कोरोना के बीच दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण को संभाल पाएगी सरकार?

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- Author, जुगल आर पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली-एनसीआर की हवा में प्रदूषण का स्तर इस साल फिर बढ़ गया है. दिल्ली के 36 मॉनीटरिंग स्टेशन के डेटा के मुताबिक़ हवा की क्वालिटी 'गंभीर रूप से ख़राब' श्रेणी में पहुँच गई है.
मुमकिन है कि जिस वक़्त आप ये कहानी पढ़ रहे हैं, हवा की गुणवत्ता और ख़राब हो चुकी हो.
लेकिन ये हाल सिर्फ़ दिल्ली का नहीं है. पूरे उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता ख़राब हो रही है.
सर्दियों की शुरुआत में तापमान गिरा है और हवा की गति कम हुई है. इसके साथ ही आसपास के इलाक़ों में पराली जलाये जाने से स्थिति बदतर होती जा रही है.

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पर्यावरणविद और एनसीआर की पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण की सदस्य सुनीता नारायण बताती हैं, "आगे बहुत तेज़ ठण्ड आने वाली है. मैं इस साल बहुत डरी हुई हूँ. कोविड-19 के साथ ये दोहरी मार हो सकती है क्योंकि वायरस हमारे फेफड़ों पर उसी तरह हमला करता है, जैसे हवा में प्रदूषण. इसलिए हमें प्रभावी क़दम उठाने की ज़रूरत है."
वे कहती हैं कि महामारी के कारण सरकारी तंत्र के लोग अलग-अलग कामों में व्यस्त हैं, इसलिए इस बार चुनौती ज़्यादा बड़ी है.
वे कहती हैं, "दिल्ली, हरियाणा, यूपी, पंजाब या राजस्थान में हमारे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बहुत कमज़ोर हैं, इनके पास बहुत सीमित कर्मचारी हैं, इसलिए इनकी क्षमता बहुत कम है. हमें इन संस्थानों को सशक्त बनाने की ज़रूरत है. सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरन्मेंट) ने कुछ साल पहले इस पर प्रकाश डाला था. हम इस विषय पर फिर से विचार कर रहे हैं और सरकारों से बात करने की कोशिश कर रहे हैं"

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क्या पराली जलना कम होगा?
ईपीसीए द्वारा उच्चतम न्यायालय के समक्ष पेश किये गए आंकड़ों से पता चलता है कि अक्तूबर और दिसंबर के बीच, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पीएम-2.5 के कुल स्तर का 60 प्रतिशत पराली के धुएं के कारण हो सकता है.
पिछले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाने के कुल 61,000 से अधिक मामले सामने आये थे.
रिकॉर्ड किये गए उदाहरणों के साथ, 2019 की हालत पहले के सालों के मुक़ाबले बुरी थी.
2020 में क्या होगा?
नारायण के मुताबिक़,"यह इस बात पर निर्भर करता है कि पराली जलाई जाती है या नहीं. पहले यह कहा गया था कि किसानों के पास कोई विकल्प नहीं है. लेकिन अब ऐसी मशीनें हैं जो जलाने के बजाय, खेत में कटाई के बाद बचे फसल के अंश को हटा सकती हैं."
"लेकिन क्या किसान इनका उपयोग करेंगे? क्या किसान इस बारे में जानते हैं? और क्या राज्यों में सरकारें किसानों को जागरूक करने का प्रयास कर रही हैं."

