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नरेंद्र मोदी भारत के नाराज़ किसानों का मूड कैसे नहीं पढ़ पाए?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसान आंदोलन के 49 दिन बाद और आठ चरण की वार्ता के बावजूद केंद्र सरकार किसानों को मनाने में नाकाम रही है.
दिल्ली की सीमाओं को घेर कर बैठे पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान तीनों क़ानूनों की वापसी से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं.
उनका कहना है कि 'वो प्रदर्शन स्थलों को तभी छोड़ेंगे, जब सरकार तीनों क़ानून वापस ले लेगी.'
मोदी सरकार किसानों के उत्पादों की बिक्री, क़ीमत और भण्डारण को लेकर नये क़ानून लायी है.
सरकार का दावा है कि इन क़ानूनों से किसानों की स्थिति सुधरेगी.
पंजाब और हरियाणा
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर की गईं कुछ याचिकाओं पर सुनवाई के बाद तीनों क़ानूनों पर अस्थायी रोक लगा दी है.
अदालत में आगे क्या हो सकता है, इस बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है.
लेकिन सवाल है कि 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी आख़िर कैसे सबसे ज़्यादा प्रभावित कहे जा रहे पंजाब और हरियाणा के किसानों का मूड नहीं समझ पाये?'
क्या गड़बड़ पंजाब की एक सहयोगी पार्टी (अकाली दल) की वजह से हुई जिसने पहले इन क़ानूनों का समर्थन किया था, पर बाद में इन क़ानूनों को किसान-विरोधी बताते हुए सरकार से नाता तोड़ लिया.
और क्या मोदी सरकार को यह लगा था कि इन क़ानूनों के आने से उनके लोकप्रिय समर्थन में किसी भी तरह का नुक़सान नहीं होगा?
'दुनिया के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन'
पीएम मोदी ने अपनी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में विकसित की है जो खरी बात करते हैं, अपने आलोचकों की परवाह नहीं करते.
और उनकी पार्टी यह दावा करती है कि उसे ज़मीनी हक़ीक़त का हमेशा अंदाज़ा रहता है.
पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स पर नज़र डालें, तो पिछले सितंबर (2020) में, कोरोना महामारी के बीच ही (संसद में क़ानून पारित होने से पहले) पंजाब में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये थे.
गुस्साए किसानों ने कई जगहों पर रेलवे ट्रैक रोक दिये थे और सितंबर के अंत में अकाली दल ने एनडीए से अलग होने की घोषणा कर दी थी.
तो फिर पीएम मोदी से ऐसी क्या ग़लती हुई जिसने किसानों के प्रदर्शनों को 'दुनिया के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन' में बदल दिया?
पटेल आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन तक
एक कारण, जिसे कई लोग सही मानते हैं, वो ये है कि पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में अपने ख़िलाफ़ किसी बड़े आंदोलन का सामना नहीं किया है. साल 2015 में गुजरात के प्रभावशाली पटेल समुदाय ने आरक्षण की माँग को लेकर एक बड़ा प्रदर्शन किया था जो बेनतीजा रहा.
उसी तरह पिछले साल दिल्ली की मुस्लिम महिलाओं ने सीएए के ख़िलाफ़ एक लंबा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था जो शाहीन बाग़ प्रोटेस्ट के नाम से चर्चित रहा, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से उसे भी बीच में ही रोकना पड़ा.
लेकिन इनमें से कोई भी प्रदर्शन इतना बड़ा नहीं था, जैसा किसानों का यह आंदोलन है और किसी ने भी अब तक नाराज़ किसानों की तरह मोदी सरकार को खुलकर चुनौती नहीं दी थी.
नागरिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफ़ेसर परमिंदर सिंह कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि मोदी ने स्थिति को समझने में ग़लती की क्योंकि उन्हें पंजाब में हो रहे प्रदर्शनों की कोई जानकारी ही नहीं थी. ज़्यादा बड़ी दिक्कत ये है कि उन्हें अपने समर्थन पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा (घमंड) है और बड़े आंदोलनों से डील करने का उन्हें कोई तजुर्बा नहीं है."
किसानों का विरोध प्रदर्शन
दूसरा ये कि किसानों का यह आंदोलन भारत के इतिहास में इसी तरह के अन्य आंदोलनों की तुलना में काफ़ी अलग है.
इतिहास के जानकारों के मुताबिक़, औपनिवेशिक भारत में शोषणकारी शासकों के ख़िलाफ़ भारतीय किसानों के विरोध प्रदर्शन अक्सर हिंसक हुआ करते थे.
1947 में आज़ादी के बाद से, किसानों ने अपनी फ़सल की क़ीमत को लेकर बहुत बार प्रदर्शन किये हैं.
इनके ज़रिये किसानों ने अपने कर्ज़ों और कृषि क्षेत्र के संकटों की ओर सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की. लेकिन कभी किसी प्रदर्शन में इस स्तर का सामंजस्य और लामबंदी देखने को नहीं मिली.
इस आंदोलन में क़रीब चालीस किसान यूनियनें शामिल हैं. प्रदर्शन स्थलों पर पाँच लाख से ज़्यादा किसान जमा हैं और समाज के कई अन्य बड़े समूह भी इनके समर्थन में हैं.
भारत की कृषि नीतियां
किसानों के इस प्रदर्शन की शुरुआत पंजाब से हुई जो भारत में अपेक्षाकृत एक 'समृद्ध कृषि क्षेत्र' है.
