CBSE बोर्ड परीक्षाएं आगे बढ़ीं, सेशन आगे बढ़ने से क्या होंगे नुक़सान

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने गुरुवार को दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं की तारीख़ों को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है.

केंद्रीय मंत्री पोखरियाल ने बताया है कि सीबीएसई बोर्ड की दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं 4 मई से 10 जून के बीच होंगी. इसके साथ ही इन परीक्षाओं के नतीजे 15 जुलाई तक आ जाएंगे. इसके साथ ही दसवीं और बारहवीं के प्रैक्टिकल 1 मार्च से शुरू हो जाएंगे.

इस फ़ैसले के बाद सीबीएसई बोर्ड के छात्रों को 12 महीनों की जगह 14 महीने एक ही क्लास में बिताने पड़ेंगे.

सामान्य रूप से दसवीं और बारहवीं के छात्रों को मार्च – अप्रैल में इम्तिहान देने के बाद लगभग दो महीने की छुट्टियां मिल जाती थीं. इस दौरान वे ख़ुद को तनाव से बाहर निकालने और आगे की पढ़ाई के लिए तैयार करते थे.

ऐसे में कुछ छात्र इस फ़ैसले के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं. वहीं, कुछ छात्र ट्विटर या फ़ेसबुक के माध्यम से अपनी समस्याएं ज़ाहिर कर रहे हैं.

पोखरियाल के फ़ैसले पर क्या कहते हैं छात्र

दक्षिणी दिल्ली के एक स्कूल में दसवीं की परीक्षा देने की तैयारी कर रहीं भूमि इसे एक अच्छा फ़ैसला बताती हैं.

वे कहती हैं, “इस साल हमारा सेशन भी टाइम से शुरू नहीं हो पाया था. ऑनलाइन एजुकेशन सुनने में जितना आसान लगता है, उतना असल में नहीं है. सभी बच्चों के नंबर जुगाड़ने से लेकर उन्हें टीम या ज़ूम पर क्लास के लिए लेकर आना आसान नहीं होता था.

कभी हम बच्चों का इंटरनेट चला जाता था तो कभी टीचर्स का इंटरनेट चला जाता था. चीज़ें भी ठीक से समझ नहीं आती थीं. अब उम्मीद है कि कोरोना केसेज़ थोड़ा कम हो जाएं, हमें स्कूल जाने का मौक़ा मिले तो एग्ज़ाम से पहले स्लेबस को एक बार ठीक से समझ सकेंगे.”

हालांकि, भूमि बताती हैं कि उनके कुछ दोस्त इस फ़ैसले को लेकर असहज भी हैं.

वे कहती हैं, “मेरे कुछ दोस्तों ने काफ़ी तनाव लेकर पढ़ाई की थी. वे मार्च में परीक्षाएं होने का इंतज़ार कर रहे थे. ऐसा होने से उन्हें और हम सभी को गर्मियों की छुट्टियां मिल जातीं. 11वीं की थोड़ी तैयारी कर लेते. लेकिन अब ये फ़ैसला आने के बाद लगातार पढ़ते रहना पड़ेगा. क्योंकि ऐसा लग रहा है कि 11वीं का सेशन रिज़ल्ट आने के बाद ही शुरू हो जाएगा.”

तनाव भरा फ़ैसला

वहीं, बारहवीं की परीक्षा देने की तैयारी कर रहे शैरॉन मानते हैं कि ये एक अच्छा लेकिन तनाव लेकर आने वाला फ़ैसला है.

वे कहते हैं, “मेरे लिए ये फ़ैसला अच्छा और बुरा दोनों है. अच्छा इसलिए है क्योंकि अब हमें पढ़ने के लिए ज़्यादा वक़्त मिल जाएगा. लेकिन बुरा ये है कि अब परीक्षाएं देने के लिए मई तक का इंतज़ार करना पड़ेगा. इससे बहुत तनाव होगा.”

शैरॉन ये भी मानते हैं कि ये फ़ैसला 12वीं के बाद की पढ़ाई को भी प्रभावित कर सकता है.

वे कहते हैं, “12वीं के बाद कुछ भी करने के लिए अपने रिज़ल्ट का इंतज़ार करना होगा. कट ऑफ़ आ जाएगी. और हम पर भविष्य की योजनाएं बनाने का दबाव होगा.”

शैरॉन की तरह कई अन्य बच्चों को सेशन आगे बढ़ने की वजह से अपने करियर पर ख़तरा मंडराता दिख रहा है.

रमिथ सूर्या ने केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल से ट्विटर पर कहा है, “सर, प्लीज़ NEET 2021 को भी आगे बढ़ा दीजिए.”

ट्विटर यूज़र अंचित सिन्हा कहते हैं, “जेईई की परीक्षा भी मई के आख़िरी हफ़्ते में ही है. काफ़ी भ्रमपूर्ण स्थिति है…”

एक अन्य ट्विटर यूज़र नमन माथुर कहते हैं, “सर, अगर बोर्ड परीक्षाएं मई से जून तक होंगी तो जेईई परीक्षा का क्या होगा. हमें दोनों ही परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए.”

