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डॉक्टरों समेत उत्तरी दिल्ली नगर निगम के 55 हज़ार स्टाफ़ को नहीं मिला वेतन?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सिर्फ़ डॉक्टर ही नहीं, उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत काम करने वाले लगभग 55 हज़ार कर्मचारियों को पिछले तीन महीनों या उससे भी ज़्यादा समय से वेतन नहीं मिला है.
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश ने हड़ताल कर रहे डॉक्टरों से मिलने के बाद पत्रकारों के सामने इस बात को स्वीकार किया है. हालांकि, दिल्ली नगर निगम के अस्पतालों के डॉक्टरों की हड़ताल निलंबित हो गई है.
जिन निगम कर्मचारियों के वेतन लंबित हैं उनमें स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा कार्यालयों में काम करने वाले दूसरे स्टाफ़ भी शामिल हैं.
नगर निगम के अधीन आने वाले स्कूलों के शिक्षकों को तो पिछले छह महीने से वेतन नहीं मिला है.
जय प्रकाश इस बात को स्वीकार करते हैं और उनका कहना है कि जब जब संसाधन उपलब्ध होते हैं, निगम सबसे पहले वेतन देने का काम करता है.
इस बीच दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों ने अपनी बांह पर काली पट्टी बाँध कर विरोध प्रदर्शन किया जबकि हिंदू राव अस्पताल के छह डॉक्टर क्रमिक भूख हड़ताल पर बने हुए थे. देर शाम को मेयर ने जूस पिलाकर उनकी हड़ताल को समाप्त करा दिया और लंबित वेतन जल्द देने का आश्वासन दिया है.
हालांकि उत्तरी दिल्ली नगर निगम के कस्तूरबा गांधी अस्पताल ने हड़ताल अभी तक समाप्त करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है.
कस्तूरबा गांधी अस्पताल के रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. वरुण बैरागी का कहना है कि जब तक अकाउंट में वेतन नहीं आएगा तब तक हम इंतज़ार करेंगे.
वेतन को लकर निगम का रवैया
पत्रकारों से बात करते हुए मेयर का कहना था, "सबसे पहले डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि एक महीने का वेतन दो. तो हम मान गए. फिर उन्होंने कहा 15 दिनों के अंदर दो. हम फिर मान गए. तीन महीने का बक़ाया है, हमें जैसे-जैसे पैसों का इंतज़ाम कर पा रहे हैं, वैसे-वैसे वेतन देते जा रहे हैं."
नगर निगम के डॉक्टरों के संगठन के अध्यक्ष आर.आर गौतम ने बीबीसी को बताया, "मेयर ने ये आश्वासन ज़रूर दिए हैं. मगर हम तब तक उनकी बातों पर भरोसा नहीं कर सकते, जब तक कि वेतन डॉक्टरों के बैंक अकाउंट में नहीं आ जाता."
कस्तूरबा गाँधी अस्पताल के डॉक्टरों के संगठन के उपाध्यक्ष वरुण बैरागी बीबीसी से कहते हैं कि इससे पहले भी वेतन को लकर निगम का यही रवैया था.
तब डॉक्टरों ने सामूहिक इस्तीफ़ा देने की धमकी दी थी. ये बात इसी साल जून महीने की है जब कोरोना वायरस का संक्रमण दिल्ली में अपने चरम पर था.
दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश
बैरागी ने बताया कि वेतन नहीं दिए जाने का दिल्ली उच्च न्यायलय ने स्वतः संज्ञान लिया था और आदेश पारित किए थे. वो कहते हैं कि अब निगम उच्च न्यायलय के उस आदेश की अवहेलना कर रहा है.
इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रतीक जालान ने स्वतः संज्ञान में लिया था और अख़बारों की ख़बरों को ही जनहित याचिका मान लिया था.
उच्च न्यायलय के आदेश में मुख्य न्यायाधीश ने साफ़तौर पर लिखा कि उन्होंने 'डॉक्टरों को वेतन नहीं मिल रहा है' इस पर मीडिया में छपी और दिखाई गई ख़बरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है.
न्यायमूर्ति जालान की एक सदस्यीय खंडपीठ ने अपने आदेश में साफ़तौर पर लिखा कि डॉक्टरों को समय पर वेतन देना निगम की पहली ज़िम्मेदारी भी है.
