अनसूया साराभाईः जो मज़दूरों के हक़ के लिए परिवार के ख़िलाफ़ गईं

- Author, अनघा पाठक
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी मराठी
अनसूया साराभाई को गुजरात में श्रम आंदोलन की शुरुआत करने वाली पहली महिला के तौर पर जाना जाता है.
साल 1885 में गुजरात के अहमदाबाद में के एक संभ्रांत परिवार में अनसूया का जन्म हुआ.
बेहद कम उम्र में उनके माता-पिता का देहांत हो गया था जिसके बाद उनके चाचा ने उन्हें पाला.
उस दौर की परंपरा के अनुसार, कम उम्र में उनकी शादी हो गई. जब अनसूया तेरह साल की थीं, तभी उनका विवाह हो गया था लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक चली नहीं.
वो जल्दी ही अपने घर लौट आईं. इसके बाद उनके भाई अम्बालाल ने उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आगे की पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया.
अनसूया अपने भाई के बहुत क़रीब थीं. लेकिन उस वक्त उन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि उनके साथ आगे जीवन में जो होगा, उससे उनके परिवार के साथ उनके संबंधों पर तनाव पड़ेगा.

ये भी पढ़ें-
- अन्ना चांडी: भारत में हाईकोर्ट की जज बनने वालीं पहली महिला
- इंदरजीत कौर: भारत-पाकिस्तान विभाजन में सहारा बनने वाली महिला
- मुसलमान लड़कियों की ज़िंदगी बदलने वालीं रुक़ैया सख़ावत
- रखमाबाई राउत: बचपन में हुई शादी के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाली लड़की
- देवदासी प्रथा का अंत करने वाली डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी
- चंद्रप्रभा सैकियानी: असम से पर्दा प्रथा हटाने में अहम भूमिका निभाने वाली महिला

अनसूया के जीवन पर उनके लंदन प्रवास का गहरा असर पड़ा. अनसूया समाजवाद की फेबियन फिलोसॉफी से बेहद प्रभावित थीं. उस दौर में ब्रिटेन में फेबियन सोसाइटी नाम का एक समूह हुआ करता था जो गणतांत्रिक समाजवाद की बात करता था.
अनसूया चुनावों में महिलाओं के मतदान करने के हक की मांग करने वाले ब्रितानी महिला अधिकार आंदोलन में शामिल हो गईं. इस तरह के आंदोलन और चर्चाओं में शामिल होने का असर बाद में उनके जीवन पर पड़ा.
अनसूया की भांजी गीता साराभाई ने उनके जीवन के बारे में लिखा है. वो बताती हैं कि इंग्लैंड प्रवास ने खुले विचारों वाली अनसूया को गंभीर चिंतक के रूप में गढ़ा. वो वहां अकेले सड़कों पर घूमती थीं, बर्नार्ड शॉ के भाषण सुनतीं, सिडनी और बीट्रिस वेब जैसे समाजवादी विचारकों की बात सुनतीं. उन्होंने बॉलरूम डांस भी सीखा और धूम्रपान भी करने लगी थीं.
लेकिन बाद में अनसूया ने एक अलग जीवनशैली अपना ली और महात्मा गांधी की अनुयायी बन गईं.

भारत लौटकर शुरू किया मज़दूरों के लिए काम
एक पारिवारिक समस्या के कारण अनसूया को भारत लौटना पड़ा. इसके बाद से उन्होंने कई तरह के सामाजिक कार्यक्रमों की शुरुआत की.
उनके ये कार्यक्रम कालिको मिल के परिसर में रहने वाली महिला श्रमिकों और उनके बच्चों के लिए थे. कालिको मिल उनके परिवार का ही कारखाना था.
उन्होंने इन दौरान 'स्त्रियो अणे तेम्ना राजकिय अधुसारो' (महिलाएं और उनके राजनीतिक अधिकार) शीर्षक से एक पैम्फ़लेट भी लिखा.
एक घटना ने उनकी ज़िंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया. इस घटना के बारे में उन्होंने खुद कहा है, "एक दिन सवेरे मैंने 15 मज़दूरों को देखा जो ऐसे चल रहे थे जैसे कि उनके शरीर में जान ही न बची हो. जब मैंने उनसे पूछा कि उनके साथ क्या हुआ तो उन्होंने बताया कि बहन हम अभी बिना ब्रेक के 36 घंटों की शिफ्ट पर काम कर के लौट रहे हैं. हम लगातार दो दिन एक रात काम कर रहे थे."
मज़दूरों की इस दुर्दशा का अनसूया पर बड़ा गंभीर प्रभाव पड़ा. उन्होंने कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मज़दूरों को एकत्र करने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने का फ़ैसला किया.
जैसे-जैसे वो मज़दूरों के काम करने और रहने की हालत, उनके काम करने के घंटों, ग़रीबी और उत्पीड़न के बारे में अधिक जानने लगीं उनके लिए लड़ने का उनका संकल्प और दृढ़ होता गया.

