बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: सीबीआई आख़िर कहां चूक गई?

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 1992 में 6 दिसंबर के दिन बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने जो दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की थीं, वहीं से अदालत में अभियोजन पक्ष का केस कमज़ोर होता चला गया.

एक ही घटना की दो प्राथमिकी में जो समय दर्ज किया गया उसी का उल्लेख सीबीआई की विशेष अदालत के जज सुरेन्द्र कुमार यादव ने अपने फ़ैसले में किया है. दोनों ही प्राथमिकियों में घटना के बारे में जो कहा गया है वो एक-दूसरे से मेल नहीं खाते.

पहली प्राथमिकी में घटना का समय 12 बजे दोपहर बताया गया है जबकि दूसरी प्राथमिकी में 10 बजे. पहली प्राथमिकी में लालकृष्ण आडवाणी का नाम दर्ज किया गया जबकि दूसरी प्राथमिकी में भी कुछ नेताओं का नाम दर्ज हुआ. लेकिन जिरह के वक़्त पुलिस के अधिकारी अदालत के सामने ये नहीं बता पाए कि दूसरी प्राथमिकी दर्ज क्यों की गई.

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पहले सीआईडी फिर सीबीआई जांच

शुरू में इस मामले की जाँच राम जन्मभूमि थाने में शुरू हुई. फिर जाँच राज्य की 'क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट' यानी 'सीआईडी' करने लगी और आख़िरकार ये मामला सीबीआई के सुपुर्द किया गया.

जिनको अभियुक्त बनाया गया उनके ख़िलाफ़ धारा 147 (दंगा भड़काना), धारा 153 -ए (धार्मिक नफ़रत पैदा करना), धारा 153-बी (राष्ट्रीय एकता को नुक़सान पहुँचाना, धारा 295 (धार्मिक स्थल को नुक़सान पहुँचाना, धारा 295-ए (जान बूझ कर धार्मिक भावनाओं को भड़काना), धारा 505 (भड़काऊ भाषण देना), धारा 149 (ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से जमावड़ा लगाना) और धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र रचना) के तहत क़ानूनी कार्यवाही शुरू हुई.

ख़ुद सीबीआई की विशेष अदालत के जज ने अपने फ़ैसले में सीबीआई की जाँच और अभियोजन पर सवाल उठाये हैं जिसकी वजह से इस मामले में अभियुक्त बनाए गए 49 में से सभी जीवित 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है.

अदालत ने अपने फ़ैसले में ये भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने जो सुबूत पेश किये उनसे 'साज़िश करने के आरोपों का सत्यापन' नहीं होता है.

जाँच पूरी होने के बाद सीबीआई ने लगभग 350 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया और कई सौ दस्तावेज़ भी बतौर सुबूत पेश किये. इनमें अख़बारों में घटना से सम्बंधित ख़बरें, वीडियो और ऑडियो टेप भी शामिल हैं.

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जो सुबूत अदालत में पेश किए गए

तो सवाल उठता है कि सीबीआई ने जो सुबूत अदालत में पेश किये उनमे क्या ख़ामियाँ थीं.

अपने फ़ैसले में सीबीआई अदालत के विशेष जज ने कहा है कि अभियोजन पक्ष ने पत्रिकाओं और समाचार पत्रों की जो रिपोर्टें 'षड्यंत्र रचने' के सुबूत के तौर पर पेश की थीं वो टाइप की हुई थीं जिनमें न दिन की चर्चा थी और ना ही किसने रिपोर्ट लिखी थी, ये ही बताया गया था. इसके अलावा जिन तस्वीरों के सहारे अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के ख़िलाफ़ ठोस मामला बनाना चाहता था उन तस्वीरों की 'नेगेटिव' भी अदालत के समक्ष पेश नहीं की गयी थी.

उस ज़माने में पत्रकार जिन कैमरों से तस्वीरें खींचते थे उनमे 'नेगेटिव' रोल हुआ करता था जिसे बाद में 'डेवेलप' किया जाता था. इसलिए अदालत ने इन्हें सुबूत के तौर पर मानने से इनकार कर दिया.

अदालत ने ये भी पाया कि जो वीडियो और ऑडियो सुबूत के तौर पर अभियोजन पक्ष ने पेश किया उसका सत्यापन भी नहीं कराया गया था इसलिए उन्हें भी सुबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया. दूसरी बात ये थी कि जिन वीडियो कैसेट्स को अदालत में पेश किया गया था वो सीलबंद नहीं थे और बाद में जब उन्हें देखने की कोशिश की गयी तो कुछ साफ़ नहीं दिख रहा था. ये भी अभियोजन पक्ष की बड़ी चूक थी.

सीबीआई के संयुक्त निदेशक रहे एनके सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जब भी कोई सुबूत अदालत में पेश किया जाता है तो उसके सत्यापन का 'सर्टिफ़िकेट' भी संलग्न किया जाता है ताकि पता चले कि ये सुबूत असली हैं और इनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है.

