बिहार चुनाव: नीतीश कुमार के समीकरण या तेजस्वी का वोट बैंक, कौन जाति होगी किसके पाले में?

    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"बिहार का समाज जो एक पिछड़ा समाज था, उसे अपने सशक्तिकरण का एक ही रास्ता दिखा कि जो ताक़तवर है, जो सत्ता में है, उसके साथ कैसे रिश्ता बनाया जाए और उस रिश्ते को बनाने के लिए जाति एक ज़रिया बनी. नब्बे के दशक में ये और मज़बूत हुई."

बिहार चुनाव में जाति के दख़ल को राजनीतिक वैज्ञानिक आशीष रंजन कुछ इस तरह देखते हैं.

अब जबकि चुनाव की तारीख़ों का ऐलान हो चुका है, वहाँ जाति की भूमिका पर फिर बहस होगी. मगर इसकी चर्चा से पहले ज़रूरी है तारीख़ के कुछ पन्ने पलटना.

बिहार वो राज्य है जहां आज़ादी से पहले जनेऊ आंदोलन हुआ. यादवों और कुछ अन्य ग़ैर-ब्राह्मण पिछड़ी जातियों ने जनेऊ पहनना शुरू किया.

ये वो बिहार भी है, जहां जेपी आंदोलन के वक़्त संपूर्ण क्रांति के लिए हज़ारों लोगों ने पटना के गांधी मैदान में जनेऊ तोड़े.

इसी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे बिहार के दो बड़े नेताओं ने वहाँ सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन में भूमिका निभाई.

बिहार में राजनीतिक परिवर्तन के साथ सामाजिक परिवर्तन होता रहा, या यूं कहें कि सामाजिक परिवर्तन के साथ राजनीतिक बदलाव होता रहा. इन बदलावों की सबसे बड़ी कुंजी थी- जाति.

बिहार की राजनीति में जाति कितनी अहम?

कभी सवर्णों के वर्चस्व वाली बिहार की राजनीति में अब पिछड़ों का दबदबा है. चाहे सरकार कोई भी बनाए, अहम भूमिका पिछड़ा वर्ग निभाता है.

एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइज़ेशन) के अनुमान के मुताबिक़, बिहार की आधी जनसंख्या ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) है. राज्य में दलित और मुसलमान भी बड़े समुदाय हैं.

लेकिन इन सब वर्गों के अंदर कई वर्ग बने और बनाए भी गए जो अलग-अलग तरह से वोट करते हैं. पार्टियों के लिए इन वर्गों के वोट बांधना आसान नहीं होता.

वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ तिवारी कहते हैं कि जाति हमेशा से बिहार चुनावों में एक फ़ैक्टर रहा है.

अमरनाथ के अनुसार, "बिहार में बिना जाति की बात किए न तो प्रोफ़ेशनल राजनीति पर बात हो सकती है और न ही सामाजिक राजनीति पर. कहने का मतलब ये है कि अगर किसी विभाग में कोई नियुक्ति भी होती है तो भी जाति का ध्यान रखा जाता है."

2015 बनाम 2020 विधानसभा चुनाव

साल 2015 में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने मिलकर चुनाव लड़ा था. साथ में कांग्रेस पार्टी भी थी.

राजद के पारंपरिक वोटर यादव और जेडीयू के 'लव-कुश' यानी कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा एक जगह आए. बाकी पिछड़े वर्ग के वोट नहीं बंटे. मुसलमान वोटर भी एक तरफ़ रहा.

राजद को सबसे ज़्यादा 80 सीटें मिलीं. जदयू को 71 और कांग्रेस को 27.

इस गठबंधन को तक़रीबन 42 फ़ीसदी वोट मिले. वहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 53 सीटों पर रही और वोट प्रतिशत 24.4% रहा. एनडीए का वोट प्रतिशत कुल मिलाकर 29-30 फ़ीसदी के आस-पास रहा.

बिहार में 15 फ़ीसदी यादव हैं लेकिन फिर भी पिछले विधानसभा चुनाव में कुल 61 यादव उम्मीदवार जीते थे.

बिहार में कोइरी जाति के 8 फ़ीसदी लोग हैं लेकिन 19 विधायक बने. कुर्मी हैं 4 फ़ीसदी लेकिन 16 विधायक बने.

वहीं, बिहार में 16 फ़ीसदी मुसलमान हैं और उन्होंने 24 सीटें जीतीं. मुसहर बिहार में पाँच फ़ीसदी हैं लेकिन एक ही सीट जीत पाए.

जातीय समीकरणों के हिसाब से किसका पलड़ा भारी?

वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ तिवारी कहते हैं कि बिहार में इस वक़्त राजनीति त्रिकोणीय है जिसमें बीजेपी, जेडीयू और राजद मुख्य भूमिका में हैं. जब-जब इनमें से दो पार्टियों ने हाथ मिलाया है, वे सत्ता में आई हैं.

इस हिसाब से उन्हें इस वक़्त एनडीए का पलड़ा भारी लगता है.

