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NBSA की भारतीय टीवी चैनलों पर 'नोटिसों की बौछार', कई न्यूज़ चैनलों को माँगनी होगी माफ़ी
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
भारतीय टीवी न्यूज़ चैनलों की स्वतंत्र संस्था 'न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी' (एनबीएसए) ने बीते दो दिन में कई नोटिस जारी किए हैं.
एनबीएसए ने कई टीवी न्यूज़ चैनलों को उनकी ग़लतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगने के निर्देश दिए हैं.
सबसे ताज़ा मामला टीवी न्यूज़ चैनल 'टाइम्स नाउ' से जुड़ा है जिससे एनबीएसए ने 27 अक्तूबर की रात 9 बजे माफ़ी माँगने को कहा है.
एनबीएसए के अनुसार, टाइम्स नाउ ने 6 अप्रैल 2018 को प्रसारित एक कार्यक्रम में लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता संयुक्ता बसु की ग़लत छवि पेश करने की कोशिश की थी, वो भी तब, जब संयुक्ता को उस शो में अपना पक्ष रखने का मौक़ा ही नहीं दिया गया था.
एनबीएसए ने अपने नोटिस में संयुक्ता की शिक़ायत के हवाले से लिखा है कि उन्हें टाइम्स नाउ ने अपने एक कार्यक्रम में 'हिन्दू विरोधी', 'भारतीय फ़ौज विरोधी' और 'राहुल गांधी की ट्रोल आर्मी का सदस्य' कहा था.
संयुक्ता की दलील थी कि उन्हें इन गंभीर आरोपों के जवाब में बोलने का मौक़ा मिलना चाहिए था, पर उन्हें इसकी कोई सूचना नहीं दी गई और उनके ख़िलाफ़ एकतरफ़ा ढंग से द्वेष फैलाने की कोशिश की गई.
'स्व-नियमन और निष्पक्षता का पालन नहीं'
इस मामले में अब एनबीएसए ने टाइम्स नाउ से माफ़ी माँगने को कहा है. संस्था ने लिखा है कि 'टाइम्स नाउ 27 अक्तूबर की रात 9 बजे अपनी टीवी स्क्रीन पर स्पष्ट शब्दों में लिखकर संयुक्ता बसु से माफ़ी माँगे कि उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में निष्पक्षता का पालन नहीं किया.'
संस्था ने यह भी कहा है कि यूट्यूब और सोशल मीडिया के अन्य किसी माध्यम पर अगर वो पुराना शो अब भी उपलब्ध है, तो टीवी चैनल उन्हें भी वहाँ से अगले सात दिन में डिलीट करे.
एनबीएसए एक स्वतंत्र इकाई है जिसका गठन एनबीए ने प्रसारणकर्ताओं के बारे में शिकायतों पर विचार करने और निर्णय लेने के लिए किया था. एनबीएसए ने पाया है कि टाइम्स नाउ ने इस मामले में स्व-नियमन का पालन नहीं किया.
एनबीएसए द्वारा नोटिस जारी किये जाने के बाद, संयुक्ता बसु ने एक बयान जारी किया है. उन्होंने एक ट्वीट में लिखा है कि 'हमारी जीत हुई. राहुल गांधी से मेरी मुलाक़ात के बाद यह सब शुरू हुआ था. टीवी चैनल ने राहुल को निशाना बनाने के लिए मुझे हिन्दू विरोधी और ट्रोल आर्मी का सदस्य कहा. पर वो ग़लत थे, यह साबित हो गया.'
अपने बयान में संयुक्ता ने लिखा है, "मैंने 25 मार्च 2019 को शिक़ायत की थी. एनबीएसए अब तक उस शिक़ायत को लेकर बैठा हुआ था. 23 अक्तूबर 2020 को मैंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और महज़ 24 घंटे में एनबीएसए ने यह नोटिस जारी कर दिया. फैसला बहुत देर से आया, पर हमारे पक्ष में आया."
सुशांत के मामले में कई चैनलों को नोटिस
इससे पहले, शुक्रवार को एनबीएसए ने अपने सदस्य चैनलों - आज तक, ज़ी न्यूज़, न्यूज़ 24, एबीपी न्यूज़ और इंडिया टीवी को सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में सनसनीख़ेज़, दोषपूर्ण और असंवेदनशील रिपोर्टिंग करने के लिए नोटिस दिया था.
एनबीएसए ने आज तक चैनल को तीन अलग-अलग मामलों में दोषी पाया है. संस्था ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का शव टीवी पर दिखाने के लिए, सुशांत का ग़लत ट्वीट टीवी पर प्रसारित करने के लिए और सुशांत के परिवार की निजता का ध्यान ना रखते हुए कुछ दर्दनाक दृश्य टीवी पर चलाने के लिए आज तक चैनल से तीन बार - 27 अक्तूबर, 29 अक्तूबर और 30 अक्तूबर को सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगने का निर्देश दिया है.
संस्था ने आज तक चैनल पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है.
