जब संजय गांधी की नसबंदी को लेकर डरीं इंदिरा गांधी, जेपी ने संभाला: विवेचना

इंदिरा गांधी

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

1974 आते-आते पूरे भारत का माहौल इंदिरा गांधी के इतने ख़िलाफ़ और जेपी के पक्ष में हो चला था कि उन्हें देश के उद्धारक के रूप में देखा जाने लगा था. न सिर्फ़ उनका संपूर्ण क्राँति का नारा आम जनता को आकर्षित करने लगा था बल्कि उनके दल विहीन प्रजातंत्र की अवधारणा को भी गंभीरता से लिया जाने लगा था.

कांग्रेस के हलकों से भी ये माँग उठने लगी थी कि जेपी से टकराने के बजाए उनको साथ लेकर चलने की कोशिश होनी चाहिए. लोगों के दबाव के चलते इंदिरा गाँधी अनिच्छापूर्वक जेपी से मिलने को तैयार हो गईं.

जेपी को ये बताया गया था कि ये बातचीत सिर्फ़ इंदिरा और जेपी के बीच होगी. जब 1 नवंबर, 1974 की रात जेपी इंदिरा से मिलने उनके 1 सफ़दरजंग रोड निवास पर पहुंचे तो जेपी के बैठते ही इंदिरा ने कहा जगजीवन रामजी को भी बुला लें.

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी आत्मकथा ज़िंदगी का कारवाँ में लिखते हैं कि जेपी को इससे क्या आपत्ति हो सकती थी समझौते का ड्राफ़्ट पढ़ने के बाद जगजीवन राम ने कहा.

ये कैसे हो सकता है कि विधानसभा निलंबित करने तक की बात ठीक है लेकिन इसमें विधानसभा भंग करने की बात क्यों है इसके बारे में अभी से क्यों वादा किया जाए. इंदिरा गाँधी चुप थीं. जेपी सारी बातें ख़ामोशी से सुन रहे थे. 5-10 मिनट बाद वो उठ गए.

जेपी

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इंदिरा और जेपी की मुलाकात हुई असफल

इंदर मल्होत्रा इंदिरा गांधी की जीवनी इंदिरा गांधी अ पर्सनल एंड पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' में इस मुलाकात का दूसरा विवरण देते हैं. उनके अनुसार 'इंदिरा और जेपी के बीच तीखी और कड़ुवी बहस हुई. इंदिरा ने आरोप लगाया कि उनके आंदोलन को उनके अमीर दोस्त अमरीका के कहने पर हवा दे रहे हैं. जेपी ने इसका ये कहते हुए जवाब दिया कि वो भारत को सोवियत संघ सरीखी तानाशाही की तरफ़ ले जा रही हैं.'

जेपी की सभा

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जानेमाने पत्रकार और जेपी आँदोलन में भाग लेने वाले राम बहादुर बताते हैं, ''जेपी का ज़ोर था कि बिहार विधानसभा को भंग करने की मांग उचित है. उस पर आपको विचार करना चाहिए. अंत में जब बात क़रीब-क़रीब ख़त्म हो गई थी तो इंदिरा ने सिर्फ़ एक वाक्य कहा, आप कुछ देश के बारे में भी सोचिए. ये बात जेपी के मर्म पर चोट करने वाली थी. जेपी ने कहा था, इंदु मैंने देश के अलावा और सोचा ही क्या है? इसके बाद जेपी से जो भी मिला उससे उन्होंने बताया कि इंदिरा ने उनका अपमान किया है. इसके बाद जेपी ने ये कहना भी शुरू कर दिया कि इंदिरा से अब हमारा सामना चुनाव के मैदान में होगा."

