चीन पर राजनाथ के बयान के बाद कांग्रेस का आरोप, प्रधानमंत्री ने देश को किया गुमराह

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि अभी की स्थिति के अनुसार चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी और अंदरूनी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सैनिक टुकड़ियां और गोलाबारूद तैनात किया हुआ है.

रक्षा मंत्री ने भारत-चीन गतिरोध को लेकर संसद में बयान देते हुए कहा,"पूर्वी लद्दाख और गोगरा, कोंगका ला और पैंगोग लेक का उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर कई गतिरोध वाले इलाक़े हैं.एलएसी में चीन ने अंदरूनी इलाक़ों में बड़ी संख्या में सेना और हथियार तैनात किया हुआ है. हमारी सेना इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करेंगी. "

उन्होंने ये भी बताया कि चीन की कार्रवाई के जवाब में हमारी सेनाओं ने भी इन क्षेत्रों में उपयुक्त जवाबी तैनाती की है ताकि भारत के सुरक्षा हित पूरी तरह सुरक्षित रहें.

रक्षा मंत्री ने कहा,"एलएसी पर तनाव बढ़ता देख दोनों तरफ के सैन्य कमांडरों ने 6 जून 2020 को मीटिंग की. इस बात पर सहमति बनी कि जवाबी कार्रवाई के द्वारा डिसइन्गेजमेंट किया जाए. दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हुए कि एलएसी को स्वीकार किया जाए जाएगा तथा कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिससे यथास्थिति बदले."

"इस सहमति का उल्लंघन कर चीन द्वारा एक हिंसक संघर्ष की स्थिति 15 जून को गलवान में पैदा की गई. हमारे बहादुर सिपाहियों ने अपनी जान का बलिदान दिया पर साथ ही चीनी पक्ष को भी भारी क्षति पहुचाई और अपनी सीमा की सुरक्षा में कामयाब रहे."

कांग्रेस ने रक्षा मंत्री के भाषण पर प्रतिक्रिया करते हुए कुछ सवाल किए हैं.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक ट्वीट कर पूछा - "रक्षामंत्री के बयान से साफ़ है कि मोदी जी ने देश को चीनी अतिक्रमण पर गुमराह किया. हमारा देश हमेशा से भारतीय सेना के साथ खड़ा था, है और रहेगा.लेकिन मोदी जी,आप कब चीन के ख़िलाफ़ खड़े होंगे? चीन से हमारे देश की ज़मीन कब वापस लेंगे? चीन का नाम लेने से डरो मत."

पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी एक ट्वीट में कहा,"देश सेना के साथ एकजुट है. पर ये बताएँ- चीन ने हमारी सरज़मीं पर क़ब्ज़े का दुस्साहस कैसे किया? मोदीजी ने चीन द्वारा हमारे क्षेत्र में घुसपैठ न करने बारे गुमराह क्यों किया? चीन को हमारी सरज़मीं से वापस कब ख़देड़ेंगे? चीन को लाल आँख कब दिखाएँगे?"

राजनाथ सिंह ने संसद में एलएसी पर अप्रैल से लेकर अभी तक की स्थिति की जानकारी दी. उनके बयान की मुख्य बातेंः

अप्रैल और मई में क्या हुआ

अप्रैल माह से पूर्वी लद्दाख की सीमा पर चीन की सेनाओं की संख्या तथा उनके हथियारों में वृद्धि देखी गई.

मई के प्रारंभ में चीन ने गलवान घाटी क्षेत्र में हमारी सेना के सामान्य, पारंपरिक गश्त के पैटर्न में व्यवधान शुरू किया जिसके कारण तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई.

हमने चीन को राजनयिक और सैन्य माध्यमों से यह अवगत करा दिया कि इस प्रकार की गतिविधियां, यथास्थिति को एकतरफा बदलने का प्रयास है. यह भी साफ कर दिया गया कि ये प्रयास हमें किसी भी सूरत में मंज़ूर नहीं है.

जून में क्या हुआ

एलएसी पर तनाव बढ़ता हुआ देख कर दोनों तरफ के सैन्य कमांडरों ने 6 जून 2020 को मीटिंग की. इस बात पर सहमति बनी कि संयुक्त तरीक़े से डिसइंगेजमेंट किया जाए. दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हुए कि एलएसी को माना जाएगा तथा कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिससे यथास्थिति बदले.

इस सहमति का उल्लंघन करते हुए चीन द्वारा एक हिंसक गतिरोध की स्थिति 15 जून को गलवान में पैदा की गई. हमारे बहादुर सिपाहियों ने अपनी जान का बलिदान दिया पर साथ ही चीनी पक्ष को भी भारी क्षति पहुंचाई और अपनी सीमा की सुरक्षा में कामयाब रहे.

