लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर के ट्वीट की जाँच से क्या हासिल करना चाहती है महाराष्ट्र सरकार?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उद्धव ठाकरे जब से सत्ता में आए हैं, महाराष्ट्र सरकार हमेशा सुर्ख़ियों में ही बनी रहती है.
कभी कोरोना महामारी की वजह से, तो कभी अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के मामले में, तो कभी कंगना रनौत मामले में और कभी सत्ताधारी गठबंधन में शामिल तीनों पार्टियों की आपसी खींचतान की वजह से.
लेकिन इस बार का मामला कई सेलेब्रिटी की ओर से किए गए ट्वीट्स से जुड़ा है.
कांग्रेस के नेता सचिन सांवत ने सोमवार को यूट्यूब लाइव के ज़रिए महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख के सामने एक गुहार लगाई.
पूरा मामला दिल्ली के किसान आंदोलन से जुड़ा है. पॉप सिंगर रिहाना और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थर्नबर्ग के ट्वीट के बाद जब भारत के विदेश मंत्रालय ने अपना बयान जारी किया, उसके बाद एक के बाद एक कई भारतीय मशहूर हस्तियों ने भारत सरकार के समर्थन में ट्वीट किए.
इनमें अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, सायना नेहवाल, सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर, अजय देवगन, विराट कोहली जैसी कई मशहूर हस्तियाँ शामिल थी.

इमेज स्रोत, Twitter/Sachin Sawant
सचिन सांवत की माँग
कांग्रेस नेता सचिन सांवत ने इन हस्तियों के ट्वीट्स दिखाते हुए तीन मुद्दे उठाए हैं और एक माँग महाराष्ट्र सरकार से की है.
उन्होंने सवाल उठाया कि इनमें से कई हस्तियों के ट्वीट एक जैसे हैं. ऐसा कैसे? मिसाल के तौर पर अक्षय कुमार और सायना नेहवाल के ट्वीट एक दूसरे से शब्दश: मिलते हैं.

इमेज स्रोत, Twitter
दूसरा सवाल है - एक शब्द 'एमिकेबल' विराट कोहली, सुरेश रैना, अक्षय कुमार और अनिल कुंबले- सभी के ट्वीट में कॉमन था. ऐसा कैसे संभव है?

इमेज स्रोत, Twitter
तीसरा सवाल है कि फ़िल्म अभिनेता सुनील शेट्टी ने अपने ट्वीट में बीजेपी के मुंबई प्रदेश के उपाध्यक्ष को टैग भी किया है. आख़िर क्यों और कैसे?

इमेज स्रोत, Twitter
इन तीनों सवालों के आधार पर सचिन सावंत की माँग है कि इस बात की जाँच होनी चाहिए कि कहीं इन हस्तियों से ट्वीट किसी दवाब में तो नहीं कराए गए.
बीबीसी से बातचीत में सचिन सांवत ने स्पष्ट किया कि जाँच ट्वीट की नहीं होनी है, जाँच इस बात की होनी चाहिए कि ये हस्तियाँ किसी दवाब में तो ये ट्वीट नहीं कर रहीं.
वो कहते हैं, "अगर उन पर कोई दवाब की बात सामने आती है, तो ये पता करना चाहिए कि दवाब किसका है और क्या इन हस्तियों को सुरक्षा की ज़रूरत तो नहीं."
ट्वीट्स पर राजनीति
लेकिन क्या ये हस्तियाँ दवाब में आकर ऐसा कर सकती हैं और क्या पूछताछ करने पर ये बात कभी कोई हस्ती स्वीकार करेगी?
इस सवाल के जवाब में सचिन सावंत कहते हैं, "कई बार किडनैपिंग के मामले में डर से कई लोग कुछ नहीं बोलते. इसका मतलब ये नहीं कि पुलिस जाँच करना छोड़ दे."