इंदिरा को दिया पत्रों का पुलिंदा

इस तीखी बहस के बाद जेपी ने इंदिरा गाँधी से एक मिनट अकेले में बात करने की इच्छा प्रकट की थी. इंदर मल्होत्रा लिखते हैं, ''जब जगजीवन राम दूसरे कमरे में चले गए तो जेपी ने इंदिरा को पीले पड़ चुके कागज़ों का एक पुलिंदा पकड़ाया. ये इंदिरा की माता कमला नेहरू द्वारा 20 और 30 के दशक में जेपी की पत्नी प्रभावती को लिखे गए पत्र थे जिन्हें प्रभावती ने बहुत सहेज कर रखा था.

इन पत्रों में कमला ने नेहरू ख़ानदान की महिलाओं द्वारा उनके साथ बुरा सलूक किए जाने का खुल कर ज़िक्र किया था. जेपी ने बताया कि पिछले वर्ष उनकी पत्नी के देहाँत के बाद उन्हें ये पत्र उनके कागज़ों में मिले थे. जेपी के इस 'जेस्चर' से इंदिरा गाँधी थोड़ी देर के लिए भावुक ज़रूर हुईं लेकिन तब तक उन दोनों के बीच इतनी खाई बढ़ चुकी थी कि वो पट नहीं सकी.

भुवनेश्वर के भाषण ने दूरी बढ़ाई

जेपी

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राम बहादुर राय कहते हैं, ''जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गाँधी का संबंध तो चाचा और भतीजी का था लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुद्दे को जेपी ने उठाना शुरू किया तो इंदिरा की एक प्रतिक्रिया से वो संबंध बिगड़ गया. उन्होंने 1 अप्रैल 1974 को भुवनेश्वर में एक बयान दिया कि जो बड़े पूंजीपतियों के पैसे पर पलते हैं, उन्हें भ्रष्टाचार पर बात करने का कोई हक़ नहीं है. इस बयान से जेपी को बहुत चोट लगी. मैंने ख़ुद देखा है कि इस बयान के बाद जेपी ने पंद्रह बीस दिनों तक कोई काम नहीं किया. खेती और अन्य स्रोतों से होने वाली अपनी आमदनी का विवरण जमा किया और प्रेस को दिया और इंदिरा गाँधी को भी भेजा."

इंदिरा गाँधी के सचिव रहे पीएन धर अपनी किताब, इंदिरा गाँधी, द इमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी में लिखते हैं, "हमारे और जेपी के बीच मध्यस्थता कर रहे गाँधी पीस फ़ाउंडेशन के सुगत दासगुप्ता ने मुझसे कहा था 'नीतिगत मामलों का उतना महत्व नहीं है. मेरी सलाह ये है कि आप जेपी को कुछ मान दीजिए.'

बकौल राधाकृष्ण और दासगुप्ता जेपी उम्मीद कर रहे थे कि प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गाँधी उनसे उसी तरह के संबंध स्थापित करेंगी जैसे नेहरू और गांधी के बीच हुआ करते थे. इंदिरा गाँधी जेपी की एक इंसान के तौर पर क़दर ज़रूर करती थीं लेकिन उनके विचारों से वो शुरू से ही सहमत नहीं थीं. उनकी नज़र में वो एक ऐसे सिद्धांतवादी थे जो अव्यावहारिक चीज़ों को अधिक महत्व देते थे. एक-दूसरे के बारे में ऐसे विचार रखने के बाद दोनों के बीच समान राजनीतिक समझ पैदा होना लगभग असंभव था. सच्चाई ये थी कि दोनों का अहम बहुत बड़ा था और नियति के पास उन दोनों के बीच टकराव होने देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."

पी एन धर आगे लिखते हैं, 'जब ये मौका आया तो जेपी ने क़ानून को अपना काम नहीं करने दिया. शायद इसकी वजह उनका इंदिरा गाँधी के मंसूबों या प्रजाताँत्रिक मूल्यों बारे में जेपी का खुद का अविश्वास रहा हो.' इंदिरा और जेपी के बीच कटुता इतनी बढ़ी कि इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी. इससे पहले जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली को संबोधित किया.

