कोरोना संकट: नौकरी जाने की सबसे बुरी मार झेल रहे हैं युवा

    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मई की शुरुआत में शालिका मदान को उनके दफ़्तर से एक कॉल आया और उनसे कहा गया कि उन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है. शालिका दिल्ली के एक लॉ फ़र्म में काम करती थीं.

38 साल की शालिका सिंगल मदर हैं. उनका एक बेटा है. उन्होंने इस कंपनी को अपनी ज़िंदगी के दो साल से भी ज़्यादा का समय दिया लेकिन कोरोना की वजह से लगाए गए लॉकडाउन ने उनकी ज़िंदगी और नौकरी दोनों पर लगाम दी.

शालिका कहती हैं, "मैंने नौकरी से नहीं निकाले जाने को लेकर उनसे गुहार लगाई. मैंने उनसे कहा कि मैं बिना सैलरी के भी काम कर लूंगी लेकिन मुझे नौकरी से ना निकालें. लेकिन मेरे बॉस ने कहा कि उनका धंधा और पैसा सब ख़त्म हो चुका है. वो मेरी हालत समझते हैं लेकिन वो असहाय हैं."

शालिका के पास एक दशक से अधिक का अनुभव है. सिर्फ़ शालिका ही नहीं महामारी की वजह से लाखों भारतीयों की नौकरी चली गई है.

सेंटर फ़ॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आकड़ों के मुताबिक़, लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोग अपने काम से हाथ गंवा चुके हैं. अधिकतर लोग असंगठित और ग्रामीण क्षेत्र से हैं.

भारत की चालीस करोड़ नौकरियों में से अधिकांश असंगठित क्षेत्रों में ही हैं.

सीएमआईई के मुताबिक़, लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के महीने में ऐसे सात करोड़ लोगों ने जिन्होंने अपना काम-धंधा गंवाया था, वो वापस काम पर लौट चुके हैं.

दोबारा आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने और फ़सल की अच्छी पैदावर की वजह से ऐसा हो पाया है क्योंकि इससे ना सिर्फ़ बड़े पैमाने पर लोगों को काम मिला है बल्कि कृषि क्षेत्र में भी लोगों को अतिरिक्त काम मिला है.

राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली जॉब गारंटी योजना ने भी इसमें मदद की है लेकिन यह ख़ुशख़बरी यहीं तक सीमित है.

सीएमआईई के आकलन के मुताबिक़, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां लॉकडाउन के दौरान खोई हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के क़रीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ महामारी की वजह से गंवाई हैं. 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है.

सीएमआईई के मैनेजिंग डायरेक्टर महेश व्यास का कहना है, "ज़्यादातर 30 साल से कम उम्र वाले प्रभावित हुए हैं. कंपनियाँ अनुभवी लोगों को रख रही हैं और नौजवानों पर इसकी मार पड़ रही है."

कई लोग मानते हैं कि यह भारत की धीमी होती अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू है.

महेश व्यास बताते हैं, "ट्रेनी और प्रोबेशन पर काम करने वाले अपनी नौकरियाँ गंवा चुके हैं. कंपनियाँ कैंपस में जाकर नौकरियां नहीं दे रही हैं. किसी भी तरह की कोई नियुक्ति नहीं हो रही है. जब 2021 में काम की तलाश करने वाले युवाओं का अगला बैच ग्रेजुएट होगा तो वो बेरोज़गारों की फ़ौज में शामिल होंगे."

नए ग्रेजुएट हुए लोगों को नौकरी नहीं देने का मतलब होगा आमदनी, शिक्षा और बचत पर विपरित प्रभाव पड़ना.

महेश व्यास कहते हैं, "इससे नौकरी की तलाश करने वालों, उनके परिवार, अर्थव्यवस्था सब पर असर होगा."

सैलरी में कटौती और मांग में सुस्ती आने से घरेलू आय पर भी नकारात्मक असर होगा.

पिछले साल के सीएमआईई के सर्वे में पाया गया था कि क़रीब 35 प्रतिशत लोग मानते थे कि उनकी आय पिछले साल की तुलना में बेहतर हुई है जबकि इस साल सिर्फ़ दो फ़ीसद लोगों का ऐसा मानना है.

