किसानों के प्रदर्शन में गए बेनीवाल और उनके समर्थक किसानों से अलग क्यों बैठे?

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, दिल्ली-राजस्थान बॉर्डर से, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान-हरियाणा सीमा पर डटे कई राज्यों के किसानों की क़तार जयपुर-दिल्ली हाइवे पर लगातार बढ़ती जा रही है.

शनिवार को नागौर से सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के नेता हनुमान बेनीवाल ने भी अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंचकर माहौल को और गरम कर दिया लेकिन दो हफ़्ते से डटे किसानों से उनकी दूरी चर्चा में भी रही.

शनिवार दोपहर हाइवे पर शाहजहांपुर गांव के पास स्थित ओवरब्रिज के एक ओर यानी राजस्थान सीमा की ओर सुबह से हनुमान बेनीवाल के समर्थक मंच सजाकर बैठे थे. क़रीब चार बजे हनुमान बेनीवाल अपने तमाम समर्थकों के साथ वहां पहुंचे और देर रात तक रहे.

उनका दावा था कि उनके साथ क़रीब एक लाख समर्थक आए हैं, लेकिन ऐसा दिखा नहीं. दूसरी ओर, ओवरब्रिज के उस पार यानी हरियाणा की ओर अखिल भारतीय किसान संगठन और कई अन्य संगठनों से जुड़े किसान और उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में वहां डटे हैं.

यह संख्या लगातार बढ़ रही है और इन किसानों में राजस्थान, पंजाब और हरियाणा के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के किसान भी बड़ी संख्या में हैं. महाराष्ट्र से सैकड़ों किसान रविवार की सुबह भी वहां पहुंचे.

'सबक सिखा देंगे किसान'

ये सभी किसान दिल्ली जाने की कोशिश में हैं लेकिन हरियाणा सीमा पर उन्हें आगे नहीं जाने दिया जा रहा है. शनिवार देर शाम धरने पर बैठे सांसद हनुमान बेनीवाल ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि फ़िलहाल वो दिल्ली कूच का इरादा टाल रहे हैं और सरकार को अभी और समय देना चाहते हैं.

हनुमान बेनीवाल एक हफ़्ते पहले भी सरकार को अल्टीमेटम दे चुके थे लेकिन सरकार की ओर से जब कोई रुझान नहीं मिला तो उन्होंने बॉर्डर पर पहुंचकर विरोध करने और फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को छोड़ने की भी घोषणा कर दी.

सरकार की ओर से कोई रुझान न मिलने के बावजूद क्या उन्हें अभी भी सरकार से उम्मीद है?

इस सवाल के जवाब में बेनीवाल कहते हैं, "सरकार ने जो अड़ियल रवैया अपनाया है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण उसके पास बहुमत से ज़्यादा सांसदों का होना है. लेकिन किसान हित में आज यदि सांसद नहीं आते हैं, सरकार क़ानून वापस नहीं लेती है तो आने वाले दिनों में यही किसान इस सरकार को भी सबक सिखा देंगे."

जयपुर-हाइवे राजमार्ग

हरियाणा-राजस्थान सीमा पर किसान क़रीब दो हफ़्ते से बैठे हैं.

हनुमान बेनीवाल ने भी किसानों के समर्थन में आने और मांगें न माने जाने पर धरने पर बैठने की घोषणा कर रखी थी लेकिन शनिवार को जब उनका मंच अलग लगा, उनके समर्थकों और पहले से मौजूद किसानों के बीच अच्छी ख़ासी दूरी दिखी तो यह साफ़ समझा जा सकता था कि दोनों में न तो कोई तालमेल है और न ही दोनों समूह साथ हैं.

हनुमान बेनीवाल ने बीबीसी से इसकी वजह यह बताई, "असल में हमारे समर्थकों की संख्या बहुत ज़्यादा है और हम नहीं चाहते थे कि किसी तरह का टकराव हो. इसलिए हम अभी यहीं बैठे हैं. आगे अभी तय करेंगे कि यहां बैठना है या फिर आगे बढ़ना है."

लेकिन समर्थकों की संख्या का बेनीवाल का दावा जयपुर-हाइवे राजमार्ग पर सच्चाई के क़रीब नहीं दिख रहा था.

उनके वहां पहुंचने के बावजूद महज़ कुछ हज़ार समर्थक ही वहां थे जबकि पहले से डटे किसानों की संख्या कहीं ज़्यादा थी और वो जिन वाहनों से वहां पहुंचे थे क़रीब दो किलोमीटर तक उनकी क़तार भी थी.