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"अगर स्टबल बर्निंग नहीं होती या पहले से कम होती है, तो हमें प्रदूषण में गिरावट दिखेगा. मगर मूल्यांकन करने का दूसरा पहलू यह है कि क्या राज्य सरकारें ज़मीन पर नियमों को लागू कर रही हैं."
"तीसरा पहलू है हवा - जो एक तरह से सबसे बड़ा कारण भी है. अगर इस सर्दी में बारिश नहीं होती और हवा नहीं चलती तो हम साँस लेने में दिक्कतों का सामना करेंगे." हालांकि नारायण कहती हैं कि सरकारें इस मसले को लेकर गंभीर दिखती हैं.
ज़मीन पर रणनीति
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया रोडमैप 'दो-आयामी' दृष्टिकोण के बारे में बात करता है.
ईपीसीए की रिपोर्ट (संख्या 117) जिसे 30 सितंबर को जमा किया गया था, उसके अनुसार, "किसानों को मशीनें उपलब्ध करानी हैं जो नीचे बचे ठूंठ को निकालने में मदद करें. साथ ही किसानों को पराली के लिए सही मूल्य दिया जाये."
"राज्यों ने पहले ही स्टबल मैनेजमेंट मशीनें (पंजाब, हरियाणा और यूपी के बीच लगभग 80,000) ख़रीदी हैं और कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) की स्थापना की है. इस सीजन में कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लक्ष्य बनाये गए हैं. लंबे समय में इसका उद्देश्य फसलों में विविधता लाने का है, ताकि किसान गै़र-बासमती धान से दूर चले जाएं जिनके कारण पराली के जलाने की समस्या बढ़ती है."
हालांकि, खेत में आग लगाने की घटनाएं इस साल भी सामने आईं हैं.
16 अक्तूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एम बी लोकुर को एक व्यक्ति की निगरानी समिति के रूप में नियुक्त किया.
भारत के मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे ने कहा, "लोगों को दिल्ली और एनसीआर में साँस लेने के लिए साफ़ हवा मिलनी चाहिए"
लॉकडाउन में शुद्ध हवा मिली लेकिन...
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 'लॉकडाउन का असर (25 मार्च से 15 अप्रैल, 2020) हवा की गुणवत्ता' नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि "कुल मिलाकर, पीएम-2.5 में 46% की कमी और पीएम-10 में 50% की कमी देखी गई. चूंकि दिल्ली के नायट्रस ऑक्साइड का 81% परिवहन क्षेत्र से आता है, इसलिए वाहनों की गतिविधि पर प्रतिबंध से इसमें कमी आई है."
लेकिन नारायण कहती हैं कि 'तालाबंदी यानी लॉकडाउन कोई उपाय नहीं हो सकता.'
वे कहती हैं, "हम प्रदूषण के ख़िलाफ़ लड़ाई में तेज़ी ला रहे हैं. थर्मल प्लांट को बंद करने जैसे बड़े फ़ैसले पहले ही लिये जा चुके हैं. दिल्ली के आसपास ट्रकों के लिए राजमार्गों का निर्माण किया जा रहा है और नये ईंधन भी लाये जा रहे हैं."
"ये सुधार छोटे-छोटे क़दमों से आयेंगे, लेकिन अगर व्यापक बदलाव की इच्छाशक्ति है तो बिजली पैदा करने के लिए कोयले को जलाना बंद करना पड़ेगा और वहाँ प्राकृतिक गैस का उपयोग करके बिजली पैदा करनी होगी.
"अगर ऐसा होता है, तो हम तुरंत हवा में बदलाव देख सकेंगे."

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लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो रहा?
नारायण कहती हैं, "हम केंद्र सरकार से बात कर रहे हैं. इंडस्ट्री सस्ती चीज़ों का उपयोग करती है. अगर प्राकृतिक गैस को जीएसटी के तहत लाया जाता है और क़ीमत कम होती है, तो इस क्षेत्र में गैस की उपलब्धता बढ़ेगी."
भारत सल्फ़र डाइऑक्साइड का दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक है.
8 अक्तूबर को, ग्रीनपीस ने बताया था कि "2019 में, भारत ने वैश्विक मानव निर्मित सल्फ़र डाइऑक्साइड उत्सर्जन का 21% उत्सर्जित किया जो रूस से दोगुना है. रूस इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर है."
लॉरी मिनिविर्ता सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की प्रमुख विश्लेषक हैं, जिन्होंने ग्रीनपीस के आँकड़ों का विश्लेषण भी किया है.
उन्होंने कहा, "दुर्भाग्य से, सूची में शीर्ष पर रहने वाले कुछ देशों जैसे भारत, मैक्सिको और दक्षिण अफ़्रीका की सरकारों ने उत्सर्जन के नियमों का पालन करने में देरी की."
यूनाइटेड स्टेट एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (USEPA) के अनुसार, सल्फ़र डाइऑक्साइड मानव श्वसन प्रणाली को नुकसान पहुँचा सकती है और साँस लेने में मुश्किलें पैदा कर सकती है.
अस्थमा से पीड़ित लोग, ख़ासकर बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ेगा. पीएम 2.5 और पीएम 10 फ़ेफ़ड़ों में गहराई से प्रवेश कर जाते हैं.
नारायण कहती हैं कि "पावर प्लांट मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट जागरूक है और उसने फ़ैसला किया है कि 2022 तक सभी नियमों का पालन करना होगा. पावर प्लांट और अधिक समय चाहते हैं लेकिन हम इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि साँस लेने का अधिकार बरकरार रहना चाहिए."
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