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कोविड-19 के दौरान प्रदूषण मौत के ख़तरे को बढ़ा रहा है?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत एक ओर जहां कोरोना वायरस से निपट रहा है, वहीं मौसम ने भी अपनी चाल बदल दी है और हवा में ठंड का एहसास होने लगा है.
इस ठंडक के बीच राजधानी दिल्ली और एनसीआर एक धूंधली चादर में ढंका हुआ नज़र आता है. ये चादर प्रदुषित हवा का है. बताया जा रहा है कि पराली जलने से प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है. इस बीच एक शोध में बताया गया है कि कोविड -19 के दौरान ये प्रदूषण मौत का एक बड़ा कारण बन सकता है.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च यानि आईसीएमआर का कहना है कि लंबे समय तक प्रदूषण के प्रभाव में रहने से कोविड-19 से मौत का ख़तरा बढ़ सकता है.
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ बलराम भार्गव का कहना है, ''यूरोप और अमरीका में प्रदूषित इलाक़ों में और लॉकडॉउन के दौरान होने वाली मौत का तुलनात्मक अध्ययन किया गया और इसमें ये जानने की कोशिश की गई कि प्रदूषित हवा का इससे क्या संबंध है. पता चला कि प्रदूषण, कोविड को और घातक बना रहा है. प्रदूषण और कोविड से होने वाली मौत में संबंध है, ये बात अब शोध से पूरी तरह स्पष्ट है."
दरअसल कॉर्डियोवेसकूलर रिसर्च जर्नल ने एक शोध किया था जिसमें ये पाया गया कि वायु प्रदूषण, कोविड-19 के दौरान मौत के ख़तरे को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है.
शोध में कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता को लेकर कड़े मानक अपनाए गए हैं और वायु प्रदूषण का स्तर कम है, वहां कोविड-19 से होने वाली मौत का प्रतिशत कम है. जैसा कि ऑस्ट्रेलिया. वहीं शोध में पूर्वी एशिया, सेंट्रल यूरोप, पश्चिमी अमरीका के इलाक़ों का ज़िक्र किया गया है जहां प्रदूषण का स्तर अधिक होने के साथ-साथ मौत का प्रतिशत भी अधिक है.
अध्ययन में इस बात का भी ज़िक्र है कि चीन, पोलैंड और चेक रिपब्लिक सरीखे देशों में प्रदूषण और कोविड-19 के मिले जुले असर की वजह से कहीं ज़्यादा लोगों ने जान गंवाई है.
नेशनल हार्ट इंस्टीच्यूट के डॉ ओपी यादव और दिल्ली के इंस्टीच्यूट ऑफ़ लिवर एंड बिलियरी साइंस (आईएलबीएस) के डॉ. एसके सरीन दोनों का ही मानना है कि कोविड के दौरान प्रदूषण से हो रही मौत का अप्रत्यक्ष रुप से संबंध हो सकता है, लेकिन किसी भी अध्ययन में कॉज़ एंड इफ़ेक्ट नहीं बताया गया है.
डॉ एसके सरीन कहते हैं, ''बहुत लंबे समय तक प्रदूषण का प्रभाव और कोविड के दौरान उससे ज़्यादा मौत हो रही है इसका कोई डायरेक्ट कॉज़ और इफ़ेक्ट नहीं है लेकिन इसका एसोसिएशन या संबंध हो सकता है. लेकिन दिल्ली में क्रोनिक प्रदूषण है इसलिए इससे प्रभाव हो सकता है. इसलिए दिल्ली को प्रदूषण से बचना चाहिए, ख़ासकर के त्यौहार के मौसम में और पटाख़े जलाने से बचना चाहिए.''
वहीं डॉ ओपी यादव बताते हैं, "हमारी कोशिकाओं पर एस 2 रिसेप्टर होते हैं, प्रदूषण उसको एक्टिवेट कर देते हैं और छोटा-मोटा वायरस उसे पकड़ लेता है और वो कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है. और इससे वो शरीर को प्रभावित करना शुरू कर देता है. प्रदूषण की बात की जाए तो ऐसे कई अध्ययन बताते हैं कि प्रदूषण से शरीर पर हानिकारक प्रभाव होते हैं और इससे प्रीमैच्योर डेथ यानि 40 साल की उम्र में भी मौतें हो रही हैं.''
वो कहते हैं कि जिन लोगों को डायबीटिज़, फेफड़े की बीमारी, हाईबीपी हो और जो बुज़ूर्ग हैं उनके लिए कोविड ज़्यादा घातक होता है. जिन्हें ये बीमारी हो, प्रदूषण के दौरान उनकी स्थिति और ख़राब हो सकती है. ऐसे में जिन लोगों को ये बीमारियां हैं उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता घटेगी इससे कोविड बढ़ेगा लेकिन इसका प्रत्यक्ष तौर पर असर पड़ेगा वो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर ज़रूर असर कहा जा सकता है.
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स के पल्मनेरी विभाग के प्रमुख डॉक्टर अनंत मोहन का कहना है कि ये पहली सर्दियां होगीं जब लोग कोविड का भी सामना कर रहे हैं. जिन लोगों को सांस लेने में तक़लीफ होती है उनकी प्रदूषण के दौरान दिक्क़तें और बढ़ जाती हैं और अगर ऐसे उन मरीज़ों को कोविड हो जाता है तो उनके फेफड़ों पर और घातक असर हो सकता है और उनको अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ती है और मौत की आशंका बढ़ जाती है.
वो कहते हैं कि हालांकि जिन लोगों को ऐसी शारीरिक तकलीफ़ नहीं है लेकिन प्रदूषण की वजह से उनके फेफड़े धीरे-धीरे ख़राब हो रहे हैं और ऐसे में अगर इसी प्रदूषित वातावरण में कोरोना होता है तो उनकी स्थिति और भी बिगड़ेगी.
डॉ एसके सरीन लोगों को एन-95 लगाने की सलाह देते हैं. उनका कहना है कि ये मास्क लगाने से आप ख़ुद तो वायरस से बचते ही हैं, साथ में आप दूसरों को भी बचाते हैं. इस मास्क को लगाने से 95 फ़ीसद वायरस निकल जाता है और पाँच प्रतिशत ही रह जाता है.
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