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गवाह अदालत के सामने

लेकिन, इसके अलावा भी जो गवाह अदालत के सामने अभियोजन पक्ष ने हाज़िर किये उनकी बातों को बचाव पक्ष ने ध्वस्त कर दिया. फ़ैसले में कहा गया कि अयोध्या के रहने वाले किसी व्यक्ति ने अदालत के सामने ये नहीं बताया कि उसने अभियुक्तों को भावनाएं भड़काते हुए देखा है.

फ़ैसले में अयोध्या की तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अंजू गुप्ता के बयान का हवाला दिया गया जिसमें उन्होंने कहा कि कुछ डकैत और असामाजिक तत्व मौजूद थे. इन सबके बावजूद सिंह मानते हैं कि दोष सिर्फ़ सीबीआई पर मढ़ना ठीक नहीं है क्योंकि पहली बात तो यही है कि ये मामला काफ़ी लंबा चला. कितने अधिकारी आये और सेवानिवृत भी हो गए.

उनका कहना था अदालत ने भी बहुत सारे पहलुओं को अनदेखा किया है जिनके आधार पर अभियुक्तों के ख़िलाफ़ सुबूत साफ़ नज़र आते हैं.

वो कहते हैं, "इसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका - दोनों के काम करने के तरीक़ों पर प्रश्नचिन्ह ज़रूर लगता है. पूरे मामले में षडयंत्र भी साफ़ दिखता है और संलिप्तता भी. इसलिए सीबीआई को चाहिए कि अदालत के इस फ़ैसले को उच्च न्यायलय में चुनौती दे."

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अदालत का फ़ैसला

सिंह कहते हैं कि 28 सालों में सरकारें आयीं और गयीं. उनका कहना था, "सीबीआई की छवि जो बनी वो पिंजरे में बंद तोते की बनी. सरकारें अपने हिसाब से इसका इस्तेमाल करती रहीं. जब जो सरकार जिस तरह चाहती गयी उसी तरह सीबीआई के जाँच अधिकारी और उनके अभियोजन अधिकारी काम करते गए."

लेकिन अदालत ने अपने फ़ैसले में जो टिप्पणियाँ की हैं वो भी बहुत गंभीरता से लेने वाली हैं क्योंकि अदालत ने कहा कि 6 दिसंबर, 1992 को एकत्रित हुए बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे किसी की धार्मिक भावना आहत होती हो. अदालत ने ये भी कहा कि बाबरी मस्जिद का ढांचा असामाजिक तत्वों ने गिराया था जबकि वहां मौजूद नेता उन्हें ऐसा करने से रोक रहे थे.

इस पर जाने माने वकील राजीव धवन से जब बीबीसी ने बात की तो उनका कहना था, "अदालत का फ़ैसला अपने आप में हैरान करने वाला है क्योंकि षडयंत्र सिर्फ़ 6 दिसम्बर 1992 को नहीं हुआ था. ये उससे पहले कई सालों से चल रहा था. दो-दो रथ यात्राएं निकाली गई थीं. विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के नेता मंदिर तोड़ने की बात घूम-घूम कर कर रहे थे."

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सीबीआई का अभियोजन पक्ष

वो कहते हैं कि सीबीआई के जाँचकर्ता अदालत के सामने ये सुबूत कैसे नहीं दे पाए, ये ज़रूर ध्यान देने वाली बात है. वो ये भी कहते हैं कि वीडियो हो या तस्वीरें या अख़बारों की रिपोर्ट, ये अदालत का काम है कि उनका सत्यापन हो.

धवन इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि वाले मामले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील रह चुके हैं.

वो कहते हैं कि सीबीआई का अभियोजन पक्ष तो एक ओर है ही, इस मामले में सीबीआई की अदालत ने भी अपनी ज़िम्मेदारी को ढंकने का काम किया है क्योंकि आदेश आने से पहले और आने के बाद भी कई नेता गर्व से कहते हुए दिखे कि उन्होंने बाबरी मस्जिद को तोड़ा है.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा

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हैदराबाद स्थित नलसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का मानना है कि एक धार्मिक स्थल को गिराने के लिए लोग जमा हुए. नेता जमा हुए लेकिन इसके लिए कोई भी दोषी नहीं पाया गया.

वो कहते हैं, "जिन्होंने तोड़ा उनकी तस्वीरें छपीं, जो गुम्बद पर चढ़े उनकी तस्वीरें छपीं लेकिन सीबीआई किसी को न पकड़ पायी और किसी के ख़िलाफ़ सुबूत भी नहीं जुटा पाई."

उनका कहना है कि सीबीआई को सरकार के नियंत्रण यानी राजनीतिक नियंत्रण और हस्तक्षेप से बाहर निकालने की ज़रुरत है. वो मानते हैं कि भारत की 'क्रिमिनल जस्टिस' की प्रणाली तब तक नहीं सुधर सकती जब तक जाँच और अभियोजन को अलग न किया जाए.

वहीं राजीव धवन का कहना है कि अभी तक ये भी नहीं पता कि निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई बड़ी अदालत में जाएगी या नहीं क्योंकि एजेंसी की ओर से इसको लेकर कोई बयान नहीं आया है.

सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि इस बात का फ़ैसला मुख्यालय और उनका विधि विभाग क़ानूनी राय और मशविरे के बाद ही तय करेगा कि मामले की अपील की जानी चाहिए या नहीं.

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