जेपी की रैली विफल करने की कोशिश

रामलीला मैदान में जय प्रकाश नारायण की रैली

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मशहूर पत्रकार कूमी कपूर अपनी किताब 'द इमरजेंसी - अ पर्सनल हिस्ट्री ' में लिखती हैं, "भीड़ को दूर रखने के लिए तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने दूरदर्शन से कहकर रविवार की फ़ीचर फ़िल्म का समय चार बजे से बदलवाकर पाँच बजे करवा दिया था. पूर्व- निर्धारित फ़िल्म 'वक़्त' के स्थान पर उन्होंने 1973 की सबसे बड़ी फ़िल्म ब्लॉकबस्टर 'बॉबी' दिखाने का फ़ैसला किया था.

एक बार फिर रामलीला मैदान के आसपास किसी बस को आने नहीं दिया गया था और लोगों को सभास्थल तक पहुंचने के लिए एक किलोमीटर तक चलना पड़ा था. जेपी और जगजीवन राम 'बॉबी' से कहीं बड़े आकर्षण सिद्ध हुए. अटल बिहारी वाजपेयी की दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य ने मुझे बताया था कि जब वो सभास्थल की तरफ़ जा रही थीं तो उन्हें कुछ दबी हुई सी आवाज़ सुनाई दी. हमने टैक्सी ड्राइवर से पूछा, 'ये किसकी आवाज़ है ?' उसका जवाब था, 'ये लोगों के क़दमों की आवाज़ है.' जब हम तिलक मार्ग पहुंचे तो वो लोगों से खचाखच भरा हुआ था. हमें वहाँ अपनी टैक्सी छोड़नी पड़ी और वहाँ से रामलीला मैदान हम पैदल गए."

जेपी की गिरफ़्तारी

25 जून, 1975 की रात डेढ़ बजे का समय गाँधी पीस फ़ाउंडेशन के सचिव राधाकृष्ण के बेटे चंद्रहर खुले में आसमान के नीचे सो रहे थे. अचानक वो अंदर आए और अपने पिता को जगा कर फुसफुसाते हुए बोले, "पुलिस यहाँ गिरफ़्तारी का वारंट ले कर आई है."

जयप्रकाश, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख और राज नारायण (बाएं से दाएं)

राधाकृष्ण बाहर आए. बात सच निकली. पुलिस ने उन्हें जेपी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी का वारंट दिखाया. राधाकृष्ण ने पुलिस वालों से कहा कि क्या आप कुछ समय इंतज़ार कर सकते हैं. जेपी बहुत देर से सोए हैं. वैसे भी उन्हें तीन-चार बजे तो उठ ही जाना है क्योंकि उन्हें सुबह तड़के ही पटना की फ़्लाइट पकड़नी है. पुलिस वाले इंतज़ार करने के लिए मान गए. राधाकृष्ण इस बीच चुपचाप नहीं बैठे. उन्होंने अपनी टेलिफ़ोन ऑपरेटर को निर्देश दिया कि वो जिस-जिस को फ़ोन लगा सकती हैं, फ़ोन कर जेपी की गिरफ़्तारी की सूचना दें.

जब उन्होंने मोरारजी देसाई को फ़ोन लगाया तो पता चला कि पुलिस उनके भी घर पहुंच चुकी है. तीन बजे पुलिस वालों ने राधाकृष्ण का दरवाज़ा फिर खटखटाया, "क्या आप जेपी को जगाएंगे? हमारे पास वायरलेस से लगातार संदेश आ रहे हैं कि जेपी पुलिस स्टेशन क्यों नहीं पहुंचे?"

चंद्रशेखर टैक्सी में पहुंचे

राधाकृष्ण दबे पाँव जेपी के कमरे में गए. वो गहरी नींद में थे. उन्होंने धीरे से जेपी को जगा कर पुलिस वालों के आने की ख़बर दी. तभी एक पुलिस अफ़सर भी अंदर घुस आया.