साल 2020 के दौरान कोरोना महामारी के चलते भारत जैसे बड़े देश में लाखों – करोड़ों बच्चों को एकाएक ऑनलाइन एजुकेशन व्यवस्था में आना आसान नहीं रहा.

बीबीसी ने इससे पहले कई मौक़ों पर ऑनलाइन एजुकेशन से होकर गुज़रने वाले टीचर्स और बच्चों की बात को मंच दिया है. और बच्चों और उनके अध्यापकों की ओर से बताया गया है कि ऑनलाइन एजुकेशन कभी - कभी भारी तनाव की वजह बन जाता है.

ऐसे में सवाल उठता है कि परीक्षाएं आगे बढ़ाना बच्चों और टीचर्स के लिए कितना तनाव का विषय होगा.

अनिश्चितताओं का दौर

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. पूजाशिवम जेटली मानती हैं कि कोई भी काम जिसमें एक तरह की अनिश्चितता हो, उससे तनाव या चिंता का जन्म होता है.

वे कहती हैं, “दसवीं और बारहवीं बच्चों के लिए निर्णायक परीक्षाएं होती हैं. ऐसे में बच्चों के ऊपर पहले से काफ़ी दबाव रहता है. क्योंकि पिछले साल अनिश्चितताएं इतनी ज़्यादा थीं, हमें ये नहीं पता था कि बोर्ड परीक्षाएं होंगी या नहीं होंगी.

अब ये जो परीक्षाओं की तारीखें आगे बढ़ गई हैं, इससे बच्चों के लिए अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं. इसकी वजह से बच्चों में तनाव और चिंता आदि पैदा होगा. क्योंकि इस सबका अंत नज़र नहीं आ रहा है.

बारहवीं के बच्चों के लिए ख़ास तौर पर ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि वे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए अलग और बोर्ड परीक्षाओं के लिए अलग टाइम रखते हैं. ऐसे में उनके लिए ये सब कुछ एक साथ संभालना एक अलग समस्या बन जाएगा. वहीं, कोरोना के बढ़ते हुए मामलों को ध्यान में रखा जाए तो कुछ बच्चों के मन में ये होगा कि केसेज़ फिर बढ़ रहे हैं, अब परीक्षाएं होंगी भी या नहीं होंगी. ऐसे में अनिश्चितता का माहौल बच्चों को चिंतित और तनावपूर्ण तो बना ही रहा है.”

लेकिन जिस ओर पूजाशिवम इशारा कर रही हैं, वो ये बताता है कि बच्चे इस बात से चिंतित हैं कि अब सामान्य एजुकेशन साइकिल का क्या होगा.

उनमें तमाम तरह की चिंताएं और भ्रम हैं कि क्या तमाम विश्वविद्यालयों में दाख़िले की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जाएगी.

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय की फ़ैकल्टी ऑफ़ एजुकेशन की पूर्व डीन रहीं शिक्षाविद् अनीता रामपाल मानती हैं कि इसके सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं है.

वे कहती हैं, “फ़िलहाल, हमारे पास इसे आगे बढ़ाने के सिवा कोई अन्य विकल्प नहीं है. पिछले साल लॉकडाउन के दौरान सब कुछ बंद रहा. और ऑनलाइन एजुकेशन से स्लेबस और शिक्षा पूरी करने की बात कहना काफ़ी बेमानी है.

ऐसे में दो विकल्प थे – जिसमें पहला विकल्प था, इसे ज़ीरो ईयर बना देना. इसके तहत 2020 को शून्य मान लिया जाता. इसके तहत बच्चों से ये बताया दिया जाता कि उनका एक साल ख़राब हो गया. और अब वही पढ़ाई फिर से शुरू करें. ये सही विकल्प नहीं था क्योंकि ये बच्चों को काफ़ी हताश करता.

ऐसे में ये विकल्प था कि थोड़ा आगे बढ़ाकर और स्लेबस कम करके साल पूरा किया जाए. लेकिन सरकार को ये इस तरह करना चाहिए कि हर छात्र को ये अहसास रहे कि उसने कुछ किया है.”

अनीता रामपाल ये भी मानती हैं कि सरकार को इस बैच के लिए विशेष प्रबंध करने चाहिए ताकि इनके भविष्य में कोई दिक़्क़त न आए.

वे कहती हैं, “परीक्षाएं आगे बढ़ाने के साथ अन्य चीज़ों का भी प्रबंध करना होगा. उदाहरण के लिए, इम्तिहान के बाद अगला सेशन कब से शुरू होगा. इन छात्रों को आगे की पढ़ाई में प्रवेश आदि कैसे और कब मिलेगा. ये सब इसी फ़ैसले के साथ और इसी के तालमेल में बैठेगा.”

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