इमेज स्रोत, youtube
कांग्रेस नेता सचिन सावंत की गुहार पर महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वो पूरे मामले की इंटेलिजेंस जाँच कराएँगे. जाँच कब शुरू होगी, सेलेब्रिटी से सिर्फ़ पूछताछ होगी या मामले की रिपोर्ट कब तक आएगी, इस पर अभी कोई ठोस जानकारी नहीं है.
पूरे मामले पर महाराष्ट्र सरकार कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गृह मंत्री कोरोना के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हैं और वहीं से उन्होंने इस जाँच की घोषणा की है. तस्वीरों में ये देखा जा सकता है.
लेकिन इन दोनों बयानों के आधार पर राज्य में राजनीति शुरू हो गई है.
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट कर महाराष्ट्र सरकार के इस फ़ैसले को 'मराठी अस्मिता' से जोड़ दिया और लिखा कि ऐसे 'रत्न' कहाँ मिलेंगे, जो 'भारत रत्न' के ख़िलाफ़ जाँच के आदेश देते हैं, जो हमेशा देश के साथ खड़े रहते हैं.
इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट X समाप्त
दरअसल रिहाना और ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट के बाद केंद्रीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में दो हैशटैग (#IndiaTogether और #IndiaAgainstPropaganda) का इस्तेमाल किया गया था. इन्हीं दो हैशटैग के साथ कई सेलेब्रिटी ने ट्वीट किए.
उनमें से सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर वो नाम हैं, जिन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न मिल चुका है. लता मंगेशकर को 2001 में भारत रत्न दिया गया था, जब केंद्र में बीजेपी के सरकार थी और सचिन तेंडुलकर को 2013 में भारत रत्न मिला, जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी. दोनों ही महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं.
इसलिए महाराष्ट्र में ये मुद्दा राजनीतिक रंग ले रहा है.
दरअसल जिन हस्तियों ने सरकार की ओर से जारी हैशटैग के साथ ट्वीट किया, उनको केंद्र सरकार के साथ खड़ा माना जा रहा है. लेकिन कई मशहूर हस्तियाँ ऐसी भी हैं, जिन्होंने इस पूरे मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी. फ़िल्म इंडस्ट्री के तीनों ख़ान का नाम इसी सूची में आता है. इसलिए महाराष्ट्र की राजनीति में बहस इस बात की छिड़ गई है कि कौन सेलेब्रिटी किसके साथ है.
महाराष्ट्र और मुंबई में 30 साल से पत्रकारिता कर रहे लोकमत के वरिष्ठ सहायक संपादक यदु जोशी कहते हैं, "महाराष्ट्र में पिछले कुछ महीने से 'बदले की राजनीति' चल रही है. इसमें कभी ईडी आता है, तो कभी सीबीआई, तो कभी राज्य की पुलिस और दूसरी स्टेट मशीनरी. महाराष्ट्र में ऐसी राजनीति पहले कभी देखने को नहीं मिली थी."
"पहले जब पंतग उड़ाते थे, तो धागे से एक दूसरे की पतंग काटते थे. अब धागे की जगह चाइनीज़/ नायलन मांझे ने ली है. उससे पतंग भी कटती है, लेकिन गला भी कटता है. फ़िलहाल वैसी ही गला काटने वाली राजनीति महाराष्ट्र में चल रही है."
यदु जोशी कहते हैं कि इसके लिए दोनों तरफ़ की पार्टियाँ ज़िम्मेदार है. वो सवाल करते हैं, "लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर का दोष क्या था - उन्होंने एक ट्वीट किया कि बाहर के लोगों को भारत के मामले में बोलना नहीं चाहिए. ये इतना बड़ा गुनाह तो है नहीं कि स्टेट पुलिस इसकी जाँच करें."
एनसीपी नेता शरद पवार ने भी कहा कि अपना क्षेत्र छोड़ कर दूसरे के क्षेत्र में बात नहीं करनी चाहिए. तो इन हस्तियों के ट्वीट पर उन्हें कठघरे में खड़ा करने का राज्य सरकार का दायरा है या नहीं - यह भी सोचा जाना चाहिए.
शरद पवार ने कहा है, "किसान आंदोलन के बारे में जो भी विचार दोनों तरफ से व्यक्त हो रहे हैं, उन दोनों का सम्मान होना चाहिए."

