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दिल्ली का हिंदू राव अस्पताल खाली, आईसीयू में सिर्फ़ तीन गंभीर मरीज़
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना महामारी के दौर में उत्तरी दिल्ली का 980 बेड वाला हिंदू राव अस्पताल लोगों के लिए एक बड़ी उम्मीद वाला अस्पताल था क्योंकि यहाँ पर कोविड-19 के मरीज़ों का बेहतर इलाज हो रहा था.
इसके अलावा भी अस्पताल में प्रतिदिन ओपीडी यानी बाहरी मरीज़ों का इलाज होता था.
लेकिन शनिवार से ये सारी सुविधाएं ठप्प पड़ी हुईं हैं क्योंकि यहाँ के जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर चले गए हैं. उनका कहना है कि उन्हें पिछले चार महीनों से वेतन नहीं मिला है.
अस्पताल के हालात ऐसे हो गए हैं कि कोरोना पीड़ित सभी मरीज़ों को दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दूसरे अस्पतालों में स्थानांतरित कर दिया गया है.
अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष यानी आईसीयू में तीन मरीज़ मौजूद हैं जिनको कहीं और नहीं भेजा जा सकता है क्योंकि उनकी हालत चिंताजनक बनी हुई है और वो लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं.
अस्पताल के मुख्य द्वार पर पुलिस का बैरीकेट
रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन की महासचिव डॉक्टर मिताली शरण कहती हैं कि हड़ताल के बावजूद आईसीयू में भर्ती मरीज़ों का डॉक्टर पहले की तरह ही ख़्याल रख रहे हैं.
हालांकि आंदोलनकारी डॉक्टरों ने खुद को कोविड-19 के उपचार की सेवाओं से बिलकुल अलग कर लिया है.
अस्पताल के मुख्य द्वार को दिल्ली पुलिस ने बैरीकेट लगाकर बंद कर दिया है. अंदर मौजूद डॉक्टर हाथ में बैनर और पोस्टर लेकर नारे लगा रहे हैं, वो मांग कर रहे हैं, "हमें हमारी तनख्वाह दो. हमारे चार महीने के बकाए पैसे दो."
लेकिन एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर अभिमन्यु का कहना है कि आंदोलन का नोटिस उन्होंने दिया था तो उन्हें लगा कि शायद प्रशासन अब डॉक्टरों की बात सुनेगा.
मगर वो कहते हैं, "अस्पताल प्रशासन ने तो कोई भाव ही नहीं दिया और ना ही बातचीत के लिए बुलाया. बकाया वेतन कब देंगे? इसपर भी कोई चर्चा नहीं. रोज़ डॉक्टर आते हैं और मुख्य द्वार पर प्रदर्शन करते हैं. न तो अस्पताल का प्रशासन और ना ही नगर निगम का कोई अधिकारी हमारी ख़बर ही लेने आया."
आरोप-प्रत्यारोप
हिंदू राव अस्पताल उत्तर दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आता है. मगर पेंच ऐसे फंसा कि नगर निगम दिल्ली सरकार पर वेतन के पैसे ना मुहैया कराने का आरोप लगा रहा है.
वहीं दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन का कहना है कि नगर निगम अपने सभी अस्पतालों को दिल्ली सरकार के अधीन कर दे तो सबकी काया पलट हो जाएगी.
यहाँ बताना ज़रूरी है कि नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत है.
जानकार बताते हैं कि हिंदू राव अस्पताल का मुद्दा नगर निगम और दिल्ली की सरकार की मूंछ की लड़ाई बन गया है जिसमे अस्पताल के डॉक्टर पिसने को मजबूर हो गए हैं.
अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के महासचिव सिद्धार्थ तारा कहते हैं कि उन्हें सबसे नाउमीदी ही मिली है - चाहे अधिकारी हों, अस्पताल का प्रशासन हो या फिर जनप्रतिनिधि.
वो कहते हैं कि इन सबके अड़ियल रवैये की वजह से जिन्हें परेशानी हो रही है, वो हैं इलाज कराने के लिए अस्पताल आने वाले आम लोग.
बिना वेतन गुज़ारा नहीं
संगठन के अध्यक्ष अभिमन्यु सरदाना कहते हैं कि सिर्फ़ डॉक्टर ही क्यों? किसी भी नौकरीपेशा इंसान का वेतन अगर रुक जाए तो वो अपनी गृहस्थी कैसे चलाएगा?
वो कहते हैं कि उनके संगठन के कई ऐसे डॉक्टर हैं जो किराये के मकान में रहते हैं और अब उनके पास ना खाने को पैसे हैं और ना किराया देने के ही पैसे हैं.
डॉक्टरों का आरोप है कि उन्होंने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली के उपराज्यपाल से मिलने की अनुमति भी मांगी है. मगर दिल्ली पुलिस ने अनुमति देने से इनकार कर दिया है.
डॉक्टरों का ये भी कहना है कि पिछले चार महीनों से उन्होंने कोरोना संक्रमित मरीज़ों को सेवा प्रदान करना अपनी ज़िम्मेदारी समझा और निभाया भी. बिना वेतन के भी वो दिन रात ऐसे समय में काम करते रहे जब दिल्ली में कोविड-19 के मरीज़ों की संख्या काफ़ी बढ़ी हुई थी.
सरदाना कहते हैं, "हम दिन रात काम कर रहे थे और हम ने उफ़ भी नहीं किया. हमें उम्मीद थी कि हमारा वेतन जल्द ही मिल जाएगा. लेकिन सरकार और प्रशासन ने असंवेदनशीलता का परिचय दिया है. ये अमानवीय है."
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