निम्न वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोगों की आमदनी में कटौती हुई है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, वेतनभोगी लोगों ने लॉकडाउन के चार महीनों में क़रीब चार अरब डॉलर अपने ज़रूरी बचत से निकाला ताकि वो नौकरी जाने और सैलरी में हुई कटौती की भारपाई कर सकें.

महेश व्यास कहते हैं, "आय में आई कमी की ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग पर मार पड़ी है."

नौकरी नहीं रहने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के हाथ से काम-धंधा छीन रहा है. लेकिन यह कोई अचानक से आयी तब्दीली नहीं है.

अर्थशास्त्री विनोज अब्राहम की ओर से 2017 में किए गए अध्ययन में यह बात साफ़ तौर पर सामने आयी थी कि 2013-14 और 2015-16 के बीच रोज़गार में आज़ादी के बाद संभवत: पहली बार इतनी भारी गिरावट आई है. यह अध्ययन श्रम ब्यूरो से इकट्ठा किए गए डेटा को आधार बनाकर किया गया था.

श्रम भागीदारी से अर्थव्यवस्था में सक्रिय कार्यबल का पता चलता है. सीएमआईई के मुताबिक़, यह श्रम भागीदारी 2016 में लागू की गई नोटबंदी के बाद 46 फ़ीसद से घटकर 35 फ़ीसद तक पहुँच गई थी. इसने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया. वर्तमान में मौजूदा 8 फ़ीसद की बेरोज़गारी दर इस बदतर स्थिति की हक़ीक़त बयां नहीं करती है.

महेश व्यास कहते हैं, "ऐसा तब होता है जब नौकरी की तलाश करना बेकार हो जाता है क्योंकि नौकरी रहती ही नहीं है."

शालिका मदान इससे सहमत दिखती हैं. वो बताती हैं "दो दर्जन कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन दिए. यहां तक कि अपनी बचत और मां के पेंशन भी ख़र्च कर डाले लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली."

वो कहती हैं, "मैंने नौकरी खोजना ही अब बंद कर दिया है."

आर्थिक असुरक्षा भारत में काफ़ी बढ़ चुकी है.

शोधकर्ता मैरिएन बर्ट्रेंड, कौशिक कृष्णन और हीथर स्कॉफिल्ड ने इस पर अध्ययन किया है कि भारतीय, लॉकडाउन की चुनौतियों से कैसे निपट रहे हैं.

उन्होंने अपने अध्ययन में पाया है कि सिर्फ़ 66 फ़ीसद घरों के पास आर्थिक संकट का सामना करने के लिए दूसरे हफ़ते से ज़्यादा का संसाधन मौजूद है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी कह चुकी हैं कि सरकार नौकरी जाने की बात से इनकार नहीं करती है.

पिछले वित्त वर्ष के मासिक औसत की तुलना में जून में नई नौकरियों की संख्या में भी 60 फ़ीसद की गिरावट आई है.

पिछले हफ़्ते निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा "भारत एक दैवीय घटना जैसी असमान्य स्थिति से गुज़र रहा है...इस दौरान हम अर्थव्यवस्था में संकुचन देख सकते हैं."

भारत में कोविड-19 के मामले 35 लाख के क़रीब होने जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है. अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रही है. असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ रही है.

लॉकडाउन के दौरान जिन लोगों के काम छूट गए थे और जो अपने गांव लौट चुके थे, वो अब लॉकडाउन की पाबंदियाँ हटने के साथ ही अपने काम की जगहों पर लौटना शुरू कर चुके हैं.

इनमें से कुछ को ज़्यादा पैसे भी दिए जा रहे हैं क्योंकि उनको काम पर रखने वाले जल्दी से जल्दी अपना व्यवसाय फिर से शुरू करना चाहते हैं.

लेबर इकोनॉमिस्ट केआर श्याम सुंदर का कहना है, "इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था खुलने के साथ ही बहुत सारे लोग अपने काम पर लौट आएंगे लेकिन वेतन पर काम करने वाले लोगों को समय लगेगा."

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