भारत की कृषि नीतियों से अब तक सबसे ज़्यादा फ़ायदा हालांकि पंजाब और पड़ोसी राज्य हरियाणा के किसानों को ही हुआ है.
मगर ये किसान भी अब स्थिर हो चुकी या गिर रही खेती की आय से निराश हैं और इन्हें डर है कि कृषि क्षेत्र को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल देने से उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी.
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की माँग को लेकर इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी.
लेकिन भारत में खेती को लेकर व्याप्त कई तरह की चिंताएं भी अब इस आंदोलन का हिस्सा हैं, जैसे- किसानों की कम होती ज़मीनें, घटता उत्पादन, फ़सल की क़ीमतों में अस्थिरता और देश में कृषि क़ानून बनाने का केंद्रीकरण, जबकि कृषि मुख्य रूप से राज्य स्तर का मुद्दा है.
भारतीय किसान की छवि
अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर प्रताप भानू मेहता कहते हैं, "किसानों के पास शिकायतें ही शिकायतें हैं. उनकी बहुत सारी दिक्कतें हैं जो इस आंदोलन के माध्यम से सुनी जा सकती है. पर बड़ी समस्या सरकार में विश्वास की कमी है. कृषि क्षेत्र को लेकर किसान केंद्र के नज़रिये से ख़ुश नहीं हैं."
प्रदर्शन स्थल से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार 'ट्रॉली टाइम्स' के संपादकों में से एक सुरमीत मावी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "लोग एक शक्तिशाली सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में हैं. वो इसे अपने अधिकारों के लिए एक क्रांति कह रहे हैं. लोगों में किसी तरह का डर नहीं है, यह दिखाई देता है."
दशकों से, भारतीय किसान की एक छवि लोगों में बनी रही है कि वो कम पढ़े लिखे हैं, संघर्षशील हैं जो खेतों में बिना थके काम करते रहते हैं. लेकिन भारत में सैकड़ों किस्म के किसान पाये जाते हैं, जैसे बड़े और छोटे किसान, बहुत ज़्यादा ज़मीनों वाले और भूमिहीन किसान.
शहरीकरण के साथ गहरे संबंध
इसलिए जब यह बताया गया कि दिल्ली की सीमा पर डटे हुए प्रदर्शनकारी पित्ज़ा खा रहे हैं तो सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल किया कि 'क्या इन लोगों ने कभी खेतों में काम किया भी है?'
जिसने एक बार फिर यह बता दिया कि शहरी भारतीयों को अपने ग्रामीण बिरादरों के बारे में आख़िर कितनी कम जानकारी है.
यह एक और चीज़ है, जिसे पीएम मोदी, उनकी सरकार और बहुत से लोग शायद समझने में नाकाम रहे कि 'प्रदर्शनकारी किसानों में बहुत से किसानों के शहरीकरण के साथ बहुत गहरे संबंध हैं.'
आंदोलन में शामिल इन किसानों में से कई के बच्चे सेना और पुलिस में हैं. वो अंग्रेज़ी बोलते हैं. सोशल मीडिया का उपयोग करना जानते हैं और विदेशों की यात्रा कर चुके हैं.
इनके प्रदर्शन स्थल काफ़ी व्यवस्थित हैं. वहाँ क्लीनिक, एंबुलेंस, रसोई, पुस्तकालय और ख़ुद के समाचार-पत्र भी हैं.
पंजाब की सफलता
लेकिन अधिकांश शहरी प्रदर्शनों की तरह, इस आंदोलन में भी यह जोखिम बना हुआ है कि कहीं मीडिया वालों की भीड़ इस आंदोलन को एक तमाशे में ना बदल दे, जिससे मुद्दे की बात दब जाए.
इतिहासकार महेश रंगराजन कहते हैं, "यह किसान आंदोलन मध्य-वर्गीय भारत की भाषा बोलता है. किसान कह रहे हैं कि वो देशभक्त हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं."
यह कृषि संकट या सूखे के ख़िलाफ़ होने वाला एक पारंपरिक विरोध-प्रदर्शन भी नहीं है जिसे अधिकांश सरकारें मैनेज करने में सफल हो जाती हैं.
यह आंदोलन कृषि क्षेत्र में पंजाब की सफलता का एक परिणाम है और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना है.
एक ऐसा प्रदेश (पंजाब) जिसे गेहूँ और धान (चावल) के सरकारी मूल्यों और मण्डियों की वजह से 'सबसे ज़्यादा लाभ' मिला, उसे अब नये क़ानूनों के आने के बाद सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा.
छोटे और सीमांत किसान
आवश्यकता से ज़्यादा उत्पादन, कम होती आय और गिरते जल स्तर की वजह से ये दो फ़सलें अब पंजाब के गले की फांस बन चुकी हैं.
कुछ जानकारों का विचार है कि वक़्त के साथ खेती के स्टाइल को बदलने में पंजाब असमर्थ रहा है.
भारत के 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, और वो कुल कृषि भूमि के क़रीब 47 प्रतिशत हिस्से पर काम करते हैं.
सरकार और किसान, दोनों इस बात से सहमत हैं कि कृषि क्षेत्र में सुधार करने की ज़रूरत है. लेकिन वो बारीकियों पर सहमत नहीं हो सकते.
प्रोफ़ेसर मेहता कहते हैं, "समाधान तो हैं, लेकिन किसानों को सरकार पर भरोसा नहीं है."
और यही वास्तविक समस्या है.
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