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पीएफ़ का ब्याज़ किस्तों पर, अदालत जाएंगे श्रमिक संगठन
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्मचारियों के भविष्य निधि संगठन के सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ (सीबीटी) ने बुधवार को निर्णय लिया कि वित्तीय वर्ष 2019-2020 में जमा हुई राशि के ब्याज़ का भुगतान दो किस्तों में किया जाएगा.
पहली किस्त में 8. 5 प्रतिशत का भुगतान होगा, जबकि अगली किस्त में 0.35 प्रतिशत का भुगतान इसी साल के दिसंबर महीने तक कर दिया जाएगा.
ये निर्णय संगठन के ट्रस्टियों के बोर्ड ने लिया है जिनमें श्रम मंत्रालय के अलावा कर्मचारियों के संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं.
संगठनों का कहना है कि सरकार का निर्णय कर्मचारियों के विरोध के बावजूद लिया गया एक ग़लत निर्णय है.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की कर्मचारी यूनियन यानी सेंटर फ़ॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के वरिष्ठ सदस्य ज्ञान शंकर मजूमदार ने बीबीसी से कहा कि पहले ही भविष्य निधि की जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज़ को 10.50 से घटाकर 8.75 कर दिया गया और ऊपर से क़िस्तों में ब्याज़ का भुगतान, दोहरी मार की तरह है.
श्रमिक संगठनों का विरोध
उनका कहना है कि ईपीएफ़ओ का 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़' एक स्वतंत्र हिस्सा है जिसमें तीनों पक्ष के प्रतिनिधि यानी नौकरी करने वालों के प्रतिनिधियों के अलावा सरकार और नौकरी देने वालों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं. इसके अध्यक्ष ख़ुद केंद्रीय श्रम मंत्री हैं.
मजूमदार का कहना था कि 'एक वो भी दौर था जब कर्मचारियों को उनकी जमा की गई भविष्य निधि की रक़म पर 15 प्रतिशत तक ब्याज़ मिलता था.'
उन्होंने बताया कि "जब पी चिदंबरम केंद्रीय मंत्री हुए तो ब्याज़ की दर 5 प्रतिशत तक आ गई थी."
उनका कहना है कि भविष्य निधि की जमा रक़म का इस्तेमाल, सरकार विकास कार्यों के लिए करती है. मगर इस रक़म का निवेश 'एक्सचेंज़ ट्रेडेड फ़ंड' में करना ठीक निर्णय नहीं था.
सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार इस फ़ंड में निवेश की गई रक़म को बाज़ार में बेचना भी चाहती थी, मगर ऐसा नहीं हो सका. वैसे भी निवेश की गई रक़म से जो रिटर्न मिले हैं वो 'नेगेटिव' ही हैं, जबकि लाभ होने का अनुमान लगाया गया था.
पहले रिटर्न -8 प्रतिशत के ऊपर था, जो लुढ़ककर -23 प्रतिशत से भी नीचे चला गया.
श्रम मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि कोरोना काल में हुए 'लॉकडाउन' के दौरान लगभग 8 लाख 20 हज़ार कर्मचारियों ने अपनी भविष्य निधि की जमा राशि से 3,000 करोड़ रूपये तक निकाले हैं.
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इसका मतलब ये हुआ कि महामारी की वजह से नौकरीपेशा लोग भी बड़े पैमाने पर आर्थिक तंगी से गुज़र रहे हैं.
भविष्यनिधि की रक़म निकालने वालों में वो लोग भी शामिल हैं जिनकी नौकरियाँ चली गई हैं.
श्रमिक संगठनों का कहना है कि भविष्यनिधि की रक़म कर्मचारी अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जमा करता है. अब इस रक़म पर ही असुरक्षा की भावना पैदा हो गयी है.
कांग्रेस से लेकर वामपंथी और दक्षिणपंथी श्रमिक संगठनों ने किस्तों पर ब्याज़ दिये जाने के फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने का मन बनाया है.
भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस यानी इंटक के सचिव राजीव अरोड़ा कहते हैं कि जिस दिन किस्तों में ब्याज के भुगतान का निर्णय लिया गया, उसी दिन श्रमिक संगठनों ने भी सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया था.
सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज के अध्यक्ष, केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने तमाम विरोध के बावजूद इस निर्णय का समर्थन किया जिसे लेकर श्रमिक संगठन नाराज़ हैं.
उनका कहना था कि सभी संगठन आपस में साथ आकर क़ानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं.
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