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'मीडिया से बड़ी डुगडुगी और सरकार से बड़ा मदारी शायद कोई नहीं': वुसअत का ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
नए ज़माने के सरकार की तारीफ़ ये है कि एक ऐसी सरकार जो जनता की समस्याओं को भले हल न कर सके, अंदर और बाहर के हालात उसके क़ाबू में न हों, मगर उसको एक साथ पाँच गेंदें हवा में उछालने की कला का माहिर ज़रूर होना चाहिए.
ताकि लोग अपने पैरों की बजाय हवा में उछलती रंग-बिरंगी गेंदों को देखते रहें और उनकी गर्दन कभी पूरब की ओर तो कभी पश्चिम की ओर मुड़ती रहे. और जब आँखें थक जाएं तो वो सो जाएं और अगले दिन फिर यही तमाशा देखने के लिए हँसी ख़ुशी उठ जाएं.
मसलन एक गेंद किसी भी फ़र्ज़ी दुश्मन के नाम की उछाल दो, एक गेंद सुनहरे इतिहास की उछाल दो, एक देश के अंदरूनी ग़द्दारों के नाम की उछाल दो, एक रंगीन भविष्य की गेंद उछाल दो और एक गेंद डर और भय की उछालते रहो कि हम न रहे तो तुम भी नहीं रहोगे.
मतलब ये कि जनता का दिमाग़ किसी एक मसले पर ज़्यादा देर टिकने न पाए और राजनीति की कथा टीवी सीरियल की तरह हर क़िस्त में एक नया सवाल छोड़ जाए - अब क्या होगा? अगले एपिसोड में सीमा विजय को छोड़ेगी या फिर विजय अजय के हाथों मारा जाएगा?
एक एपिसोड में काला धन लाएंगे, अगले एपिसोड में सबका साथ-सबका विकास, फिर नोटबंदी, फिर पाकिस्तान की शरारतें, फिर आर्टिकल 370 की छुट्टी, फिर किसको नागरिकता मिलेगी किसको नहीं, फिर दिल्ली के दंगे, फिर चाइना आक्रमण, फिर रफ़ाल विमान, फिर राम मंदिर के निर्माण का उद्घाटन, फिर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या और अगली खोज दीपिका समेत कितने अभिनेता या अभिनेत्रियाँ नशा करते हैं या नहीं करते.
मतलब ये कि जनता को साँस मत लेने दो, कहीं वो असली मुद्दों पर सोचना न शुरू कर दे.
हमारे यहाँ भी यही कहानी है
अगर मैं सिर्फ़ पिछले चार साल की बात करूं तो एक के बाद एक ड्रामा. इमरान ख़ान का धरना, फिर पनामा लीक्स, फिर नवाज़ शरीफ़ जा रहा है तो कौन आ रहा है, फिर तौहीने-रिसालत की तहरीक, फिर इमरान ख़ान का नया पाकिस्तान, फिर पतली होती आर्थिक स्थिति से तवज्जो हटाने के लिए करप्शन के नाम पर विरोधियों की पकड़-धकड़ और मुक़दमे, फिर मीडिया पर व्हाट्सऐप और फ़ोन के ज़रिए कंट्रोल, फिर देशद्रोह नेताओं और पत्रकारों की ट्रोलिंग, फिर कौन सेनापति से रात के अंधेरे में मिलता है कौन नहीं मिलता का ड्रामा, फिर कराची सूबा बनेगा नहीं बनेगा की बहस और फिर अब ये बहस कि गिलगित-बल्तिस्तान को चुनाव से पहले नया राज्य बनाया जाए या चुनाव के बाद.
किसी चैनल पर नहीं आ रहा कि दवाओं की क़ीमत में अचानक से ढाई सौ फ़ीसद़ तक इज़ाफ़ा कैसे हो गया? बिजली जब ज़रूरत से ज़्यादा बन रही है तो उसकी क़ीमत छत से क्यों लग गई है और छह-छह घंटे क्यों नहीं आ रही?
बारिशों में देश का सबसे बड़ा शहर कराची क्यों डूब गया और आइंदा उसे झील बनने से बचाने के लिए क्या इंतेज़ामात किए जा रहे हैं? लॉ एंड ऑर्डर बेहतर बनाने की बजाय हर दूसरे महीने ये पुलिस अफ़सर ही क्यों बदल जाते हैं?
कोविड-19 की वजह से जो लाखों बच्चे घर पर बैठे हैं उनकी फ़ीसें तो बराबर जा रही हैं पर शिक्षा का क्या होगा? इन सब पर कोई बात ही नहीं.
बस जनता को नक़ली मसलों के ट्रक की बत्ती के पीछे लगा कर रखो.
इसी तरह चंद साल और गुज़र जाएंगे. फिर एक नया ड्रामा और फिर वही पुराना डायरेक्टर. जीना इसी का नाम है.
पहले शक था पर अब मुझे यक़ीन होता जा रहा है कि इस पृथ्वी पर मीडिया से बड़ी डुगडुगी और सरकार से बड़ा मदारी शायद कोई नहीं.
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