चीन के ख़िलाफ़ अमरीका से दोस्ती क्या भारत को भारी पड़ेगी?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इन दिनों एक तरफ़ भारत और अमरीका में नज़दीकियाँ बढ़ रही और दूसरी तरफ़ भारत और चीन में दूरियाँ भी तमाम अख़बारों में सुर्खियाँ बटोर रही हैं.

दो दिन पहले भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक निजी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि आज की तारीख में नॉन एलाइनमेंट (गुटनिरपेक्षता) एक पुराना कॉन्सेप्ट हो चुका है, लेकिन भारत किसी के अलायंस का हिस्सा नहीं होगा. 

उनके इस बयान के मतलब निकाले ही जा रहे थे कि दूसरे ही दिन अमरीका के विदेश मंत्री का बयान आया कि अमरीका चीन को अलग-थलग करने के लिए एक अलग गठबंधन बनाना चाहता है. 

विश्व स्तर पर देशों के संबंधों पर नज़र रखने वाले अभी इन बयानों को पढ़ ही रहे थे कि चीन ने भी भारत को लगे हाथ सुझाव दे दिया. चीन भारत से कह रहा है कि वो अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर क़ायम रहे. 

भारत, अमरीका और चीन के तीनों बयानों के केंद्र में एक ही बात है - और वो है भारत की विदेश नीति. देश में मोदी सरकार के आने के बाद हाल के दिनों में ना सिर्फ़ चीन के साथ तनाव बढ़ें है, बल्कि नेपाल बांग्लादेश जैसे मित्र देश भी रह-रह कर आँख भी दिखाने लगे हैं.

गुटनिरपेक्षता की नीति

लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं कि दो देशों में दुश्मनी हुई और दो दुश्मन साथ आ गए हों. ये सिर्फ़ गुटनिरपेक्षता की पद्धति से पीछे हटना भर है या फिर ये समय की माँग है. 

भारत के पूर्व राजनयिक और फ़ेलो, आब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन राकेश सूद कहते हैं कि तीनों देशों के रिश्तों को बदलते हुए वैश्विक परिवेश में देखने की ज़रूरत है. 

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि विदेश नीति ऐसी चीज़ नहीं, जो सदियों से एक ही ढर्रे पर चलती रहे. ऐसी नीतियों का मक़सद भारत के विकास और सुरक्षा में योगदान देने के लिए बनाई जाती है. और तभी ऐसी नीतियों की अहमियत भी बनी रहती है. हालात बदलने के साथ ही लाज़मी है कि ऐसी नीतियाँ भी बदलेगी. जो बात नहीं बदलेगी वो है इनको बनाने की पीछे का मक़सद. 

साठ से अस्सी के दशक में गुटनिरपेक्षता का एक लेबल भारत की विदेश नीति पर लगा, जिसे भारत ने उस वक़्त आज़माया. लेकिन आज की परिस्थितियों में इसकी ज़रूरत नहीं हैं. इसकी ज़रूरत तब होती है जब विश्व स्तर पर बाइपोलर स्थिति हों यानी दो अलग-अलग ध्रुव हों. जैसा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ के शीत युद्ध के समय था. 

ठीक यही बात विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने 20 जुलाई के साक्षात्कार में कही. भारत के विदेश मंत्री के मुताबिक़ दुनिया अब 'मल्टीपोलर' ( बहुध्रुवीय ) होती जा रही हैं, जिसमें दो बड़े ताक़तवर देश भी शामिल हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडी में एसोसिएट प्रोफेसर हैप्पीमॉन जैकब थोड़ी अलग राय रखते हैं.

उनके मुताबिक भारत और अमरीका के बीच इधर कुछ महीनों में नज़दिकियाँ ज्यादा बढ़ी हैं. वो मानते हैं कि इसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ज़माने में न्यूक्लियर डील के समय से हुई और आज दोनों देशों के बीच रिश्ते ऐतिहासिक ऊँचाई पर हैं. 

