भारत-अमरीका समझौते पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया

भारत-अमरीका समझौते पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया

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भारत और अमरीका के बीच तीसरी 2+2 मंत्री स्तरीय बैठक के दौरान बेसिक एक्‍सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA) समेत कई अहम समझौते हुए. इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे को अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी, साज़ो-सामान और भू-स्थानिक मानचित्र साझा करेंगे.

भारत और अमरीका से पहले ही ख़राब रिश्तों को लेकर चर्चा में बने हुए चीन ने ताज़ा समझौते को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है.

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते ने भारत की रक्षात्मक कमज़ोरी को अमरीका के सामने ला दिया है और "कम्पेटिबिलिटी के मसलों पर अमरीका की सेवाएं भारत की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरेंगी."

अख़बार का कहना है कि अमरीकी चुनाव के ठीक एक हफ़्ते पहले इस समझौते पर हस्ताक्षर इसलिए हुए हैं ताकि डोनल्ड ट्रंप की जीत की संभावना को बल मिले. चीनी विश्लेषकों के हवाले से अख़बार ने ये भी कहा है कि भारत और अमरीका के गहरे रिश्ते भी अनिश्चित हैं.

भारत-अमरीका समझौते पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया

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इमेज कैप्शन, अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और विदेश मंत्री माइक पोम्पियो, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर

ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि अमरीका मीठी-मीठी बातें करके भारत को फुसला रहा है और चीन और भारत के बीच के रिश्ते ख़राब कर रहा है, "लेकिन भारत ज़ाहिर तौर पर वाशिंगटन के संरक्षण को स्वीकार करके खुश है क्योंकि वो मानता है कि इससे चीन के साथ लंबे समय से चल रहे गतिरोध में जीत के लिए उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा."

अख़बार के मुताबिक़, शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज़ के इंस्टीच्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेश्स में एक शोधार्थी, हु झींग ने मंगलवार को कहा कि भारत ने धीरे-धीरे गुटनिरपेक्षता के अपने पारंपरिक कूटनीतिक सिद्धांत को छोड़ दिया है और अमरीका के क़रीब चला गया है.

"उनका कहना है कि इस नासमझ चुनाव ने विकासशील देशों की नज़र में भारत की प्रतिष्ठा को बहुत कम कर दिया है और एक पारंपरिक भू राजनीतिक शक्ति का उसका रणनीतिक फोकस धीरे-धीरे खोता जा रहा है."

वीडियो कैप्शन, क्या भारत और ये तीन देश चीन को चुनौती दे पाएंगे?

चुनाव से पहले समझौते पर उठाए सवाल

वहीं चीन सरकार से संबद्ध सिना डॉटकॉम ने सोमवार को विश्लेषकों के हवाले से कहा है कि चारों समझौते सैन्य सहयोग के विभिन्न स्तरों को दिखाते हैं.

उनका मानना है कि दोनों पक्ष सैन्य ख़ुफिया जानकारी साझा करने के मामले में कम से कम सैद्धांतिक तौर पर "अर्ध-सहयोगी" के स्तर तक पहुंच गए हैं.

सिना डॉट कॉम का कहना है कि विश्लेषकों का मानना है कि बैठक का समय भी बहुत नाज़ुक है, क्योंकि कुछ दिन बाद ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं.

मंगलवार को सिना डॉट कॉम ने लिखा कि नियमित संवाददाता सम्मेलन में विदेश मंत्रालय से एक पत्रकार ने पूछा कि अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के भारत दौर पर चीन का क्या कहना है.

तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा कि पोम्पियो के चीन पर हमले कोई नई बात नहीं है, "वो बिना तथ्यात्मक आधार के पुराना राग ही अलाप रहे हैं." प्रवक्ता ने ये भी कहा कि इससे अमरीका की शीत युद्ध वाली मानसिकता और वैचारिक पूर्वाग्रह सबके सामने आ गए हैं.

पोम्पियो

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उन्होंने कहा कि हम पोम्पियो से आग्रह करते हैं कि वो "चीन ख़तरे" की बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताना बंद करें और "क्षेत्र में चीन और दूसरे देशों के बीच रिश्ते ख़राब करना बंद करे और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कम करने वाले ग़लत काम करना भी बंद करे."

चीनी सरकार से संबद्ध एक अन्य समाचार वेबसाइट गुंचा ने मंगलवार को लिखा कि "सुरक्षा और स्वतंत्रता पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ख़तरे से निपटने और क्षेत्र में शांति और स्थितरता को बढ़ावा" देने के लिए भारत के साथ सहयोग पर चर्चा का दावा करते हुए पॉम्पियों ने एक बार फिर कोविड -19 और चीन के आंतरिक मामलों और कूटनीति जैसे मुद्दों पर चीन को बदनाम करने के लिए टिप्पणी की.

पाकिस्तान में भी भारत और अमरीका के बीच हुए इस समझौते को लेकर काफ़ी चर्चा है. पाकिस्तान की सरकार ने तो इस पर आधिकारिक बयान जारी किया ही है, पाकिस्तानी मीडिया में भी इस पर बातचीत हो रही है.

ज़्यादातर अख़बारों में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के ज़रिए जारी आधिकारिक बयान को ही प्रमुखता से छापा है. अंग्रेज़ी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा है कि भारत का हथियार हासिल करने और अपने परमाणु कार्यक्रम को और बढ़ाने के दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए गंभीर परिणाम होंगे.

डेली टाइम्स ने लिखा है कि अमरीका-भारत सैन्य संधि से क्षेत्र की सामरिक स्थिरता पर बुरा असर पड़ेगा.

उर्दू अख़बार जंग ने लिखा है कि अमरीका और भारत के बीच सैन्य समझौता चीन के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ने की घोषणा है.

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