कमलनाथ, सिंधिया और शिवराज तीनों के लिए बहुत अहम हैं मध्य प्रदेश विधानसभा के उप-चुनाव

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- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
नवंबर की 3 और 7 तारीख़ को 11 राज्यों की जिन 56 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने जा रहे हैं, उनमें मध्य प्रदेश विधानसभा की 28 सीटें भी शामिल हैं.
वैसे तो संसद या विधानमंडल के किसी भी सदन की किसी भी ख़ाली सीट के लिए उपचुनाव होना एक सामान्य प्रक्रिया है लेकिन मध्य प्रदेश की 28 सीटों के लिए होने जा रहे उपचुनाव देश के संसदीय लोकतंत्र की एक अभूतपूर्व घटना है.
राज्य की 230 सदस्यीय विधानसभा में 28 सीटों के लिए यानी 12 फ़ीसद सीटों के लिए उपचुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक हैं कि इससे पहले किसी राज्य में विधानसभा की इतनी सीटों के लिए एक साथ उपचुनाव कभी नहीं हुए.
आम तौर पर किसी भी उपचुनाव के नतीजे से किसी सरकार की सेहत पर कोई ख़ास असर नहीं होता, सिर्फ़ सत्तारूढ़ दल या विपक्ष के संख्याबल में कमी या इज़ाफ़ा होता है, लेकिन मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव से न सिर्फ़ सत्तापक्ष और विपक्ष का संख्या बल प्रभावित होगा, बल्कि राज्य की मौजूदा सरकार का भविष्य भी तय होगा कि वह रहेगी अथवा जाएगी इसलिए भी इन उपचुनावों को अभूतपूर्व कहा जा सकता है.
इतनी सीटों पर उपचुनाव आख़िर क्यों?
दरअसल, मध्य प्रदेश में इतनी अधिक सीटों पर उपचुनाव सात महीने पुराने एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की वजह से हो रहे हैं, इसी साल मार्च महीने में पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से अपना 18 साल पुराना नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए थे.

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उनके साथ कांग्रेस के 19 विधायकों ने भी कांग्रेस और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देकर भाजपा का दामन थाम लिया था.
उसी दौरान तीन अन्य कांग्रेस विधायक भी पार्टी और विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हुए थे, इन तीन में से दो को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का और एक विधायक को पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का समर्थक माना जाता था.
कुल 22 विधायकों के पार्टी और विधानसभा से इस्तीफ़ा दे देने के कारण सूक्ष्म बहुमत के सहारे चल रही कांग्रेस की 15 महीने पुरानी सरकार अल्ममत में आ गई थी. सरकार को समर्थन दे रहे कुछ निर्दलीय, समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विधायकों ने भी कांग्रेस पर आई इस 'आपदा' को अपने लिए 'अवसर' माना और वे पाला बदल कर भाजपा के साथ चले गए.
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भाजपा के शीर्ष नेता पहले दिन से दावा करते आ रहे थे कि वे जिस दिन चाहेंगे, उस दिन कांग्रेस की सरकार गिरा देंगे. उनका दावा हक़ीक़त में बदल गया, कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.
विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर भाजपा बहुमत में आ गई और इसी के साथ एक बार फिर सूबे की सत्ता के सूत्र भी उसके हाथों में आ गए, इसी बीच तीन विधायकों के निधन की वजह से विधानसभा की तीन और सीटें ख़ाली हो गईं और कांग्रेस के तीन अन्य विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देकर भाजपा का दामन थाम लिया, इस प्रकार विधानसभा की कुल 28 सीटें ख़ाली हो गईं.
ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जो विधायक कांग्रेस और विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हुए थे, उनमें से आधे से ज्यादा को मंत्री बना दिया गया और अन्य को सरकारी निगमों और बोर्डों का अध्यक्ष बना कर मंत्री स्तर का दर्जा दे दिया गया. ख़ुद सिंधिया भी भाजपा की ओर से राज्यसभा में पहुँच गए.
शिवराज या कमलनाथ