ये किसान काफ़ी व्यवस्थित भी हैं और रहने-खाने के इंतज़ाम के साथ ही स्थाई क़िस्म के मज़बूत तंबुओं की तादाद भी लगातार बढ़ती जा रही है.

'बेनीवाल से किसानों का लेना देना नहीं'

दूसरी ओर, हनुमान बेनीवाल और उनके समर्थकों के वहां पहुंचने और अलग-थलग रहने को लेकर कई किसान संगठनों में भी नाराज़गी देखने को मिली और कुछ लोगों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि ये लोग आंदोलन को 'ख़राब' करने के मक़सद से यहां आए हैं.

भारतीय किसान पार्टी के राजस्थान प्रदेश के अध्यक्ष सुभाष सिंह सोमरा भी कई दिनों से सीमा पर मौजूद हैं.

वे कहते हैं, "किसान दिल्ली जाना चाह रहा है लेकिन पुलिस वाले रोक रहे हैं. यह क़ानून तो किसानों के लिए डेथ वॉरंट है इसे वापस लेना ही होगा. बेनीवाल हों या कोई और, ये सिर्फ़ किसानों के आंदोलन को डैमेज करने के लिए यहां आ रहे हैं. इनका किसानों से कोई लेना-देना नहीं है और ये ज़्यादा दिन तक यहां रहेंगे भी नहीं. सिर्फ़ अपनी राजनीति चमकाने के मक़सद से आ रहे हैं और किसान इनके इरादों को समझता भी है."

हनुमान बेनीवाल के समर्थक किसानों से अलग भले ही दिखे हों लेकिन हरियाणा-राजस्थान बॉर्डर पर किसान आंदोलन की शुरुआत करने वाले किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने बेनीवाल से न सिर्फ़ मुलाक़ात की बल्कि एनडीए छोड़ने के उनके फ़ैसले की भी सराहना की.

रामपाल जाट का कहना है, "सरकार का साथ छोड़ना हिम्मत का काम है. बेनीवाल भाजपा सरकार का साथ छोड़ कर आए हैं. इससे निश्चित रूप से आंदोलन को मज़बूती मिली है. सभी किसान साथ हैं और एक-दूसरे का सहयोग कर रहे हैं."

प्रदर्शन स्थल पर सिकुड़ती गई बेनीवाल समर्थकों की संख्या

हनुमान बेनीवाल अपनी पार्टी यानी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के इकलौते सांसद हैं और विधानसभा में उनके तीन विधायक हैं.

शनिवार को एनडीए से अलग होने के एलान के बाद कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक रामेश्वर डूडी भी उनसे मिलने पहुंचे लेकिन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, यह पता नहीं चल सका है.

हनुमान बेनीवाल एनडीए से अलग भले ही हुए हैं लेकिन बीजेपी से उनका मोहभंग पूरी तरह से हो गया है, ऐसा भी नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "एनडीए से हम सिर्फ़ कृषि क़ानून के कारण अलग हुए हैं. इसका यह मतलब नहीं कि हम कांग्रेस के साथ जा रहे हैं या फिर कुछ और कर रहे हैं."

हालांकि यह बात उन्होंने कांग्रेस नेता रामेश्वर डूडी से मुलाक़ात से पहले कही थी. दूसरी ओर, किसानों के इस तरह दो अलग-अलग जगहों पर होने के कारण स्थानीय प्रशासन भी काफ़ी सतर्क हो गया है. हालांकि रविवार सुबह तक हनुमान बेनीवाल और उनके समर्थकों की संख्या काफ़ी कम रह गई थी.

किसानों के प्रदर्शन में भीड़ बदस्तूर जारी है…

दूसरी ओर, हाइवे के दोनों ओर किसानों के तंबू और उनकी गाड़ियां इस तरह खड़ी हैं जैसे यह हाईवे न होकर कोई क़स्बा हो.

हाइवे के क़रीब दो किलोमीटर के दायरे में जगह-जगह लंगर चलते मिलेंगे तो कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं ज़रूरी दवाइयों और फ़र्स्ट एड के सामान का स्टॉल लगाए हुए मिलेंगे.

किसान आंदोलन से संबंधित गीत और संगीत दिन भर बज रहे हैं तो मंच पर दिन भर के भाषणों के बाद शाम को किसान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी लुत्फ़ उठाते हैं.

अलवर ज़िले के रहने वाले युवा किसान दीपेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले आस-पास के गांवों के लोग इस आंदोलन में बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे लेकिन अब वो लोग न सिर्फ़ यहां शामिल हो रहे हैं बल्कि दूर-दराज़ से आए किसानों की हरसंभव मदद भी कर रहे हैं.

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