प्रोफेसर हैप्पीमॉन मानते हैं कि भारत सरकार की तरफ़ से पिछले कुछ सालों में गुट निरपेक्षता की नीति को लेकर पुनर्विचार हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है. अब भारत सरकार ये मानने लगी है कि भारत को एक पक्ष विशेष का साथ देने में कोई परेशानी नहीं है. 

प्रोफेसर हैप्पीमॉन की बातों को बल इस बात से मिलता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 और 2019 में NAM की सालाना बैठक में हिस्सा नहीं लिया. जबकि भारत इस गुट के संस्थापक सदस्यों में से एक रहा है.

आज की तारीख़ में दुनिया में सोवियत संघ बचा नहीं, अमरीका अकेला बच गया है. इसलिए राकेश कहते हैं कि जब गुट ही नहीं रहा तो निरपेक्षता कैसी?

चीन उभरता सुपरपॉवर

तो क्या चीन दूसरा सुपरपॉवर बनने की राह में नहीं हैं? क्या आने वाले दिनों में विश्व में अमरीका के सामने दूसरे ताक़तवर देश के तौर पर खड़ा नहीं होगा चीन? 

इस सवाल के जवाब में राकेश सूद कहते हैं, "विश्व में अभी दोबारा से वैसी स्थिति नहीं है. जब अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चल रहा था तो दोनों देशों समान रूप से ताक़तवर थे. दोनों की सैन्य शक्तियाँ मुक़ाबले में ठहरतीं थी. लेकिन चीन और अमरीका में फ़िलहाल कोई मुक़ाबला नहीं है - चाहे वो सैन्य शक्ति के आधार पर हो या फिर अर्थव्यव्यवस्था के आधार पर."

फ़िलहाल अमरीका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, कोरोना कई मुद्दों पर तक़रार चल रही है लेकिन शीत युद्ध वाली स्थिति नहीं आई है. 

अमरीका का डिफेंस बजट चीन के मुक़ाबले चार गुना अधिक है. अमरीका विश्व की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था और चीन दूसरे नंबर की. परमाणु शक्ति के मामले में भी अमरीका चीन से आगे है. इन सभी लिहाज से देखें, तो अमरीका के साथ चीन की किसी भी तरह के शीत युद्ध मोल लेने की हैसियत नहीं है. 

इसके उलट अमरीका और चीन के व्यापारिक रिश्ते पिछले कुछ महीनों तक बहुत अच्छे ही रहे हैं. अमरीका का चीन सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर रहा है. 

दूसरी तरफ़ भारत और चीन के बीच तनावपूर्ण रिश्ते पिछले कुछ महीनों के सीमा विवाद की वजह से ज्यादा तल्ख़ हुए हैं. लेकिन क्या ये भी बदलती विदेश नीति का परिणाम है? 

इस पर प्रोफेसर हैप्पीमॉन मानते हैं कि चीन भारत सीमा पर पिछले महीने जो कुछ हुआ उसकी एक वजह भारत-अमरीका का ज्यादा नज़दीक आना भी था. वो कहते हैं कि चीन चाहता था कि ऐसा कुछ करके भारत को वो सावधान करेगा. लेकिन उसका दाँव उलटा पड़ गया और भारत-अमरीका और क़रीब आ गए.

ईरान पर 'नई विदेश नीति' का असर

पिछले सप्ताह भारत और ईरान के बीच के रिश्तों में गर्माहट कम होने की चर्चा ख़ूब रहीं.

भारत की ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह विकसित करने को लेकर एक समझौता 2016 में हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बना, और अब ख़बरें आई कि ईरान चीन की मदद से इस प्रोजेक्ट को पूरा करने जा रहा है. 

इस पूरे घटना क्रम को भारत और ईरान के दोस्ती के बीच एक दीवार की तरह देखा जा रहा है. कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे अमरीका की पाबंदियों को बताया जा रहा है तो कई जगह भारत पर अमरीका के बढ़ते दबदबे के तौर पर पेश किया गया.

