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भारत-चीन तनाव: बातचीत भी, झड़प भी, दोनों कैसे
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत-चीन सीमा पर हालात सामान्य करने के लिए बातचीत चल ही रही थी कि अब वहां दोबारा तनाव बढ़ने की ख़बर आई है. दरअसल भारत ने सोमवार को आरोप लगाया कि चीन के सैनिकों ने पूर्वी लद्दाख में सीमा पर बनी सहमति का उल्लंघन किया है.
भारतीय सेना के मुताबिक़ 29-30 अगस्त की रात झड़प हुई है. सेना ने कहा कि चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने सीमा पर यथास्थिति बदलने की कोशिश की लेकिन सतर्क भारतीय सैनिकों ने ऐसा नहीं होने दिया.
पीआईबी की ओर से जारी भारतीय सेना के बयान के अनुसार, ''भारतीय सैनिकों ने पैंगोंग त्सो लेक में चीनी सैनिकों के उकसाऊ क़दम को रोक दिया है. भारतीय सेना संवाद के ज़रिए शांति बहाल करने का पक्षधर है लेकिन इसके साथ ही अपने इलाक़े की अखंडता की सुरक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है. पूरे विवाद पर ब्रिगेड कमांडर स्तर पर बैठक जारी है."
हालांकि चीन ने अपने सैनिकों के एलएसी को पार करने की ख़बरों का खंडन किया है.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, पीएलए की वेस्टर्न थिएटर कमांड ने कहा है कि भारत ने 31 अगस्त को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से एलएसी को पार किया जिसका चीन विरोध करता है.
ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़ चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि चीन की सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा का सख़्ती से पालन करती है और चीन की सेना ने कभी भी इस रेखा को पार नहीं किया है. दोनों देशों की सेना इस मुद्दे पर संपर्क में हैं.
वहीं रॉयटर्स के अनुसार, चीनी सेना ने कहा है कि अगर भारत चाहता है कि तनाव ना बढ़ तो वो भारत-चीन सीमा से अपने सैनिकों को वापस बुलाए.
बातचीत और झड़प - दोनों एक साथ कैसे?
अभी दो महीने पहले 15-16 जून को लद्दाख की गलवान घाटी में एलएसी पर हुई इस झड़प में भारतीय सेना के एक कर्नल समेत 20 सैनिकों की मौत हुई थी. भारत का दावा है कि चीनी सैनिकों का भी नुक़सान हुआ है लेकिन इसके बारे में चीन की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, ना चीन ने अपनी सेना को किसी भी तरह का कोई नुक़सान होने की बात मानी है.
उसके बाद तनाव कम करने को लेकर दोनों देशों के बीच कई राउंड की सैन्य स्तर की बातचीत हो गई है.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर बातचीत चल ही रही थी तो फिर इस तरह की आपसी संघर्ष की खबरें कैसे आ रही है? आख़िर दोनों ही बातें एक साथ कैसे संभव हैं?
क्या इस एक कदम से बातचीत की प्रक्रिया में बाधा नहीं आएगी?
भारतीय सैन्य विश्लेषक कहते हैं कि चीन जो बोलता है और जो ज़मीन पर करता है उसमें बहुत ज़्यादा फ़र्क है. उनके मुताबिक़, चीन के बयानों पर नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसकी हरकतों को देखना चाहिए.
सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख रहे लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा कहते हैं, "उन्होंने अपनी सीमा कभी डिस्क्राइब की ही नहीं है. वो कहते हैं हमने एलएसी पार नहीं की, लेकिन उन्होंने कभी बताया ही नहीं कि हमारा एलएसी यहां तक है. अभी वो पैंगोंग त्सो लेक की उत्तर दिशा में फिंगर फोर में बैठे हुए हैं. इसपर उनके राजदूत कहते हैं कि ये तो हमारी सीमा है. उन्होंने ये बयान दिया है कि जहां हम नॉर्थ साइड में फिंगर फोर पर बैठे हैं वो हमारी सीमा है. उनका कहना कि उन्होंने सीमा पार नहीं की है, लेकिन उनका सीमा का आइडिया और भारत का सीमा का आइडिया एक जैसा नहीं है."
हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि चीन ने सीमा पार करने की बात से तो इनकार किया है, लेकिन झड़प को लेकर कुछ नहीं कहा है.
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि भारत जिस झड़प की बात कर रहा है, उसके साथ-साथ पहले से बातचीत भी चल रही है. तो बातचीत और सीमा पर संघर्ष दोनों साथ-साथ कैसे हो रहा है? इसके मायने क्या हैं और आख़िर चल क्या रहा है?