जिन कर्मचारियों का वेतन कई महीनों से बाकी हैं, उनमें सफ़ाई कर्मचारी भी हैं. उन्हें पिछले 6 महीनों से वेतन के दर्शन नहीं हुए हैं.
दिल्ली सरकार से बकाया पैसे
उत्तरी दिल्ली के मेयर कहते हैं कि दिल्ली सरकार से जैसे ही उन्हें बकाया पैसे मिल जाते हैं वो सबका वेतन बांट देंगे.
निगम का दावा है कि उन्हें 12 हज़ार करोड़ रुपये दिल्ली सरकार से मिलने वाले थे जो नहीं मिल सके हैं इसलिए ये नौबत आ गई है.
चूँकि नगर निगम में काम करने वाले डॉक्टर सबसे मुखर हुए, इसलिए उनकी मांगें मीडिया में छाई रहीं जबकि निगम के दूसरे विभागों के कर्मचारियों की तो कोई सुनने वाला भी नहीं है. इन्हें भी वेतन नहीं मिला है और वो भी कोरोना वायरस जैसी महामारी के दौर में.
दक्षिणी दिल्ली की मेयर अनामिका और दूसरे इलाकों के मेयरों का ये भी आरोप है कि उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मिलने का समय माँगा था जो अब तक नहीं मिला.
अनामिका कहती हैं कि हालात ऐसे हैं कि 1157 करोड़ रुपये में से सिर्फ़ 303 करोड़ रुपये ही दक्षिणी इल्ली के नगर निगम को दिल्ली सरकार द्वारा आवंटित किए गए.
आम आदमी पार्टी का पक्ष
उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश का कहना है कि जिस तरह का धरना डॉक्टर दे रहे हैं, उसी तरह दिल्ली के सभी नगर निगम के मेयर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास के सामने धरना देंगे.
आम आदमी पार्टी की तरफ़ से दुर्गेश पाठक नगर निगम से सम्बंधित मामले देखते हैं.
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि निगम के मेयर पहले कह रहे थे कि पैसे ही नहीं हैं जबकि अब वो ही कह रहे हैं कि एक महीने का वेतन देने जा रहे हैं. उनका आरोप था कि केंद्र सरकार दूसरे राज्यों में नगरपालिकाओं, निगमों और मेयरों को विकास के लिए राशि उपलब्ध कराता है. मगर ये राशि दिल्ली को नहीं मिलती है और दिल्ली के नगर निगम के पार्षदों ने कभी इसको लेकर सवाल नहीं उठाया है.
पाठक ने पत्रकारों से कहा कि निर्माण के काम में निगम की ख़ूब रुचि देखने को मिलती है. उन्होंने मिसाल दी कि रानी झाँसी पुल के निर्माण की लागत बढ़कर 800 करोड़ रुपये तक चली गई है. इस पुल का निर्माण निगम कर रही है.
हिंदू राव अस्पताल का मामला
हालांकि कोरोना वायरस के काल में डॉक्टरों की हड़ताल से मरीज़ों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
मिसाल के तौर पर हिंदू राव अस्पताल कोविड-19 के मरीज़ों के इलाज के लिए चिह्नित किया गया और कोरोना वायरस से संक्रमित कई गंभीर मामले इस अस्पताल में भर्ती थे. मगर डॉक्टरों की हड़ताल के बाद हिंदू राव अस्पताल अब कोविड-19 का अस्पताल नहीं है.
जब से डॉक्टरों ने काम बंद किया, पूरे अस्पताल को सैनिटाइज़ किया गया. अब यहाँ कोविड-19 के मरीज़ों का इलाज नहीं होगा. दूसरे रोगों से ग्रसित लोगों को भी परेशानी झेलने पड़ रही है क्योंकि हिंदू राव अस्पताल के पास ही काफ़ी बड़ी बस्ती है जहां ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग रहते हैं.
दिल्ली के तीनों नगर निगमों में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है. डॉक्टरों और निगम के दूसरे कर्मचारियों के लंबित वेतन ने दोनों दलों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है.
जानकारों को लगता है कि दिल्ली के सफ़ाईकर्मी अगर ऐसे समय पर वेतन की मांग को लेकर कहीं काम बंद कर दें तो दिल्ली कूड़े के ढेर में तब्दील हो जाएगी.
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