जेपी- चंद्रशेखर

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वो बोला, "सॉरी सर. हमें आपको अपने साथ ले जाने के आदेश हैं." जेपी ने कहा, "मुझे तैयार होने के लिए आधे घंटे का समय दीजिए." घबराए हुए राधाकृष्ण ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने की कोशिश कर रहे थे ताकि जेपी के जाने से पहले उनके एकाध जानने वाले तो वहाँ पहुंच जाएं. जब जेपी तैयार हो गए तो राधाकृष्ण बोले, "जाने से पहले एक कप चाय तो पीते जाइए."

इस तरह दस मिनट और बीते. फिर जेपी ने ही कहा, "अब देर क्यों की जाए? आइए चलते हैं." जैसे ही जेपी पुलिस की कार में बैठे, बहुत ही तेज़ रफ़्तार से आती हुई टैक्सी ने वहाँ ब्रेक लगाए. उसमें से कूद कर चंद्रशेखर उतरे. जब तक जेपी की कार चल चुकी थी.

विनाश काले विपरीत बुद्धि

राधाकृष्ण और चंद्रशेखर एक कार में उनके पीछे चले. जेपी को संसद मार्ग थाने ले जाया गया. जेपी को कुर्सी पर बैठाने के बाद पुलिस अधीक्षक दूसरे कमरे में गए. थोड़ी देर बाद बाहर निकल कर वो चंद्रशेखर को एक कोने में ले जा कर बोले, "सर दरअसल पुलिस का एक दल आपको यहाँ लाने आपके घर पर गया है." चंद्रशेखर मुस्कुरा कर बोले, "अब मैं यहाँ आ ही गया हूँ, तो आप मुझे यहीं गिरफ़्तार कर लीजिए." पुलिस वालों ने वही किया.

राधाकृष्ण ने जेपी से कहा, "क्या आप लोगों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?" जेपी ने आधे सेकंड के लिए सोचा और राधाकृष्ण की आखों में सीधे देखते हुए कहा, "विनाश काले विपरीत बुद्धि." जेपी को 1976 में पेरोल पर छोड़ा गया.

इंदिरा के दिए पैसे लौटाए

इंदिरा गांधी

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एक और घटना ने इंदिरा और जेपी के संबंधों को ख़राब किया. जेपी को जेल से छोड़े जाने के बाद गांधी पीस फ़ाउंडेशन के प्रमुख राधाकृष्ण ने लोगों और विदेश में रहने वाले भारतीयों से अपील की कि वो जेपी के लिए डायलेसिस मशीन ख़रीदने के लिए योगदान करें.

पीएन धर लिखते हैं, "राधाकृष्ण की सलाह और मेरे पूरे समर्थन से इंदिरा गाँधी ने जेपी की डायलेसिस मशीन के लिए 90000 रुपयों की एक अच्छी रक़म भिजवाई. राधाकृष्ण ने जेपी की सहमति के बाद उसकी प्राप्ति की रसीद भी भेजी. लेकिन, इंदिरा गाँधी की ये पहल जेपी कैंप के कई कट्टरवादियों को नागवार गुज़री और अंतत: उनके दबाव के कारण जेपी को वो रक़म इंदिरा गांधी को वापस लौटानी पड़ी. इस घटना ने इंदिरा और जेपी की बातचीत के विरोधियों को इसका विरोध करने का एक नया बहाना दे दिया. ये कहा गया कि अगर जेपी अपने ख़ेमे के कट्टरवादियों के विरोध का सामना नहीं कर सकते, तो दूसरे गंभीर मसलों पर उनसे किसी साहसिक क़दम की उम्मीद नहीं की जा सकती."

जनवरी 1977 में इंदिरा गाँधी ने चुनाव कराने का फ़ैसला किया. इस चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई और इंदिरा गाँधी अपनी खुद की सीट हार गईं.