स्थानीय मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार, एनबीएसए के चेयरमैन जज (रिटायर) एके सीकरी ने चैनलों के ख़िलाफ़ दर्ज हुई शिक़ायतों पर शिक़ायतकर्ताओं और चैनलों के प्रतिनिधियों के साथ 24 सितंबर को एक ऑनलाइन बैठक की थी.
इस बैठक में एनबीएसए के चेयरमैन ने कुछ भारतीय टीवी चैनलों पर चलीं टैगलाइन्स, जैसे- 'ऐसे कैसे हिट विकेट हो गए सुशांत?', 'सुशांत जिंदगी की पिच पर कैसे हिट विकेट हो गए', 'सुशांत इतने अशांत कैसे', 'सुशांत की मौत पर 7 सवाल' और 'पटना का सुशांत, मुंबई में फेल क्यों' पर चिंता ज़ाहिर की थी. साथ ही चैनलों के प्रतिनिधियों से कहा था कि वो भाषा और प्रसारण की मर्यादा का ध्यान रखें.
शुक्रवार को एनबीएसए ने आज तक की विवादित 'हिट विकेट' वाली टैगलाइन की ओर इशारा करते हुए कहा कि 'ऐसा लगता है जैसे सुशांत, जो अब दुनिया में नहीं हैं, उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं.' संस्था ने इन टैगलाइन्स को आपत्तिजनक बताया और कहा कि 'ये किसी की निजता और गरिमा को प्रभावित करती हैं.'
एनबीएसए ने ज़ी न्यूज़ और रजत शर्मा के चैनल इंडिया टीवी को 27 अक्तूबर की रात 9 बजे माफ़ी माँगने के लिए कहा है. वहीं, न्यूज़ 24 को 29 अक्तूबर की रात 9 बजे अपना माफ़ीनामा पेश करना होगा.
इसके अलावा एबीपी न्यूज़ के जिस कंटेट को आपत्तिजनक पाया गया, उसे एनबीएसए ने सोशल मीडिया और यू-ट्यूब से हटाने का निर्देश दिया है.
एनबीएसए को और ताक़त देने का सवाल
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, बंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को पूछा था कि केंद्र सरकार समाचार चैनलों द्वारा प्रसारित विषयवस्तु को नियंत्रित करने के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) जैसी निजी संस्थाओं के दिशा-निर्देशों पर अपनी मुहर लगाकर उन्हें लागू क्यों नहीं कर पाई?
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी एस कुलकर्णी की पीठ ने कहा था कि एनबीएसए की विस्तृत आचार संहिता और दिशानिर्देश हैं. पीठ ने कहा कि इनका सभी सदस्य चैनलों से पालन करने की अपेक्षा की जाती है और उसे कुछ अधिकार दिये जा सकते हैं और सरकार द्वारा लागू करने योग्य बनाया जा सकता है.
बंबई उच्च न्यायालय उन जनहित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रहा है, जिनमें कहा गया है कि प्रेस, विशेष रूप से टीवी समाचार चैनलों, की अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में रिपोर्टिंग को नियंत्रित किया जाये. सामाजिक कार्यकर्ताओं, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों और कुछ निजी नागरिकों द्वारा दायर की गई याचिकाओं में प्रेस द्वारा मामले में 'मीडिया ट्रायल' किये जाने का विरोध किया गया है.
एनबीएसए की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और वकील नीला गोखले ने अदालत से कहा कि निजी संस्था ने समाचार चैनलों के ख़िलाफ़ प्राप्त अनेक शिक़ायतों पर कार्रवाई की है. वकीलों ने कहा कि एनबीएसए ने पहले कुछ समाचार चैनलों पर दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाली सामग्री के प्रसारण पर अधिकतम एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था.
दातार ने कहा कि एनबीएसए ने उच्चतम न्यायालय के पिछले फ़ैसलों के आधार पर समाचार प्रसारणकर्ताओं के लिए स्व-नियमन की प्रणाली का समर्थन किया है.
पीठ ने कहा, "जब डॉक्टरों को रियायती दरों पर पीजी कोर्स में प्रवेश दिया जाता है, तो उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा करनी होती है. यदि वे उस शर्त को पूरा नहीं करते, तो डॉक्टरों को उनका प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता. यदि वे शर्त से इनकार करते हैं, तो उन पर जुर्माना लगाया जाता है."
अदालत ने पूछा था कि "आपके पास इस तरह के दिशा-निर्देश क्यों नहीं हो सकते? इन दिशा-निर्देशों में इस तरह की शक्ति होनी चाहिये."
इस पर दातार ने कहा था कि अगर किसी चैनल ने एनबीएसए के दिशा-निर्देशों का पालन करने से इनकार कर दिया या अगर उसने जुर्माना देने से इनकार कर दिया, तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय दखल दे सकता है और कार्रवाई कर सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्व-नियमन विफल हो गया, तो अदालत को भी क़दम उठाने की पर्याप्त शक्ति है.
हालांकि, उन्होंने कहा कि एनबीएसए मीडिया को विनियमित करने के लिए किसी नये वैधानिक निकाय के पक्ष में नहीं है.
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