इस पूरी अवधि के दौरान हमारे बहादुर जवानों ने, जहां संयम की जरूरत थी वहां संयम रखा तथा जहां शौर्य की जरुरत थी, वहां शौर्य प्रदर्शित किया. मैं सदन से यह अनुरोध करता हूँ कि हमारे दिलेरों की वीरता एवं बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा करने में मेरा साथ दें.

अगस्त में क्या हुआ

हम मौजूदा स्थिति का बातचीत के ज़रिए समाधान चाहते हैं. हमने चीनी पक्ष के साथ राजनयिक और सैन्य संपर्क बनाए रखा है. इन चर्चा में तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत हमारे दृष्टिकोण को तय करते हैं.

पहला, दोनों पक्षों को एलएसी का सम्मान और कड़ाई से पालन करना चाहिए. दूसरा, किसी भी पक्ष को अपनी तरफ से यथास्थिति का उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए. तीसरा, दोनों पक्षों के बीच सभी समझौतों का पूर्णतया पालन होना चाहिए.

जब ये चर्चाएं चल ही रही थीं, चीन की तरफ से 29 और 30 अगस्त की रात को उकसाऊ सैनिक कार्रवाई की गई, जो पैंगोग लेक के दक्षिणी इलाक़े में यथास्थिति को बदलने का प्रयास था. लेकिन एक बार फिर हमारी सेना की समय रहते और मजबूत कार्रवाई के कारण उनके ये प्रयास सफल नहीं हुए.

एक ओर किसी को भी हमारी सीमा की सुरक्षा के प्रति हमारे दृढ़ निश्चय के बारे में संदेह नहीं होना चाहिए, वहीं भारत यह भी मानता है कि पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों के लिए आपसी सम्मान और आपसी संवेदनशीलता आवश्यक हैं.

मॉस्को में चीनी मंत्री से हुई मुलाक़ात

हालाँकि, राजनाथ सिंह ने साफ तौर पर कहा कि सीमा पर तनाव का द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ेगा. भारत सरकार ने चीन से तनाव के बाद कई चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था.

उन्होंने बताया कि चीन और भारत ने माना है कि सीमा पर शांति बहाल रखी जाएगी. सीमा विवाद एक जटिल मुद्दा है और शांतिपूर्ण बातचीत से ही समाधान निकलेगा.

राजनाथ सिंह ने कहा, ''सदन को आश्वस्त रहना चाहिए कि हमारी सेनाएं इस चुनौती का सफलता से सामना करेंगी और इसके लिए हमें उन पर गर्व है. अभी जो स्थिति बनी हुई है उसमें संवेदनशील परिचालन मुद्दे शामिल हैं. इसलिए मैं इस बारे में ज़्यादा ब्यौरा का खुलासा नहीं करना चाहूंगा.''

''भारत सीमावर्ती इलाक़ों में मौजूदा मुद्दों का हल, शांतिपूर्ण बातचीत और के ज़रिए किए जाने को लेकर प्रतिबद्ध है. इस उद्देश्य को पाने के लिए मैं अपने चीनी समकक्ष से चार सितंबर को मॉस्को में मिला और उनसे हमारी गहरी चर्चा हुई.''

चार महीने से तनाव

भारत और चीन के बीच लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास पिछले चार महीने से टकराव की स्थिति बनी हुई है.

इस गतिरोध के समाधान के लिए राजनाथ सिंह ने चार सितंबर को में मॉस्को में चीन के रक्षा मंत्री वेई फ़ेंगे के साथ मुलाक़ात की थी.

दोनों देशों के बीच सीमा पर मौजूदा तनाव के मद्देनज़र राजनाथ सिंह ने चीनी नेता से कहा था कि सीमा पर स्थिति को सामान्य रखने के लिए भारतीय सैनिकों का रवैया ज़िम्मेदारी भरा रहा है.

साथ ही राजनाथ सिंह ने यह भी कहा था कि अपनी संप्रभुता और सीमा की रक्षा के लिए हमारी प्रतिबद्धता पर भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.

इसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर की चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात हुई थी.

जयशंकर और वांग यी के बीच हुई बैठक में गतिरोध को खत्म करने के लिए पांच सूत्रीय योजना पर सहमति बनी थी.

लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी और इसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. इसके बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है लेकिन तनाव अब भी कायम है.

इसके बाद भारत ने कहा कि चीन ने 29 और 30 अगस्त की रात को पैंगॉन्ग लेक के साउथ बैंक क्षेत्र में भड़काऊ सैन्य हरकत करते हुए यथास्थिति को तोड़ने की कोशिश की जिसे नाकाम कर दिया गया.

हालांकि, चीन ने एलएसी पार करने की ख़बरों का खंडन किया था और भारत पर भी एलएसी पार करने का आरोप लगाया था.

भारत और चीन के बीच 3,500 किलोमीटर लंबी सरहद है और दोनों देश सीमा की वर्तमान स्थिति पर सहमत नहीं हैं. इसे लेकर दोनों देशों में 1962 में जंग भी हो चुकी है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)