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लॉकडाउन में सब था बंद, तो धरती क्या कम गर्म हुई?
- Author, मैट मैकग्राथ
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पूरी दुनिया में लॉकडाउन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों और वायु प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों के उत्सर्जन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. लेकिन, वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका हमारी धरती की गर्मी पर न के बराबर फर्क पड़ेगा.
इस नए एनालिसिस से पता चलता है कि 2030 तक वैश्विक तापमान उम्मीद के मुकाबले महज 0.01 डिग्री सेल्शियस ही कम होगा.
लेकिन, लेखकों का कहना है कि रिकवरी का तरीका लंबे वक्त के नजरिये में बड़ा बदलाव कर सकता है.
ग्रीन जॉब्स और ग्रीन इनवेस्टमेंट्स से इस सदी के मध्य तक दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्शियस से ज्यादा बढ़ने से रुक सकता है.
पिछले अध्ययनों यह साबित हो चुका है कि महामारी के चलते दुनियाभर में ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स के बंद होने से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कमी आई है.
जब यह महामारी चरम पर थी उस वक्त दुनियाभर में कार्बन डाईऑक्साइड (सीओ2) का दैनिक उत्सर्जन 17 फीसदी घट गया था.
नई स्टडी गूगल और एप्पल के ग्लोबल मोबिलिटी डेटा के आधार पर तैयार की गई है.
इस स्टडी की अगुवाई करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के प्रोफेसर पियर्स फोर्सटर ने इस रिसर्च में अपनी बेटी हैरिएट को भी साथ लिया. उस वक्त उनकी बेटी के ए-लेवल के इम्तिहान रद्द हो गए थे.
अन्य शोधार्थियों के साथ उन्होंने यह आकलन किया कि फरवरी से जून 2020 के बीच 123 देशों में 10 अलग-अलग ग्रीनहाउस गैसों और एयर पॉल्युटेंट्स में किस तरह के बदलाव आए.
उन्हें पता चला कि यह गिरावट अप्रैल में अपने चरम पर पहुंच गई थी. उस दौरान सीओ2, नाइट्रोजन ऑक्साइड और दूसरे उत्सर्जन पूरी दुनिया में 10-30 फीसदी तक घट गए थे. इसकी मुख्य वजह जमीन पर होने वाली आवाजाही में गिरावट आना था.
लेकिन, यह नया काम बताता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में यह गिरावट वास्तविकता में गर्मी के संदर्भ में एक-दूसरे के असर को खत्म करने वाली साबित हुई है.
परिवहन से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड से वातावरण में गर्मी पैदा होती है.
हालांकि, इसमें 30 फीसदी की गिरावट आई है, लेकिन इतनी ही गिरावट सल्फर डाईऑक्साइड में भी आई है जो कि मूल रूप से कोयले के जलने से पैदा होती है.
इस गैस के उत्सर्जन से एयरोसोल्स के बनने में मदद मिलती है, जो कि सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके वापस आसमान में भेज देते हैं और धरती को ठंडा रखते हैं.
इस तरह का संतुलन और महामारी की पाबंदियों की अस्थाई प्रकृति का मतलब यह है कि 2030 तक वॉर्मिंग पर शायद ही कोई असर हो.
प्रोफेसर पियर्स फोर्सटर कहते हैं, "हालांकि, अस्थाई बदलाव मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन आपको स्थाई रूप से सीओ2 का उत्सर्जन घटाना होगा तभी आप ग्लोबल वॉर्मिंग को रोक पाएंगे."
वे कहते हैं, "सीओ2 वातावरण में लंबे वक्त तक टिकी रहती है. ऐसे में आपको इसका उत्सर्जन लंबे वक्त तक शून्य पर रखना होगा. इसके बाद ही दशकों के उत्सर्जन के असर खत्म होना शुरू होंगे."
हैरिएट फोर्सटर ने अपने पिता के साथ इस पेपर को लिखा है. वे कहती हैं कि हालांकि, हालिया असर लंबे नहीं चलेंगे, लेकिन सरकारों के लिए अपने तौर-तरीके बदलने का यह एक बड़ा मौका है.
वे कहती हैं, "हमारा पेपर दिखाता है कि पर्यावरण पर लॉकडाउन का वास्तविक असर मामूली है. अहम चीज यह है कि हमें एक बड़ा मौका दिया गया है ताकि हम ग्रीन इंडस्ट्रीज में निवेश के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएं. इससे भविष्य में हमारे पर्यावरण पर बड़ा असर पड़ सकता है."
लेखकों का कहना है कि कई देशों में अभी भी सड़कों पर ट्रैफिक काफी कम है. गूगल का डेटा बता रहा है कि यूके में ट्रांसपोर्ट के सभी साधन 25 फीसदी के करीब कम हैं. जबकि यूके सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अभी भी 12 फीसदी कारें कम चल रही हैं, लेकिन बसें और ट्रेनें 50 फीसदी से भी कम चल रही हैं.
शोधार्थियों की टीम का कहना है कि अगर आवाजाही अपने सामान्य स्तर पर लौट आए और इस दौरान पेट्रोलियम पर भारी निवेश हो तो इस बात की बड़ी संभावना है कि दुनिया 2050 के 1.5 डिग्री सेल्शियस के थ्रेशहोल्ड को पार कर जाएगी.
लेकिन, अगर रिकवरी ग्रीन जरियों से हो, यानी फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल घटे और 2050 तक ग्लोबल उत्सर्जन को नेट जीरो लेवल पर ले आया जाए तो इस बात के 55 फीसदी आसार होंगे कि दुनिया 2050 तक 1.5 डिग्री सेल्शियस से नीचे रहेगी.
तो इसके लिए क्या करना जरूरी है?
स्टडी की सह-लेखिका और यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया की प्रोफेसर कोरीने ले क्वेरे कहती हैं कि अब कई कदम उठाने होंगे.
वे कहती हैं, "शहरों में साइक्लिंग और वॉकिंग को सपोर्ट करना होगा. इसके पर्यावरण, वायु प्रदूषण को कम करने और स्वास्थ्य के लिए कई तरह के फायदे होते हैं."
उनके मुताबिक, "सामाजिक दूरी के नियम जब तक जारी रहते हैं तब तक घर से ही काम करने को प्रोत्साहन दिया जाए. इससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से प्रेशर घटेगा. जितना जल्दी मुमकिन हो, सभी कारें इलेक्ट्रिक कर दी जाएं."
प्रोफेसर फोर्सटर को उम्मीद है कि दुनिया इस चुनौती से निबट लेगी. वे कहते हैं, "अक्सर आपदाएं ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़े बदलाव लाती हैं."
वे कहते हैं, "पहली बार सरकार, इंडस्ट्री और आम जनता सब एकसाथ खड़े दिख रहे हैं और सभी को लग रहा है कि ग्रीन जॉब्स और ग्रीन इनवेस्टमेंट्स से ही भविष्य की इबारत लिखी जा सकती है."
यह स्टडी नेचर क्लाइमेट चेंज में छपी है.
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