क्या हैं मायने?
लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा कहते हैं कि इसका मतलब ये है कि चीन बातचीत को लेकर गंभीर नहीं है.
वो कहते हैं, इसका ये मतलब है कि चीनी जो बोल रहे हैं कि हमें शांति चाहिए और सीमाओं के मसले को शांति से हल करना चाहिए, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम से साफ़ है कि उसकी बात और उसकी हरकतों में बहुत ज़्यादा फ़र्क दिख रहा है.
हाल में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर भारी सेना तैनात की है, जो समझ से परे है.
लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) संजय कुलकर्णी कहते हैं कि दरअसल चीन भारत को आज़माने की कोशिश कर रहा है, 'लेकिन भारत भी पूरी तरह से तैयार है.'
उनके मुताबिक़, चीन भारत पर दबाव डालने की कोशिश कर रहा है कि भारत उसकी बात मान जाए. लेकिन भारत नहीं मानेगा, क्योंकि भारत कहता है कि चीन को अप्रैल 2020 की स्थिति में वापस लौटना होगा.
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 'हिन्दुस्तान टाइम्स' से ख़ास बातचीत में कहा भी था कि "भारत-चीन को अगर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति चाहिए, तो पिछले समझौतों का पालन करना होगा."
उन्होंने कहा था कि "मैं मानता हूँ कि एलएसी को लेकर धारणाओं में कुछ अंतर हैं, लेकिन फिर वही बात आती है कि दोनों में से कोई एक देश, एकतरफ़ा ढंग से यथास्थिति को बदलने का प्रयास नहीं कर सकता और यह इन समझौतों के कारण है. लेकिन स्वाभाविक रूप से, अगर शांति को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी तो ऐसे मुद्दे उठेंगे."
भारत के पास अब क्या विकल्प हैं?
भारत-चीन के बीच इस वक़्त रिश्ते बेहद नाज़ुक दौर में हैं. दोनों देशों के बीच 1962 में एक बार पहले भी जंग हो चुकी है, जिसमें चीन की जीत हुई थी. इसके बाद 1965 और 1975 में भी दोनों देशों के बीच हिंसक झड़पें हुई थी. इस साल जून में सीमा पर जो कुछ हुआ वो चौथा मौका था जब भारत-चीन सीमा पर स्थिति इतनी तनावपूर्ण रही हो.
ऐसे में लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) संजय कुलकर्णी कहते हैं कि भारत के पास विकल्प यही है कि वो सतर्क रहे.
संजय कुलकर्णी कहते हैं, "दोनों देशों को बातचीत करते रहना होगा लेकिन सतर्क रहना बहुत ज़रूरी है. ये साफ़ दर्शाता है कि चीन की कथनी और करनी में अंतर है, इसलिए भारत को सतर्क रहना बहुत ज़रूरी है. वो ईंट का जवाब पत्थर से दे और चीन की मंशा को पूरी ना होने दे."
वो कहते हैं कि सीमा पर चीन का जमावड़ा है, जिसके मद्देनज़र भारत की भी पूरी तैयारी है और 'अगर चीन कुछ ग़लत हरक़त करता है तो भारत भी जवाब देगा.'
इससे पहले बीते सोमवार को ही भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ जनरल बिपिन रावत कह चुके हैं कि चीन के ख़िलाफ़ भारत के पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं.
उन्होंने 24 अगस्त को समाचार एजेंसी एएनआई से कहा था, "लद्दाख में चीनी सेना के अतिक्रमण से निपटने के लिए सैन्य विकल्प भी है लेकिन यह तभी अपनाया जाएगा जब सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर वार्ता विफल रहेगी."
लेकिन डीएस हुड्डा कहते हैं, "अब भारत को अपनी रणनीति सोचनी चाहिए कि क्या करें और विचार करना चाहिए कि जो बातचीत हो रही है उसका कुछ हल निकल रहा है या नहीं. भारत ने जो चीनी ऐप और एफ़डीआई बैन की है उसका कुछ असर हुआ या नहीं. अगर असर नहीं हुआ तो भारत अपनी रणनीति पर फिर से विचार करें."
वहीं संजय कुलकर्णी का मानना है कि इन झड़पों को रोकने के लिए या इन झड़पों को ना होने देने के लिए भारत की तैयारी पूरी होनी चाहिए फिर झड़पे नहीं होंगी.
हालांकि वो कहते हैं कि ये तनाव तब तक चलता रहेगा, जब तक कि चीन अप्रैल 2020 की स्थिति में नहीं लौटता.
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