बदले की राजनीति का विरोध

मार्च 1977 में जनता पार्टी की जीत के बाद सरकार बनने की क़वायद चल ही रही थी कि इंदिरा को इस बात की आशंका हो गई कि संजय गाँधी के जबरन नसबंदी कार्यक्रम से प्रभावित लोग संजय गाँधी को ज़बरदस्ती पकड़ कर तुर्कमान गेट ले जाएंगे और उनकी सार्वजनिक रूप से नसबंदी करेंगे. इंदिरा गाँधी की दोस्त पुपुल जयकर ने विदेश सचिव जगत मेहता को फ़ोन कर बताया कि इंदिरा इस बात से बहुत परेशान हैं.

जाने माने स्वतंत्रता सेनानी और बाद में योजना आयोग और दक्षिण अफ्रीका में भारत के उच्चायुक्त बने लक्ष्मीचंद जैन को जब जगत मेहता ने ये बात बताई तो वो जेपी के पास गए. लक्ष्मी चंद जैन अपनी आत्मकथा 'सिविल डिसओबिडिएंस, टू फ़्रीडम स्ट्रगल्स वन लाइफ़' में लिखते हैं, "ये बात सुन कर जेपी बहुत परेशान हो गए. उन्होंने तय किया कि वो इंदिरा गाँधी से मिलने उनके निवास स्थान पर जाएंगे और उन्हें ढाढस बधाएंगे. जेपी इंदिरा के पास गए और उन्होंने उनके साथ चाय पी."

इंदिरा से पूछा ख़र्चा कैसे चलेगा?

इंदिरा गांधी

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राम बहादुर राय बताते हैं, ''इस बैठक के बाद जेपी ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि इंदिरा गाँधी का राजनीतिक जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है. ये जनता पार्टी के नेताओं को एक संकेत था कि बदले की राजनीति न की जाए. ये अलग बात है कि उन लोगों ने जेपी की बात सुनी नहीं. जेपी ने इंदिरा से यहाँ तक पूछा कि अब जब तुम प्रधानमंत्री नहीं हो, तो तुम्हारा ख़र्चा कैसे चलेगा?''

इंदिरा ने जवाब दिया कि नेहरू की पुस्तकों की रॉयल्टी से उनका जीवन यापन हो जाएगा. जेपी ने उन्हें आशवस्त किया कि उनके साथ कोई ज़्यादती नहीं होगी और इस बारे में उन्होंने मोरारजी देसाई और चरण सिंह से अपील भी की."

पटना में आख़िरी मुलाक़ात

कुछ ही दिनों में जेपी का जनता पार्टी से भी मोह भंग हो गया. वो पटना में बीमार पड़े थे और जनता पार्टी के नेताओं ने उनकी कोई सुध नहीं ली. कुलदीप नैयर बताते हैं कि जब उन्होंने मोरारजी को सलाह दी कि वो जेपी को देखने पटना जाएं, तो उन्होंने तुनक कर कहा, "मैं गाँधी से मिलने कभी नहीं गया तो ये जेपी क्या चीज़ हैं."

इंदिरा गाँधी ने इसके ठीक उल्टा किया. बेलची से लौटते समय वो पटना में रुकीं और जेपी से मिलने गईं. इस मुलाकात के बाद जेपी ने इंदिरा को आशीर्वाद देते हुए कहा था, 'तुम्हारा भविष्य तुम्हारे भूत से ज़्यादा चमकदार होगा.'

जेपी को नज़दीक से जानने वाले रज़ी अहमद का कहना है कि 'जेपी की ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में दोनों के रिश्ते फिर ठीक हो गए.' हालांकि, राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि इंदिरा गाँधी की जेपी से मुलाक़ात उनकी राजनीति का हिस्सा थी और उसमें वो पूरी तरह से सफल भी हुईं.

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