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ट्रैक्टर परेड हिंसा के लिए किसान नेताओं ने किसे ज़िम्मेदार ठहराया
बुधवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने सिंघु बॉर्डर पर प्रेस कांफ्रेस की और गणतंत्र दिवस पर किसान ट्रेक्टर रैली और लाल क़िले पर हुई उपद्रव की घटना को लेकर अपना पक्ष रखा.
किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के बलबीर राजेवाल ने कहा कि लाखों लोग इस ट्रेक्टर रैली में शामिल हुए लेकिन ये सरकार की साज़िश की शिकार हो गई.
उन्होंने कहा, "हम 26 नवंबर को यहां आकर बैठे थे. लेकिन सरकार ने हमें बिना बताए पंजाब किसान मज़दूर संघर्ष समिति के लोगों को हमारे साथ लाकर बैठा दिया था. हमने तो सरकार से बातचीत करके पांच रूट तय किये थे जहां से ये परेड निकलनी थी. लेकिन उन्होंने (पंजाब किसान मज़दूर संघर्ष समिति) इसके साथ-साथ दिल्ली के अंदर परेड करने की घोषणा की."
"चार-पांच दिन पहले लाल क़िला जाने की भी घोषणा की. उनके एक-आध नेता ने तो ये भी कहा था कि हम लाल क़िले पर झंडा फहराएंगे. लेकिन सरकार की उनसे मिली-भगत थी. जहां-जहां से हमें मुड़ना था, वहां पुलिस ने ख़ुद कहा कि सीधा जाओ. पुलिस ने ख़ुद किसी को आईटीओ भेजा, लाल क़िला भेजा. नाम के लिए थोड़ा रोका. लेकिन उन लोगों ने लाल क़िला पर जाकर जो किया वो पूरे देश के सामने है."
"आरएसएस के दीप सिद्धू, मोदी और अमित शाह के ख़ास एजेंट हैं. उन्होंने वहां जाकर ये सब किया. इतने अहम दिन पर लाल क़िले की चौकी में सभी पुलिस वाले चौकी छोड़ कर चले गए. चार घंटे तक उनको अपना काम करने दिया. उन्होंने हमारे राष्ट्रीय ध्वज के बराबर एक धार्मिक झंडा फहराया. पुलिस ने उन्हें कुछ नहीं कहा."
स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव ने कहा, "इस घटना में दीप सिद्धू और मज़दूर किसान संघर्ष समिति एक्सपोज़ हुए हैं. उनके फ़ोटो सबके सामने हैं. हमारा मानना है कि ये सरकार की ओर से प्लांटेड व्यक्ति है. हम उसके बहिष्कार की अपील करते हैं. हमारे धरने पर बैठने के 13 दिन बाद मज़दूर किसान संघर्ष समिति को स्पेशल टेंट दिया जाता है. पुलिस के द्वारा. इसके पीछे क्या खेल है वो सामने आना चाहिए."
"जिस व्यक्ति ने वीडियो जारी किया कि मैं संयुक्त मोर्चा की बात नहीं मानूंगा और लाल क़िला जाऊंगा तो उसे क्यों जाने दिया. लाल क़िले में जो बेअदबी हुई उसके लिए खेद व्यक्त करते हैं. इसलिए हमने 1 फ़रवरी के संसद मार्च को स्थगित कर दिया है. अब 30 जनवरी को हम एक दिन का व्रत रखेंगे."
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किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, "किसी को हताश होने की ज़रूरत नहीं है. हमारे सब लोग 5-6 बजे तक वापस आए. हमारा ये मार्च सफल रहा है. कोई घटना अगर हुई है, तो उसमें पुलिस प्रशासन ज़िम्मेदार रहा है, उन्होंने ऐसे लोगों को लाल क़िले तक जाने का रास्ता मुहैया करवाया है."
किसान नेता हनन मोल्लाह ने कहा, "ये मुद्दा आधारित आंदोलन है. उसे पूरा करने के रास्ते में जो साज़िश की गई वो सामने आ गई. शुरू से ही हमारे आंदोलन को छोटा दिखाने के लिए खालिस्तानी, टुकड़े-टुकड़े गैंग, देशद्रोही कहा गया. देश के 36 करोड़ किसान क्या देशद्रोही हैं?"
वहीं, उसी वक़्त दिल्ली पुलिस ने भी प्रेस कॉन्फ्रेस कर अपना पक्ष रखा.
दिल्ली पुलिस कमिश्नर एस.एन. श्रीवास्तव ने बताया कि लाल क़िले पर फहराए गए धार्मिक झंडे की घटना को गंभीरता से लिया गया है. फ़ेस रिकगनिशन सिस्टम से लोगों की पहचान हो रही है, जिन पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.
उन्होंने बताया कि ट्रैक्टर रैली के लिए लिखित अनुमति दी गई थी और किसान नेताओं से शपथपत्र लिया गया लेकिन 25 जनवरी की शाम को यह पता चला कि वे अपने वादे से मुकर रहे हैं.
"उन्होंने उग्रवादी धड़े को आगे कर दिया और भड़काऊ भाषण दिए जिसके बाद उनकी मंशा साफ़ हो गई लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस ने संयम से काम लिया. सुबह साढ़े 6 बजे से बैरिकेड तोड़ना शुरू हो गया. सिंघु बॉर्डर पर सुबह साढ़े सात बजे रैली शुरू हो गई और उस रैली को मुकरबा चौक से बाएं नहीं मुड़ना था लेकिन वो मुड़ गए. सतनाम सिंह पन्नू ने मुकरबा चौक पर भड़काऊ भाषण दिया जिसके बाद उनके समर्थक बैरिकेड तोड़ने लगे. दर्शनपाल सिंह आकर वहां बैठ गए और उन्होंने दाहिने मुड़ने से मना कर दिया. टिकरी बॉर्डर और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से भी प्रदर्शनकारी साढ़े आठ बजे चलना शुरू हो गए."
उन्होंने कहा कि अभी तक 25 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं. 19 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है और 50 लोगों को हिरासत में लिया गया है, पुलिस के साथ हुए समझौते को किसान नेताओं ने न मानकर विश्वासघात किया है. किसी भी साज़िशकर्ता को छोड़ा नहीं जाएगा और क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.
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