कई खबरों में इसे चीन के लिए एक मौक़ा भी बताया गया. लेकिन राकेश सूद इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. उनके मुताबिक़ इस पूरे घटनाक्रम के लिए भारत ख़ुद जिम्मेदार है. अगर आप किसी के साथ अपने किए वादे को पूरा नहीं करेंगे, तो उसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. इस प्रोजेक्ट के लिए भारत ने अपना किया हुआ वादा नहीं निभाया. इसलिए हर बात में चीन को दोष देना सही नहीं है. 

रही बात ईरान चीन की दोस्ती की, इस पर राकेश कहते हैं कि ईरान जब अमरीका जैसे ताक़तवर देश के दवाब में नहीं झुका, तो चीन की गोद में जा कर बैठने की बात तो बहुत दूर की है.

इसके लिए ईरान की संसद में बहस भी जारी है, चीन को ईरान ज़्यादा तवज्जो क्यों दे रहा है. राकेश कहते हैं कि ईरान और चीन का साथ कुछ मजबूरियों की वजह से भी है मसलन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका के प्रस्ताव के विरोध में चीन ही ईरान की मदद कर पाएगा, भारत नहीं क्योंकि चीन वहाँ का स्थायी सदस्य है.

रूस के साथ दोस्ती और एशिया में असर

प्रोफेसर हैप्पीमॉन कहते हैं कि भारत ने अब थर्ड वर्ल्ड देशों के साथ दोस्ती कम ज़रूर की है लेकिन वो नहीं मानते कि भारत रूस के साथ अपनी दोस्ती को तवज्जों नहीं दे रहा.

उनके मुताबिक़ आज भी भारत, रूस से ही सबसे ज़्यादा सैन्य सामान ख़रीदता है. भारत और चीन के बीच तनाव की स्थिति में कहा जाता है कि रूस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ना सिर्फ़ डोकलाम के समय में बल्कि गलवान घाटी में भी. तनाव के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का रूस जाना इस बात की ओर इशारा करता है.

वो साथ ही ये भी जोड़ते हैं कि पिछले कुछ सालों में रूस के स्टैंड में थोड़ा बदलाव आया है. रूस अपने सैन्य साजो सामान के लिए नए बाज़ार तलाश रहा है. इसलिए पाकिस्तान, चीन और ईरान से रूस दोस्ती बढ़ा रहा है.

दूसरी बात ये है कि रूस, अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान और चीन के साथ शामिल है, जो अमरीका को नागवार गुज़रा है. ऐसे में अगर भारत अमरीका के साथ खड़ा दिखता है तो भारत दूसरे कैम्प का साथी नज़र आने लगता है.

वो कहते हैं कि आज की तारीख़ में अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर रूस, पाकिस्तान, चीन और ईरान एक कैम्प में नज़र आ रहे हैं और दूसरी तरफ़ अमरीका भारत और दूसरे यूरोपीय देश एक साथ नज़र आ रहे हैं. 

प्रोफेसर हैप्पीमॉन के मुताबिक़ भारत के लिए यही सबसे बड़ी चिंता की बात है. अमरीका भारत दोस्ती की वजह से भारत और रूस की दोस्ती में भी आने वाले दिनों में दरार आ सकती है. और इसका असर एशिया के बाक़ी देशों के साथ भारत के संबंध पर भी पड़ेगा. 

उनका कहना है कि एशिया में ज़्यादातर देश चीन के प्रभुत्व को स्वीकार करते हैं, क्योंकि चीन एक एशियाई देश है, जबकि अमरीका यहाँ अपनी पकड़ भारत के ज़रिए मज़बूत करना चाहता है. इसलिए डर है कि नई विदेश नीति में भारत अमरीका से दोस्ती बनाए रखने के चक्कर में दक्षिण एशियाई दोस्त भी खो बैठे. 

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