किसान आंदोलन: मोदी सरकार झुकेगी या किसानों को मना लेगी?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आंदोलन कर रहे किसानों और केंद्र सरकार के बीच पाँचवें दौर की बातचीत में भी अब तक कुछ नतीजा नहीं निकल सका है.

किसानों ने तो कह दिया है कि वो तीनों नए कृषि क़ानूनों को वापस लेने की अपनी मांग से पीछे नहीं हटेंगे.

लेकिन मोदी सरकार क्या सोच रही है?

सरकारी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के मुताबिक़ मोदी सरकार क़ानून वापस लेने का कोई इरादा नहीं रखती.

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एक सूत्र ने बताया, "सरकार को किसानों की चिंता है और उनकी मांग पर गंभीरता से ग़ौर किया जा रहा है. मंत्रालयों में आपस में कई फ़ॉर्मूले पर चर्चा हो रही है और ये संभव है कि बुधवार, 9 दिसंबर को होने वाली अगले दौर की बातचीत में किसानों के सामने एक ठोस प्रस्ताव रखा जाए."

उस सूत्र का कहना था कि किसानों के हित को सामने रख कर ही नया प्रस्ताव आएगा

दिल्ली में सरकार और किसान नेताओं के बीच शनिवार की बातचीत के दौरान सरकार ने किसान यूनियनों से समय मांगा ताकि आगे की बातचीत के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार किया जा सके.

सूत्रों के अनुसार ऐसा संभव है कि सरकार नए क़ानूनों में उनकी कुछ मांगों को शामिल कर ले, जिसके लिए इन क़ानूनों में संशोधन की ज़रूरत पड़ेगी और ये संसद के अगले सत्र में ही मुमकिन हो सकेगा.

मुख्यधारा के मीडिया में किसान आंदोलन को ठीक से कवर नहीं करने की बात कही जा रही है. लेकिन सोशल मीडिया पर इसे ख़ूब दिखाया जा रहा है जिसके कारण आंदोलन की एक बड़ी तस्वीर सामने आयी है और केंद्र सरकार नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती.

मोदी

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सरकार से बातचीत के दौरान किसान नेताओं को क्या संकेत मिले हैं? क्या उन्हें महसूस हुआ कि मोदी सरकार नए क़ानूनों को वापस लेगी? ये पूछे जाने पर कुछ किसान नेताओं ने कहा कि सरकार को ये अंदाज़ा हो गया है कि किसान अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे.

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने कहा कि 'मोदी सरकार दबाव में है.'

सितंबर में नए क़ानूनों के पारित किए जाने के पहले से इसका विरोध किसान करते आ रहे हैं. पिछले 10 दिनों में इसमें तेज़ी आई है. हज़ारों किसान धरने पर हैं उनका कहना है कि वो अपनी मांग पूरी करवा कर ही लौटेंगे.

उनके बीच फूट डालने की भी कोशिश की गई और इन्हें रोकने के लिए बल का भी इस्तेमाल किया गया लेकिन अब तक किसानों की एकता क़ायम है.

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पिछले हफ़्ते अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास ने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में कहा था कि मोदी सरकार को थोड़ा तो झुकना ही पड़ेगा, किसानों को कुछ तो देना ही पड़ेगा.

गुरचरण दास नए क़ानूनों के पक्ष में हैं लेकिन उनके अनुसार प्रधानमंत्री ने इनका प्रचार ठीक से नहीं किया.

वो कहते हैं, "दुनिया के सबसे अच्छे कम्युनिकेटर होने के बावजूद मोदी ने ग़लती ये की कि बिल लाने से पहले इसकी चर्चा नहीं की. लोगों की राय नहीं मांगी."

लेकिन वो नए क़ानूनों को ख़ारिज करने के ख़िलाफ़ हैं. उनके अनुसार "अगर सरकार ने क़ानून वापस लिया तो जहाँ 30 साल पहले थे वहीं पहुँच जाएंगे.

किसान

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किसानों का डर

किसान ख़ासतौर से इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नई व्यवस्था में मंडी और एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) प्रणाली ख़त्म कर दी जाएगी और सरकार उनसे गेहूं और चावल लेना बंद कर देगी.

उन्हें ख़तरा इस बात से है कि उन्हें अपना माल प्राइवेट कंपनियों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बेचना पड़ेगा जो उनका शोषण कर सकते हैं. लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें यक़ीन दिलाया है कि ये प्रणाली चलती रहेगी और किसानों को चिंता करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने बीबीसी से कहा कि दिल्ली के बाहर धरने पर बैठे किसान अपने घरों को लौट जाएंगे अगर सरकार निजी व्यापारियों और कॉर्पोरेट कंपनियों की ख़रीदारी पर भी एमएसपी लगाए ताकि उनका शोषण होने की संभावनाओं को क़ानूनी तौर पर दूर किया जा सके.

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उन्होंने कहा, "सरकार को चाहिए कि वह एमएसपी को निजी क्षेत्र में भी बाध्यकारी बनाने की किसानों की इस मुख्य मांग को तत्काल मान ले जिससे आंदोलनकारी किसान अपने घर लौट जाएं."

चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने आगे कहा, "तमाम दावों के बावजूद किसानों की आशंकाओं को दूर करने में सरकार अब तक असफल रही है. हमारा कहना है कि वर्तमान मंडी और एमएसपी पर फसलों की सरकारी क्रय की व्यवस्था इन सुधारों के कारण किसी भी तरह से कमज़ोर ना पड़े. अभी मंडियों में फसलों की ख़रीद पर 8.5 प्रतिशत तक टैक्स लगाया जा रहा है परंतु नई व्यवस्था में मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा."

सरकार एमएसपी पर सबसे बड़ी ख़रीदार है, उनका कहना है कि एमएसपी पर सरकारी ख़रीद की व्यवस्था किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है.

चौधरी पुष्पेंद्र कहते हैं, "साल 2019-20 में एमएसपी पर ख़रीदी जाने वाली फ़सलों में से गेहूं और चावल दोनों को जोड़कर लगभग 2.15 लाख करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी ख़रीद एमएसपी पर की गई. चावल के कुल 11.84 करोड़ टन उत्पादन में से 5.14 करोड़ टन यानी 43 प्रतिशत एमएसपी पर सरकारी ख़रीद हुई. इसी प्रकार गेहूं के 10.76 करोड़ टन उत्पादन में से 3.90 करोड़ टन यानी 36 प्रतिशत सरकारी ख़रीद हुई."

कुछ दूसरे किसान नए क़ानूनों में बदलाव के बजाय इन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं. किसान बुधवार को होने वाली बातचीत का इन्तज़ार कर रहे हैं जब सरकार नया प्रस्ताव लेकर आएगी. इसका वो उसी दिन अध्ययन करेंगे और उसी दिन ये बताएंगे कि उन्हें सरकार का प्रस्ताव मंज़ूर है या नहीं.

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