सीएसडीएस के संजय कुमार कहते हैं कि अभी बहुत स्पष्ट रूप से जाति समीकरण एनडीए की तरफ़ है.

राजद अभी भी मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के साथ गठबंधन की कोशिशों में लगी है ताकि मल्लाह और कुशवाहा वोट अपने पाले में कर सके.

कांग्रेस को लेकर अमरनाथ को लगता है कि पार्टी के पास अब बिहार में सवर्ण भी नहीं रहा. वो कहते हैं, "जहां राजद को लगता है कि उनकी पार्टी का उम्मीदवार जीतने की स्थिति में नहीं है, वहां वे कांग्रेस को सीट दे देते हैं."

वहीं, संजय कुमार कहते हैं, "कांग्रेस की एक 'रेनबो पोज़िशन' अब भी बनी हुई है, सभी जातियों का कुछ ना कुछ वोट उन्हें ज़रूर मिलता है. हालांकि वोट प्रतिशत बहुत कम हो गया है. फ़ायदा बस ये होता है कि राजद और कांग्रेस जब एक हो जाते हैं तो मुसलमानों का वोट एक जगह हो जाता है. कांग्रेस की वजह से कुछ सवर्णों का वोट भी आरजेडी की तरफ़ आने की गुंजाइश रहती है. अलग-अलग जातियों का छिटका हुआ वोट कांग्रेस के पास जमा हो जाता है."

लोक जनशक्ति पार्टी अगर एनडीए के साथ न रहे तो?

अमरनाथ तिवारी कहते हैं "लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) एनडीए से बाहर नहीं जाएगी क्योंकि ये उसकी राजनीतिक ज़रूरत है. अभी जो जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी में असहमतियां नज़र आ रही हैं, ये एक नूरा कुश्ती है. वो भी बस इसलिए ताकि बीजेपी नीतीश कुमार से ज़्यादा सीटें अपने लिए ले पाए और फिर चुनाव के बाद नतीजों के हिसाब से बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए बेहतर स्थिति में होगी."

अगर 2015 विधानसभा चुनाव की बात करें तो एलजेपी जिन 42 सीटों पर लड़ी उनमें से सिर्फ़ दो ही सीटें जीत पाई थी- लालगंज और गोविंदगंज. पार्टी अध्यक्ष राम विलास पासवान के अपने रिश्तेदार भी चुनाव हार गए थे.

2005 से ही एलजेपी का रिपोर्ट कार्ड ख़राब होता रहा है. 2005 में पार्टी ने अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था जिसमें 178 सीटों पर लड़कर 29 सीटों पर जीत हासिल की थी. वोट प्रतिशत रहा 12 फ़ीसदी के क़रीब. लेकिन छह महीने बाद दोबारा हुए चुनाव में 203 में से वे 10 सीटें ही जीत पाए. उसके बाद 2010 में एलजेपी ने राजद के साथ चुनाव लड़ा और 75 में से तीन सीटें जीतीं. वोट प्रतिशत 6.74 फ़ीसदी पर आ गिरा. 2015 में वोट प्रतिशत 4.83 पर आ गया.

जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा भी 2015 में सिर्फ़ एक ही सीट पर जीत पाई थी लेकिन इसके एनडीए में शामिल होने की वजह से ऐसा हो सकता है कि एलजेपी के हिस्से कम सीटें आएं.

कैसे बदल गई बिहार की सवर्ण राजनीति?

बिहार की जातिगत राजनीति ने पहिया घूमते देखा है. आज़ादी के बाद बिहार में कांग्रेस के श्रीकृष्ण सिंह (भूमिहार) के मुख्यमंत्री बनने के बाद भूमिहार और राजपूतों में सत्ता संघर्ष शुरू हुआ.

1980 के दशक के आख़िर तक ब्राह्मणों का वर्चस्व कांग्रेस में रहा और उसके बाद भूमिहारों ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ना शुरू कर दिया.

राम मनोहर लोहिया के स्लोगन 'पिछड़ा मांगे सौ में साठ' से बिहार की सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत हुई. साथ ही जेपी के आंदोलन ने भी 'जाति छोड़ो, जनेऊ तोड़ो' के नारे के साथ एक अहम भूमिका निभाई.

राजपूत तो पहले ही कांग्रेस से छिटकने लगे थे और जब 1970 के दशक में जनता पार्टी आई तो राजपूतों का एक बड़ा वर्ग उसके साथ चला गया.

राजनीति वैज्ञानिक आशीष रंजन कहते हैं कि 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के साथ जनता पार्टी के राजपूत नेता भी आए. रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदानंद सिंह जैसे लोग. तो लंबे वक़्त तक राजपूत समेत पिछड़ों की राजनीति लालू ने की.