इमेज स्रोत, Prashant Mali/BBC
दवाब में कराए गए ट्वीट की जाँच संभव है?
अब बहस शुरू हो गई है कि क्या दवाब में कराए गए ट्वीट की जाँच संभव है?
इसलिए हमने बात कि साइबर क्राइम के जानकार और बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील प्रशांत माली से.
प्रशांत माली कहते हैं, "एक समय पर एक जैसा ट्वीट करना कोई अपराध नहीं है. कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि इस बात की जाँच हो कि उन हस्तियों पर ट्वीट करने को लेकर किसी तरह का कोई दबाव तो नहीं था. ये भी किसी तरह का क्राइम नहीं है."
"क्राइम तब होगा जब ट्वीट में कोई आपत्तिजनक सामग्री जैसे पॉर्न कंटेट हो, या फिर मानहानि वाली सामग्री हो, या उससे क़ानून व्यवस्था में कोई दिक़्क़त पहुँची हो, या फिर देश का अपमान हुआ हो. इन्ही मामलों में ट्वीट की जाँच हो सकती है और उसे क्राइम माना जा सकता है.
इन सब सूरतों में से कोई भी एक सूरत हो, तो ट्वीट की जाँच हो सकती है, लेकिन उसके लिए एक शिकायतकर्ता का होना ज़रूरी है.
अगर ऐसा कुछ भी नहीं है तो भी ट्वीट का जाँच करना, केवल राजनीति से जोड़ा जा सकता है और कुछ नहीं."
ट्वीट दवाब में कराया गया हो तो क्या ये जाँच का विषय हो सकता है?
इस सवाल के जवाब में प्रशांत माली कहते हैं, "मशहूर हस्तियों की ओर से किए गए ट्वीट को आप देखें, तो उनमें ना तो पॉर्न कंटेंट है, ना ही मानहानि वाली सामग्री है, ना ही देश के ख़िलाफ़ है और ना ही क़ानून व्यवस्था को इससे कोई नुक़सान पहुँचता है. तो दवाब किस बात का. दवाब से कराए गए ट्वीट से नुक़सान क्या हुआ? किस पर क्या असर हुआ? अगर ऐसा कुछ साबित होता है तो 'क्राइम के लिए उकसाने की बात' का अपराध बन सकता है.
लेकिन दवाब डालने के बाद नतीजा क्या हुआ, ये साबित करना ज़रूरी होता है. अगर ट्वीट के बाद कुछ हुआ नहीं, तो फिर जाँच किस बात की. क़ानून की नज़र में ये जाँच कहीं नहीं ठहरती है."
अगर ट्वीट करने के लिए दवाब डाला गया, ये साबित हो भले ही उससे कुछ नुक़सान ना हुआ हो, तो क्या दवाब डालने वाले पर कार्रवाई हो सकती है?
प्रशांत माली कहते हैं, "दवाब में ट्वीट कराए गए, इस बात को साबित करना बहुत कठिन काम होगा. केवल एक जैसे ट्वीट इस बात का सबूत नहीं हो सकते कि दोनों हस्तियों पर ट्वीट करने का दवाब है. कट-कॉपी-पेस्ट करके कोई भी ट्वीट डाल सकता है. केवल ट्वीट में किसी को टैग करना इस बात का सबूत नहीं हो सकता. इसके लिए ज़रूरी है कि जिस पर दवाब डाला गया, वो ख़ुद इस बात को स्वीकार करे."
जब तक ऐसा नहीं होता, इस मामले में कुछ निकले, ये कहना मुश्किल है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















