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उत्तराखंड ग्लेशियर हादसा: 'चिपको आंदोलन' के लिए प्रसिद्ध गांव जिस पर क़ुदरत का क़हर टूट पड़ा- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, ध्रुव मिश्रा
- पदनाम, चमोली उत्तराखंड से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड के चमोली ज़िले का रैणी कोई साधारण गांव नहीं है. सत्तर के दशक में पेड़ों को बचाने के लिए चले विख्यात 'चिपको आंदोलन' का केंद्र यहीं था.
लेकिन इस बार ये गांव एक भयानक प्राकृतिक आपदा का गवाह बना.
73 साल के बुज़ुर्ग अव्वल सिंह कन्याल धौलीगंगा नदी के एक किनारे पर खड़े होकर, नदी के उस पार, दूर पहाड़ों पर स्थित घरों को देखते हुए रो रहे हैं. पास ही लोगों की भीड़ लगी हुई है. बीच-बीच में लोग उन्हें चुप कराने की कोशिश करते हैं.
लोग उनको ढांढस बंधा रहे हैं, बता रहे हैं कि जल्द ही उन्हें अपने गांव तक पहुंचाने का इंतज़ाम हो जाएगा.
अव्वल सिंह रोते हुए अपनी स्थानीय भाषा में कहते हैं, "मैं त आज नि भोलदका पहुंची जालु पर मेरा परिवार की क्वे खैर खबर नी मिलड़ी, क्वे त मीरी बात करे द्यावा तोंसी कना हुला ई बिचारा" (मैं आज नहीं तो कल पहुँच जाऊँगा, पर मेरे परिवार की कोई ख़ैर ख़बर नहीं मिल रही, कोई तो मेरी बात उनसे करवा दो. कैसे होंगे वो बेचारे?)
कुछ देर बाद अव्वल सिंह शांत हुए और बीबीसी से बात की.
अव्वल सिंह हाथों से इशारा करते हुए बताते हैं, "मेरा गांव भंग्युल धौलीगंगा नदी के दूसरी तरफ, दूर उस पहाड़ पर है. मैं सात फरवरी को दवाई लेने के लिए जोशीमठ आया था. जब मैं वापस तपोवन तक पहुँचा तो लोगों ने बताया कि नदी में पानी अचानक से बढ़ गया है, आप वहाँ न जाएं, काफी नुकसान हुआ है."
वहीं उन्हें पता चला कि उनके गांव को जोड़ने वाला एकमात्र पुल बाढ़ में बह गया है. तीन दिन हो गए, अव्वल सिंह वापस अपने गांव नहीं लौट पाए हैं.
कई गांवों से टूटा संपर्क
सात फरवरी को चमोली में जो आपदा आई उसकी वजह से कई गांवों का संपर्क टूट गया है. सबसे पहले रैणी गांव में ऋषिगंगा नदी पर बना पुल टूटा था. स्थानीय लोगों के मुताबिक क़रीब 16 गांवों के लोग इस पुल का शहर की तरफ आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते थे.
ऋषिगंगा नदी पर बना ये पुल इसलिए भी अहम था क्योंकि इसका इस्तेमाल सेना की गाड़ियां भारत-चीन सीमा पर पहुंचने के लिए करती थीं. रैणी गांव से करीब 5 किलोमीटर ऊपर पहाड़ पर दो गांव हैं जिनका नाम मुरण्डा और पेंग है.
इन दोनों गांवों की तरफ़ जाने के लिए सिर्फ एक छोटी सी पगडंडी हुआ करती थी वो अब आपदा की वजह से पूरी तरह टूट चुकी है इन दोनों गांवों की तरफ़ जाने का कोई रास्ता अब नहीं बचा है.
डर के मारे जंगलों में भाग गए थे लोग
रैणी गांव की बीना राणा बताती हैं कि जब ये आपदा आई थी तो अचानक ऊपर की तरफ धूल उड़ने लगी, चारों तरफ़ धुंआ सा बिखरने लगा था. शुरू में उन्हें समझ ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है.
बीना के घर से ऋषिगंगा हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट साफ दिखाई देता है. उन्होंने वहीं से देखा कि कंपनी के लोग बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे. देखते ही देखते मलबा कंपनी में घुस गया.
गांव वाले भयानक शोर और धुएं के गुबार को देखकर, डर के मारे जंगल की तरफ़ भागने लगे.
बीना ने बीबीसी को बताया, " हम लोग अभी भी डरे हुए हैं. कई लोग तो रात को जंगलों की तरफ, ऊपर की ओर चले जाते हैं. उन्हें अब भी डर है कि कहीं फिर से सैलाब न आ जाए."
गांव वालों का आरोप है कि कंपनी के निर्माण कार्य की वजह से निचले इलाकों में स्थित उनके खेतों में काफी ज़्यादा भूस्खलन हुआ और वह सारे के सारे बह गए हैं.
कुछ गांव वाले इतना डर गए हैं कि वो सरकार से उन्हें कहीं और बसाने की गुज़ारिश भी कर रहे हैं.
मलबे में दबा है बेटा, परिवार को इंतज़ार
ऋषिगंगा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट में काम करने वाले रणजीत सिंह राणा हादसे के बाद से मलबे में दबे हुए हैं.
इनके पिता खेम सिंह राणा को कैंसर है उनकी दोनों टांगे ख़राब हैं उनसे चला नहीं जाता है. अभी पिता को नहीं बताया गया है कि उनका बेटा मलबे में दबा हुआ है.
रणजीत राणा की एक बहन और एक भाई भी हैं और दोनों ही विकलांग हैं. राणा ही एक अकेले घर में कमाने वाले हैं.
उनकी बुज़र्ग मां बेटे को लेकर आस लगाए बैठी हैं और याद करते हुए रोती रहती हैं.
राणा की मां बीबीसी से बात करते हुए कहती हैं, "अगर हमारा बच्चा ही नहीं रहेगा तो हमें कौन खाना पीना देगा. शासन प्रशासन की टीमें आ गई हैं लेकिन ऊपर की तरफ मशीनें नहीं चला रही हैं जिससे मेरे बच्चे का कुछ पता चल सके. वो लोग बोल रहे हैं कि बॉर्डर का रास्ता टूट गया है पहले उसको सही करेंगे. आप बॉर्डर के रास्ते सही करेंगे और हम क्या ऐसे ही मरते रहेंगे कम से कम ज़्यादा मशीनें लगाकर उसे ढूंढ दो."
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