NEET परीक्षा: शोएब आफ़ताब और आकांक्षा सिंह के नंबर बराबर तो कैसे हुआ टॉपर का फ़ैसला

- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नीट परीक्षा का नतीजा आने के बाद से फ़ुर्सत ही नहीं मिल रही है. घर में लोगों का आना-जाना लगा हुआ है, इतनी इज़्ज़त मिल रही है. नींद भी दो घंटे की हो रही है. बहुत अच्छा लग रहा है, बहुत अच्छा. ये कहकर मां रूचि सिंह हँस पड़ती हैं.
मेडिकल कोर्स में दाख़िले के लिए होने वाली परीक्षा नीट 2020 में दूसरी रैंक पाने वाली आकांक्षा सिंह का परिवार फूले नहीं समा रहा है. परिवार के सभी सदस्य ख़ुश हैं कि आकांक्षा ने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मेडिकल की पढ़ाई करने का जो सपना देखा वो पूरा हो रहा है.
आकांक्षा सिंह एक न्यूरो सर्जन बनना चाहती हैं और इसी क्षेत्र में शोध करना चाहती हैं.
लेकिन परिवार इस बात से परेशान है कि आकांक्षा की फ़र्ज़ी आईडी बना कर ये शिकायत की जा रही है कि उनके साथ भेदभाव हुआ है और उनके 720 अंक आने के बावजूद उन्हें दूसरी रैंक क्यों दी गई है.
दरअसल इस साल हुई नीट की परीक्षा में ओडिशा के शोएब आफ़ताब और आकांक्षा सिंह को 720 में से 720 अंक मिले हैं, लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की टाई-ब्रेकिंग नीति के तहत कम उम्र वाले को दूसरी रैंक मिलती है. ऐसे में आकांक्षा पहली रैंक से फिसल गई.

हालांकि आकांक्षा का कहना है कि उन्हें ये भरोसा था कि उनके 700 से ऊपर अंक आएंगे लेकिन ये उम्मीद नहीं थी कि पहली या दूसरी रैंक आ जाएगी लेकिन वे इस बात पर हैरानी जताती हैं कि उनका सोशल मीडिया पर कोई अकाउंट न होने के बावजूद उनके फ़र्ज़ी अकाउंट के ज़रिए उनके साथ भेदभाव क्यों जैसी शिकायतें की जा रही हैं और ऐसे संदेश वॉट्सएप पर भेजे जा रहे हैं.
शोएब आफ़ताब के बराबर अंक मिलने के बावजूद दूसरी रैंकिग मिलने की बात पर आकांक्षा कहती हैं, "शुरुआत में बुरा लगता था लेकिन जब मैंने सोचा कि मेरा दाख़िला एम्स में हो जाएगा तो मैंने ख़ुद को मना लिया."
जब मैंने ये सवाल पिता, राजेंद्र कुमार राव से पूछा कि क्या दूसरी रैंक आने का मलाल है? तो उनका कहना था, "पहले और दूसरे रैंक से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये पॉलिसी की तहत हो रहा है कि जिसकी उम्र ज़्यादा है उसे फ़र्स्ट रैंक मिलेगा तो मुझे इससे कोई नाराज़गी या आपत्ति नहीं है लेकिन मेरी बेटी जिसका न कोई ट्विटर अकाउंट है, न सोशल मीडिया पर फिर भी उसकी फ़र्ज़ी आईडी बना कर लोग शिकायत दर्ज करा रहे हैं. वो नहीं होना चाहिए क्योंकि हमें उसकी दूसरी रैंकिंग से कोई नाराज़गी है ही नहीं. हमने स्थानीय थाने में टेलीफ़ोन से शिकायत दर्ज करा दी है."
पिता बताते हैं कि आकांक्षा पूरी लगन के साथ पढ़ाई करती रही है और हमेशा पढ़ाई में अच्छी रही है लेकिन वो घंटों-घंटों बस पढ़ती ही रहती थी, ऐसा नहीं है और वो म्यूज़िक सुनते हुए पढ़ना पसंद करती हैं.

आकांक्षा के पिता पहले वायु सेना में थे लेकिन उन्होंने कुछ साल पहले ही रिटायरमेंट लिया और उनकी मां रूचि सिंह एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं और नौंवी तक उन्होंने आकांक्षा को स्वंय ही पढ़ाया है.
मां बताती हैं, क्योंकि आकांक्षा पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और कुशीनगर में शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे संसाधनों की कमी थी तो हमने आकांक्षा को कोचिंग के लिए गोरखपुर में भेजने का फ़ैसला लिया था.
वो स्कूल में अंतिम के पीरियड मिस कर देती थी ताकि गोरखपुर में जाकर कोचिंग ले सकें. लेकिन रात में जब तक घर नहीं पहुँच जाती थी तो कलेजे में धुकधुकी-सी लगती रहती थी.
वे बताती हैं, "मैं स्कूल जाने से पहले सारा खाना तैयार करके जाती थी. फिर दोपहर में स्कूल से लौटकर आकांक्षा को गोरखपुर जाने वाली बस में बिठा देती. वहां पहुँचने पर मुझे टीचर्स उसके पहुँचने की सूचना दे देते थे. उसे पहुँचने में क़रीब दो घंटे लगते और वापस लौटते-लौटते उसे रात के 9.30 बज जाते. तब तक कलेजे में ही जान अटकी रहती थी. कई बार तो उसे बस में बैठने तक की जगह नहीं मिलती थी और खड़े होकर ही आना-जाना पड़ता था. हालांकि उसे कोचिंग में भेजने का फ़ैसला हमारा ही था. जब बस स्टैंड पर वो दिख जाती तो चैन आता था. अब कोई पूछता है कि कैसा लग रहा है, लेकिन वो समय सच में बहुत मुश्किलों भरा था. लेकिन उसने ठान लिया था कि करना है इसलिए सब अच्छा रहा."

आकांक्षा मानती हैं कि न्यूरो सर्जरी के क्षेत्र में काफ़ी स्कोप है और वो इसी क्षेत्र में शोध भी करना चाहती हैं. साथ ही वो चाहती हैं कि इस क्षेत्र में समाज के हर तबक़े के लिए इलाज संभव बना सकें.
वे अपनी सफलता की कुंजी 'हार्ड वर्क और स्मार्ट वर्क' को बताती हैं. उनके अनुसार परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को रणनीति बनाकर लगन और संयम के साथ तैयारी करनी चाहिए.
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