"लेकिन इस ओबीसी के अंदर एक और समुदाय था जो अति पिछड़ी जातियों का था. उनकी आबादी तक़रीबन 22 फ़ीसदी थी लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक फ़ीसदी था. लालू के राज में सामाजिक सशक्तिकरण तो हुआ लेकिन पिछड़े वर्ग के अंदर राजनीतिक सशक्तिकरण नहीं हुआ."

इसके बाद साल 1994 में नीतीश कुमार जातिवाद को वजह बताकर जनता पार्टी से अलग हुए और जॉर्ज फ़र्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई. ये पार्टी 2003 में जनता दल यूनाइटेड में मिल गई थी.

नीतीश कुमार - बिहार के सोशल इंजीनियर

मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 15 साल से कुर्सी पर बने हुए हैं. उन्हें बिहार का सोशल इंजीनियर भी कहा जाता है.

अपनी पहली सरकार में ही उन्होंने दलित श्रेणी से महादलित अलग कर नई श्रेणी बनाई. ओबीसी यानी पिछड़े वर्ग से ईबीसी यानी अति पिछड़े वर्ग को निकाला और ये लिस्ट लंबी होती गई.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने ब्राह्मणों में एक उप-जाति गिरी को ओबीसी लिस्ट में डाला. बिहार में तकरीबन 25 लाख गिरी हैं जो मुख्य रूप से छपरा, मोतिहारी और सिवान में रहते हैं. हालांकि कुछ और राज्यों में भी गिरी ओबीसी लिस्ट में डाले गए हैं.

मुसलमानों में एक जाति कुलहैया को अति पिछड़ी जाति में डाला था. अररिया, पूर्णिया, किशनगंज में 20 लाख के क़रीब कुलहैया हैं. राजबंशी को भी अति पिछड़े वर्ग में डाला गया.

लालू प्रसाद यादव के साथ रविदास जाति हुआ करती थी लेकिन नीतीश कुमार ने उन्हें महादलित वर्ग में डाला और इस तरह कई छोटी-छोटी जातियां जेडीयू के पाले में जाती रहीं.

आशीष कहते हैं कि पिछले 15 साल से बिहार की राजनीति में जो नीतीश और बीजेपी का वर्चस्व है वो 'न्यू कास्ट अलाइनमेंट' की वजह से है. पिछड़े वर्ग के अंदर जो ईबीसी था, दलितों के अंदर जो महादलित थे और साथ में बीजेपी का सवर्ण वोट. इस गणित से ये गठजोड़ इतना मज़बूत हो रहा था कि लालू प्रसाद सत्ता से बाहर ही रहे.

क्या बिहार में जाति फैक्टर पिछले कुछ सालों में बदला है?

आशीष कहते है, "पिछले कुछ वक्त में बदलाव आए हैं. 90 के दशक से लेकर अब तक एक पीढ़ी जवान हो चुकी है. इससे तीन बदलाव हुए- उनकी शैक्षणिक योग्यता पुरानी पीढ़ी की तुलना में ज़्यादा है. पलायन बहुत बढ़ा है और इससे एक शहरीकरण की भावना भी आती है जिससे जाति की उपस्थिति थोड़ी कम हो जाती है. लोगों का ध्यान विकास की तरफ़ हो जाता है."

अमरनाथ कहते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार के इतने वर्षों तक सत्ता में रहने के चलते उनके ख़िलाफ़ एक सत्ता विरोधी भावना बनी है.

"लेकिन अगर आप लोगों से दूसरा सवाल करें कि नीतीश को नहीं देंगे तो क्या तेजस्वी को वोट देंगे तो उनका कहना है कि राजद को भी नहीं देना चाहते."

वो कहते हैं कि नीतीश के ख़िलाफ़ एक सेंटीमेंट है, बीजेपी ने अगस्त में एक अंदरूणी सर्वे भी करवाया है जिसमें ये बात सामने आई है लेकिन महाराष्ट्र और राजस्थान के बाद गठबंधन को लेकर बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती, शायद चुनाव के बाद कुछ हो.

यही बात आशीष रंजन भी कहते हैं कि नीतीश कुमार पहली बार सत्ता विरोधी लहर देख रहे हैं.

"चुनाव में लोग दो मक़सद से वोट करते हैं. एक ये कि मुझे फ़लां नेता, फलां पार्टी की सरकार चाहिए. दूसरा ये कि अब चाहे जो भी हो हमको इन्हें हटाना है. बिहार में जब-जब सत्ता परिवर्तन हुआ, उसमें नेगेटिव वोटिंग का असर रहा है. पिछले 15 साल की हम बात करें तो पॉज़िटिव वोट सिर्फ़ 2010 में हुआ है. इसका मतलब है कि सभी जातियों के लोगों ने किसी एक पार्टी को वोट किया."

वो कहते हैं, "लेकिन पिछले तीन-चार सालों से नीतीश कुमार की छवि को झटका लगा है. सृजन घोटाला, मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड और अब कोरोना के इंतज़ामों को लेकर. तो जातिगत समीकरण जो भी कहें, इस बार नीतीश कुमार को परेशानी ज़रूर होगी."

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