संतोष तपोवन में ओम मेटल नाम की कम्पनी में काम करते थे, 7 फरवरी को आई आपदा के बारे में जब पता लगा तो उन्हें कई फ़ोन किए लेकिन नंबर पर संपर्क नहीं हो पाया. नौ फरवरी को मैं यहां पहुंचा तो रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है, लेकिन कुछ पता नहीं चल पा रहा है."
संजय ने बताया, "कंपनी वालों से भी बात की लेकिन कोई कुछ नहीं बता रहा है. ये भी बताया जा रहा है कि वो कहाँ काम करते थे लेकिन कहाँ हैं, उनकी डेड बॉडी मिली है या नहीं, कुछ नहीं पता है."
जब रात बढ़ने लगी तो संजय को स्थानीय होटल वालों ने एक रात रुकने के लिए एक कमरा दिया क्योंकि बाहर ठंड बहुत थी और रात में शीत लहर चल रही थी.
अगले दिन यानी 10 फरवरी को संजय रेस्क्यू ऑपरेशन वाली जगह पर फिर गए वहां एक टेंट लगाकर पूछताछ केंद्र बना हुआ है लेकिन वहां पर भी संजय को अपने साले के बारे में कोई ज़्यादा जानकारी नहीं मिल पाई.
संजय को अपनी नौकरी पर भी लौटना था, लिहाज़ा वो साले की उम्मीद छोड़कर दिल्ली वापस चले गए. लेकिन लौटते वक्त ये सवाल उनके चेहरे पर बना हुआ था कि घर वालों को क्या जवाब देंगे.
तपोवन की टनल में जहां पर रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है उससे करीब 200 मीटर की दूरी पर एक टेंट लगा हुआ है यहीं पर पूछताछ केंद्र बनाया गया है.
जहां रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है वहाँ किसी को जाने की इजाज़त नहीं है सिर्फ़ मीडिया वालों को ही इससे आगे जाने दिया जा रहा है. इस टेंट के अंदर अपनों की तलाश में बिलखते परिजन पहुंच रहे हैं. आगे उन्हें जाने नहीं दिया जा रहा है और वे यहां आशंकाओं से सहमे सुबकते दिखाई देते हैं.
इसी टेंट में बैठे टिहरी निवासी रमेश पुंडीर ने बताया, "मेरे चाचा आलम सिंह पुंडीर यहाँ तपोवन में इलेक्ट्रिकल फोरमैन थे. सात फरवरी को जैसे ही हमें घटना के बारे में पता चला हमने चाचा को फ़ोन करना शुरू कर दिया जब फ़ोन नहीं लगा तब सात फरवरी की रात को ही टिहरी से चल दिए और आठ फरवरी को सुबह पांच बजे यहां घटनास्थल पर पहुंच गए हैं."
रमेश के मुताबिक जब वे यहां पहुंचे तब से यहां अफरातफरी का माहौल है. उनके मुताबिक आठ फरवरी को यहां कोई भी व्यवस्था नहीं थी, ना कोई पूछताछ केंद्र था. बस लोग अपने परिजनों की तलाश में यहां दर बदर भटक रहे थे.
उन्होंने बताया, "नौ तारीख को प्रशासन ने यहां पर पूछताछ केंद्र के लिए टेंट लगवाया लेकिन अभी तक यहां हमारे लिए कोई रुकने की खाने पीने की किसी भी तरह की कोई व्यवस्था नहीं की गई. हम लोग यहाँ से करीब 15 किलोमीटर दूर जोशीमठ में रुकने के लिए जाते हैं फिर सुबह को यहां से वापस चले आते हैं इस उम्मीद में की आज शायद हमें हमारे चाचा के बारे में कुछ पता चल जाए."
टिहरी के आगरखाल निवासी रोशन लाल पूछताछ केंद्र के लिए बने टेंट में बैठे अपने भतीजे की फ़ोटो देख कर रो रहे है. रोशन लाल बताते हैं, "मेरा भतीजा राहुल यहां मलबे में फंसा हुआ है उसकी कोई खैर ख़बर नहीं है आख़िरी बार उससे फ़रवरी को 9.30 बजे सुबह बात हुई थी उसे 10 बजे टनल पर पहुंचना था वो 10 बजे टनल पर पहुँचा फिर 10.30 को आपदा आ गई उसके बाद से कोई बातचीत उससे नहीं हो पाई है."
"हम लोग यहाँ अपनी गाड़ी से आए हैं यहां से 15 किलोमीटर दूर जोशीमठ में एक होटल में रह रहे हैं सुबह यहां चले आते हैं रात को जोशीमठ सोने चले जाते हैं. खाने पीने का भी सब ऐसा ही है कभी इधर कोई संस्था दे देती है तो खा लेते हैं, पर एक उम्मीद है कि राहुल का कुछ पता ज़रूर लगेगा, बिना कुछ पता करे जा भी नहीं सकते. यहां पर हम किसी को जानते भी नहीं हैं ना किसी को पहचानते हैं और ना ही हमारी कोई पूछ लेने वाला है ना कोई बताने वाला है कि हमारा बच्चा कहां है किस हाल में है."
इन लोगों को अपने परिजनों के बारे में 12 फरवरी की शाम तक भी कोई खोज ख़बर नहीं मिल सकी है.
वहीं ज़िला प्रशासन का कहना है कि लोगों की मदद के लिए सारी व्यवस्था की जा रही हैं. चमोली की ज़िलाधिकारी स्वाति भदौरिया ने बताया, "जो मलबे में फंसे हुए हैं उनके परिजनों के लिए यहां पर एक हेल्प डेस्क बनाया गया है जहां पर तीन सुविधाएं हैं. हमने मिसिंग और डेड की सूची बनाई है. जो डेड हैं, हमने उनकी बॉडीज़ रखी हुई हैं. उन सबकी फोटोज भी हैं क्योंकि कुछ ही बॉडीज आईडेंटिफाई हो पायी हैं. वहां पर खाने पीने की व्यवस्था की गई है जिसमें की लाइट स्नेक्स और प्रॉपर खाने की व्यवस्था है. अगर परिजनों को ठहरने की कोई दिक्कत है तो हम उस की भी व्यवस्था करा रहे हैं."
हालांकि ज़िलाधिकारी के मुताबिक एक बड़ी मुश्किल ये है कि जो डेड बॉडी हैं वो अलग अलग जगह पर हैं जैसे कोई गोपेश्वर में है तो कोई कर्णप्रयाग में तो कोई रुद्रप्रयाग में है, एक इंसान हर जगह जाकर बॉडी की शिनाख्त नहीं कर सकता इसलिए तस्वीरों के ज़रिए डेड बॉडी की पहचान कराने की कोशिश की जा रही है.
सर्च ऑपरेशन की क्या स्थिति है?
उत्तराखंड के डीजीपी अशोक कुमार ने बताया है कि तपोवन वाली टनल से मलबा निकाले जाने का काम जारी है.
ख़बर लिखे जाने तक अभी तक टोटल 35 लाशें मिल गई हैं जिनमें 10 की पहचान हो पायी है. अपनों की तलाश में लोगों का आना लगा हुआ है. जबकि टनल में आर्मी, आईटीबीपी, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें सर्च ऑपरेशन में लगी हुई हैं.
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