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किसान आंदोलन: दो संगठनों के अलग होने से कितना फ़र्क पड़ेगा
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा के बाद दो किसान संगठनों ने आंदोलन ख़त्म करने की घोषणा की है.
भारतीय किसान यूनियन (भानु) और राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन ने बुधवार को आंदोलन ख़त्म कर दिया और प्रदर्शनकारी किसान धरना स्थल से चले गए.
इसके साथ ही चिल्ला बॉर्डर से किसान वापस चले गए हैं. यहां करीब 58 दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहा था.
क्यों अलग हुए ये संगठन
भारतीय किसान यूनियन (भानु) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर भानु प्रताप सिंह ने आंदोलन वपास लेने की वजह ट्रैक्टर परेड के दौरन हुई हिंसा को बताया है.
उन्होंने चिल्ला बॉर्डर पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “मैं कल की घटना से इतना दुखी और शर्मसार हूं. मैं आज घोषणा करता हूं कि अपने संगठन के यहां लगभग 58 दिनों से चल रहे धरने को समाप्त करता हूं. हमारे सब कार्यकर्ता ईमानदार हैं. इसलिए देश के किसानों को ये आगाह करना चाहता हूं कि वो भारतीय किसान यूनियन (भानु) पर विश्वास करें और उनके हित में ये संगठन हमेशा संघर्षरत रहेगा.”
इसी तरह राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन के अध्यक्ष वीएम सिंह ने भी दिल्ली में हुई हिंसा को कारण बताते हुए भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.
उन्होंने कहा, “जब तक खरीद की गारंटी नहीं मिल जाती ये आंदोलन चलेगा. पर इस रूप में नहीं चलेगा मेरे साथ. हम ना शहीद कराने आए हैं और ना लोगों को पिटवाने आए हैं यहां पर. मैंने पहले भी कहा था. उन लोगों के साथ आज हम बैठकर आंदोलन नहीं चला सकते जिनकी दिशा अलग हो. राकेश टिकैत पांच-छह बैठकों में गए पर क्या उन्होंने यूपी के गन्ना किसानों की बात एक बार भी उठाई. क्या पुरानी क़ीमतों की बात उठाई. हम केवल यहां से सपोर्ट देते रहे और वहां पर कोई नेता बनते रहे वो हमारा काम नहीं है.”
इसके जवाब में राकेश टिकैत ने कहा था कि वीएम सिंह को अपनी प्रॉपर्टी ज़ब्त होने का डर है. या तो वो आंदोलन कर लें या अपनी प्रॉपर्टी बचा लें. बीकेयू (भानु) तो वापस जाएंगे. जब पुलिस अपने पर आती है तो अच्छे-अच्छे वापस लौट जाते हैं. 30 जनवरी को हम उपवास रखेंगे और आंदोलन जारी रहेगा.
इन दोनों संगठनों के आंदोलन से हटने के बाद आंदोलन में फूट पड़ने और उसके कमज़ोर होने की बातें कही जा रही हैं. वहीं, एक पक्ष का ये भी कहना है कि इन दोनों ही संगठनों की किसान आंदोलन में बड़ी भूमिका नहीं थी. ऐसे में जानते हैं कि ये संगठन कौन हैं और किसान आंदोलन से इनका अलग होना कितना मायने रखता है.
राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन
वीएम सिंह के राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन का प्रभाव मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, बरेली और शाहजहांपुर क्षेत्रों में है. ये खासतौर पर गन्ना किसानों के लिए काम करते रहे हैं.
वीएम सिंह ने गन्ने की उचित कीमत और भुगतान को लेकर काम किया है और किसानों की तरफ से कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की हैं. किसान विरोध प्रदर्शनों में इनकी भूमिका रहती है.
कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसान आंदोलन की बात करें तो वीएम सिंह शुरू से इस आंदोलन में शामिल थे और ग़ाज़ीपुर में संगठन से जुड़े किसान धरना दे रहे थे.
लेकिन, वीएम सिंह इससे पहले दिसंबर में तब चर्चा में आए थे जब अन्य किसान संगठनों ने उनसे किनारा कर लिया.
ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमिटी ने वीएम सिंह को राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटा दिया था. उनका आरोप था कि वीएम सिंह ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क़ानून बनाने के लिए सरकार से अलग से बातचीत की पेशकश की है.
किसान आंदोलन को लगातार कवर कर रहे बीबीसी के सहयोगी पत्रकार समीरात्मज मिश्र बताते हैं, “वीएम सिंह यूपी के तराई इलाक़े में अच्छा प्रभाव रखते हैं और चुनाव भी लड़ चुके हैं. जहां तक आंदोलन की बात है तो संयुक्त किसान मोर्चे से अलग होने के बाद से ही उनका संगठन अलग-थलग पड़ गया था. वो किसान और सरकार की बातचीत में शामिल भी नहीं रहते थे.”
“राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन के अधिकतर लोग ग़ाज़ीपुर में थे. उनके जाने के बाद भी ग़ाज़ीपुर में प्रदर्शनकारियों की संख्या में कोई खास अंतर नहीं आया है. वही लोग वापस लौट रहे हैं जो टैक्ट्रर परेड में हिस्सा लेने आए थे. ये पहले से ही अलग थे तो इनके जाने पर चर्चा ज़रूर है लेकिन एक झटके की तरह नहीं है.”
कांग्रेस से जुड़े होने पर विवाद
वीएम सिंह अपनी संपत्ति और कांग्रेस से उनके जुड़े होने को लेकर भी विवादों में आ चुके हैं.
13 दिसंबर को बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक ट्वीट किया था जिसमें लिखा था कि ऑल इंडिया किसान संघर्ष समिति के वीएम सिंह से मिलें, जिन्होंने पीलीभीत से कांग्रेस के टिकट पर 2004 में मेनका गांधी और 2009 में वरुण गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा था. उन्होंने 2009 में अपनी संपत्ति 632 करोड़ बताई थी.
वीएम सिंह का राजनीति से भी नाता रहा है. वो कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में रह चुके हैं. 2004 और 2009 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वह मेनका गांधी के रिश्ते के भाई भी हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक वीएम सिंह साल 2012 में कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे और यूपी में बारखेड़ा सीट से चुनाव लड़ा था. उन्होंने आरोप लगाया था कि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों पर साथ नहीं देती है. हालांकि, वो चुनाव हार गए थे.
साल 2015 में उन्होंने अपनी ‘किसान पार्टी’ भी लॉन्च की थी.
भारतीय किसान यूनियन (भानु)
भारतीय किसान यूनियन (भानू) के लोग क़रीब 58 दिनों से चिल्ला बॉर्डर पर धरना प्रदर्शन कर रहे थे. वो किसान आंदोलन में शामिल तो थे लेकिन संयुक्त किसान मोर्चे के सदस्य नहीं थे. सरकार से अलग से बातचीत करने के कारण अन्य किसान संगठनों ने उनका विरोध किया था.
बीकेयू (भानु) और राकेश टिकैत की भारतीय किसान यूनियन के बीच पहले से अनबन भी रही है.
भानु प्रताप सिंह किसान नेता और राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत के बहुत करीबी रह चुके हैं. तब ये भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष भी थे. लेकिन, महेंद्र टिकैत की मौत के बाद उन्होंने अपना अलग गुट बना लिया.
समीरात्मज मिश्र बताते हैं, “भानु प्रताप सिंह आगरा के रहने वाले हैं और इनका संगठन आगरा और मथुरा तक सिमटा हुआ है. हालांकि, ये कई और जगहों पर भी अपना संगठन होने का दावा करते हैं. राकेश टिकैत के संगठन और इनके बीच अच्छे संबंध भी नहीं हैं.”
“बीकेयू (भानु) के लोग सिंधु, गाज़ीपुर और टिकरी बॉर्डर पर नहीं थे. वो चिल्ली बॉर्डर पर ही धरना दे रहा था. लेकिन, वहां बहुत ज़्यादा संख्या में किसान नहीं थे. हमेशा 100-150 के करीब किसान ही मौजूद रहते थे. कोई और संगठन आ जाने से कभी-कभी संख्या बढ़ जाती थी.”
अन्य किसान संगठन हुए नाराज़
भानु प्रताप सिंह से किसान आंदोलन में शामिल अन्य किसान संगठनों ने तब किनारा कर लिया था जब वो अलग से सरकार के साथ बैठक करने गए थे.
भारतीय किसान यूनियन (भानु) की 12 दिसंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ मुलाक़ात के बाद दिल्ली-नोएडा हाईवे के एक हिस्से को फिर से खोलने की ख़बर आई थी.
बीकेयू (भानु) का कहना था कि लोगों को हो रही दिक्कत के कारण इस पर सहमति दी गई है. लेकिन, इसके विरोध में संगठन के तीन सदस्यों ने इस्तीफ़ा भी दे दिया था.
एनडीटीवी की वेबसाइट के मुताबिक भानु प्रताप सिंह का कहना था कि संगठन ने सरकार के सामने मांगें रखी थीं और सरकार ने उस पर विचार करने का आश्वासन दिया है.
समीरात्मज मिश्र कहते हैं कि उस वक़्त दूसरे किसान नेताओं ने इस पर नाराज़गी जताई थी. कई प्रदर्शनकारियों का कहना था कि ये हमारे किसान नेता नहीं हैं इसलिए मिलने जाएं या नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसे में दोनों संगठनों के जाने से हलचल तो है लेकिन बड़ा प्रभाव तब पड़ सकता है जब कोई बड़ा संगठन अलग रुख अपना लेता है लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है.
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