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बहरहाल, विधानसभा की 28 ख़ाली सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं, फ़िलहाल 230 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में 202 सदस्य हैं, जिनमें भाजपा के 107, कांग्रेस के 88, बसपा के दो, सपा का एक तथा चार निर्दलीय विधायक हैं.
इस संख्या बल के लिहाज़ से भाजपा को 230 के सदन में बहुमत के लिए महज़ 9 सीटें और चाहिए जबकि कांग्रेस को फिर से सत्ता हासिल करने के लिए उपचुनाव वाली सभी 28 सीटें जीतनी होगी.
जिन 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, उनमें से 25 सीटें तो कांग्रेस विधायकों के इस्तीफ़े से ख़ाली हुई हैं, विधायकों के निधन से ख़ाली हुई तीन सीटों में भी दो सीटें पहले कांग्रेस के पास और एक सीट भाजपा के पास थी.
उपचुनाव वाली 28 सीटों में से 16 सीटें राज्य के अकेले ग्वालियर-चंबल संभाग में हैं, जिसे ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने प्रभाव वाला इलाक़ा मानते हैं, इसके अलावा 8 सीटें मालवा-निमाड़ अंचल की हैं, जो कि जनसंघ के ज़माने से भाजपा का गढ़ रहा है, दो सीटें विंध्य इलाक़े की हैं और एक-एक सीट महाकोशल और भोपाल इलाक़े की हैं.
इन सभी 28 सीटों पर मुख्य मुक़ाबला वैसे तो भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होना है, लेकिन अपने नीतिगत फ़ैसले के तहत उपचुनाव से हमेशा दूर रहने वाली बसपा ने भी इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर मुक़ाबले के त्रिकोणीय होने का दावा किया है.
बसपा भी मैदान में
मध्य प्रदेश की राजनीति में बसपा पहली बार उपचुनाव लड़ रही है, मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाने के बसपा के दावे का आधार उसका अपना पुराना चुनावी रिकॉर्ड है.
मूलत: उत्तर प्रदेश की पार्टी मानी जाने वाली बसपा तीन दशक पहले मध्य प्रदेश में भी एक बड़ी ताक़त बन कर उभरी थी हालांकि उस समय छत्तीसगढ़ भी मध्य प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था.
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में उसने मध्य प्रदेश की दो लोकसभा सीटों पर चौंकाने वाली जीत दर्ज की थी, विंध्य इलाक़े की सतना सीट पर तो उसके एक युवा उम्मीदवार सुखलाल कुशवाहा ने मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों- कांग्रेस के अर्जुन सिंह और भाजपा के वीरेंद्र कुमार सकलेचा को हराकर जीत दर्ज की थी, अर्जुन सिंह तीसरे नंबर पर रहे थे.
उसके बाद 1998 में मध्य प्रदेश विधानसभा में भी बसपा के 11 विधायक चुन कर आए थे और उसने पूरे चुनाव में क़रीब 7 फ़ीसद वोट हासिल किए थे. बाद के चुनावों में उसका वोट प्रतिशत तो 2013 के विधानसभा चुनाव तक कमोबेश बरक़रार रहा, लेकिन विधायकों की संख्या घटती गई, हालांकि कई जगह चुनाव मैदान में उसके उम्मीदवारों की मौजूदगी भाजपा और कांग्रेस की हार-जीत को प्रभावित करती रही.
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा ने राज्य की सभी 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार खडे किए थे लेकिन सिर्फ़ दो ही जीत पाए थे, उसे प्राप्त होने वाले वोटों के प्रतिशत में भी ज़बर्दस्त गिरावट दर्ज हुई थी. उसे महज़ 0.9 फ़ीसद वोट ही हासिल हुए थे, इस क़दर छीज चुके जनाधार के बावजूद उसका दावा है कि वह इन उपचुनावों में चौंकाने वाले नतीजे देकर सत्ता की चाबी अपने पास रखेगी.
बसपा के अलावा भाजपा और कांग्रेस की संभावनाओं को प्रभावित करने के लिए 2018 में विधानसभा चुनाव के समय अस्तित्व में आई सपाक्स (सामान्य, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक कल्याण समाज) पार्टी ने भी 16 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की इस पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनाव में भी 110 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और आठ सीटों पर दूसरे अथवा तीसरे नंबर पर रहते हुए भाजपा तथा कांग्रेस के उम्मीदवारों की हार-जीत को प्रभावित किया था.
शिवसेना भी आज़मा रही क़िस्मत

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बसपा और सपाक्स पार्टी के अलावा शिव सेना ने भी भाजपा को सबक़ सिखाने की चेतावनी देते हुए मालवा-निमाड़ क्षेत्र की आठ और ग्वालियर शहर की दो सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं. मालवा-निमाड़ इलाक़ा महाराष्ट्र की सीमा को छूता है, इस इलाक़े में और ग्वालियर में मराठी भाषी मतदाताओं की ख़ासी तादाद है.
वैसे शिवसेना का मध्य प्रदेश के अधिकांश ज़िलों में संगठन तो है लेकिन चुनाव मैदान में उसकी मौजूदगी कभी भी असरकारक नहीं रही है.
शिवसेना सांसद और पार्टी की ओर से मध्य प्रदेश के प्रभारी अनिल देसाई के मुताबिक़, "जब तक हम एनडीए में थे तब तक हमने महाराष्ट्र के अलावा भाजपा के प्रभाव वाले किसी राज्य में चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन अब हम अपनी पार्टी का विस्तार करने के लिए स्वतंत्र हैं और इसीलिए राजनीतिक दृष्टि से अपने अनुकूल लगने वाली सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं."
बहरहाल, कुल मिलाकर राज्य की सभी 28 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे मुक़ाबले की स्थिति है, इन सीटों के नतीजों से न सिर्फ़ मौजूदा भाजपा सरकार का भविष्य तय होगा, बल्कि कांग्रेस से भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा होगी, जो कि भाजपा में उनके और उनके समर्थकों की आगे की राजनीति का सफ़र तय करेगी.
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