परिवार के ख़िलाफ़ जाने का फ़ैसला
अनसूया तय कर चुकी थीं कि अगर अपने परिवार या हमेशा उनका समर्थन करने वाले अपने भाई के ख़िलाफ़ भी जाना पड़ा तो भी वो मज़दूरों के अधिकारों की मांग करने से पीछे नहीं हटेंगी.
उन्होंने मज़दूरों के लिए काम करने की बेहतर स्थिति और उनके लिए फ़िक्स्ड काम के घंटों की मांग की. इन मांगों को लेकर साल 1914 में उन्होंने 21 दिनों की लंबी हड़ताल भी की.
उनके जीवन का सबसे अहम साल था 1918, जब साराभाई परिवार के क़रीबी महात्मा गांधी अनसूया के पथप्रदर्शक बन गए थे.
साल 1917 के जुलाई की बात है. अहमदाबाद शहर पर प्लेग महामारी की कहर टूटा. महामारी से डर कर लोग शहर छोड़ कर भागने लगे. ऐसे में मज़दूरों को पलायन करने से रोकने के लिए मिल मलिक उन्हें उनकी तन्ख्वाह में और पचास फ़ीसदी का बोनस देने लगे. महामारी के फैलने के बीच मिल मज़दूरों का काम जारी रहा.
इसके बाद जब स्थिति सामान्य हुई, मिल मालिकों ने बोनस देना बंद कर दिया, लेकिन अब तक महंगाई बढ़ चुकी थी. ऐसे में अचानक तन्ख्वाह का कम होना मिल मज़दूरों के लिए बड़ा झटका था. उन्होंने अनसूया से मदद की गुहार लगाई और उनसे कहा कि वो विरोध का नेतृत्व करें और उन्हें तन्ख्वाह में पचास फ़ीसदी का बोनस दिलवाएं.
लेकिन मिल मालिक इसके विरोध में थे. वो कामबंदी घोषित करने के लिए और मिल पर ताला लगाने के लिए तैयार थे. ऐसे में एक तरफ़ मिल मज़दूरों ने हड़ताल कर दी तो दूसरी तरफ़ मिल मालिकों ने स्थिति से निपटने के लिए अपना अलग एसोसिएशन बना लिया.

एसोसिएशन का अध्यक्ष अम्बालाल साराभाई को चुना गया जो अनसूया के भाई थे. अब ये कहानी किसी फ़िल्मी कहानी जैसी हो गई थी जहां भाई अम्बालाल साराभाई पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए खड़े थे तो दूसरी तरफ उनकी बहन पीड़ितों के हक़ में आवाज़ उठा रही थीं. दोनों वैचारिक रूप से प्रतिद्वंदी बन गए थे.
अनसूया ने क़रीब 16,000 मज़दूरों और बुनकरों को इकट्ठा किया. वो और महात्मा गांधी के भतीजे छगनलाल रोज़ सवेरे और शाम मज़दूरों से मुलाक़ातें करते, उनका उत्साह बढ़ाते, उनसे सवाल करें और ज़रूरत पड़ने पर उनके लिए मेडिकल मदद मुहैय्या कराते. ये हड़ताल क़रीब एक महीने तक चली.
हर शाम मज़दूर हाथों में प्लैकार्ड लिए मार्च निकालते. इन प्लैकार्ड पर लिखा होता - 'हम इस लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे.' अक्सर मार्च का नेतृत्व अनसूया खुद करती थीं. शहर के नागरिक, जो पहले मज़दूरों पर नाराज़ होते, ये देखकर आश्चर्य में पड़ जाते कि मज़दूरों ने कितने अनुशासित तरीक़े से इस हड़ताल का आयोजन किया था.
हड़ताल शुरू हुए दो सप्ताह ही हुए थे कि मिल मालिक और मज़दूर, दोनों पक्ष ही बेचैन होने लगे. दोनों पक्षों का नेतृत्व करने वाले भाई-बहन एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े थे और कोई भी झुकने को तैयार नहीं था.
इस मुश्किल स्थिति का अनोखा हल निकाला महात्मा गांधी ने. वो मिल मज़दूरों की हड़ताल का समर्थन कर रहे थे लेकिन मिल मालिक, ख़ासकर अम्बालाल साराभाई उनकी बहुत इज़्ज़त करते थे.

लंच के दौरान कैसे निकला हल?
गांधी जी ने अम्बालाल और अनसूया को अपने आश्रम में दोपहर के खाने के लिए आमंत्रित करना शुरू किया. रोज़ दोनों गांधी जी के आश्रम जाते जहां अनसूया अम्बालाल को भोजन परोसतीं.
उनका ये तरीका काम कर गया और दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार हो गए. आख़िर में 35 फ़ीसदी के बोनस पर दोनों पक्ष राज़ी हो गए.
साल 1920 में अनसूया ने मज़दूर महाजन संघ नाम के संगठन की स्थापना की और इसकी पहली अध्यक्ष बनीं. साल 1927 में उन्होंने कपड़ा मिलों में काम करने वाले मज़दूरों की बेटियों के लिए कन्यागृह नाम का एक स्कूल भी खोला.
अनसूया वास्तव में एक ऐसी ट्रेड यूनियन लीडर थीं जो मिल मालिकों के घराने से ताल्लुक रखती थीं. साल 1972 में अपनी मौत से पहले वो क़रीब दो लाख मिल मज़दूरों की नेता बन चुकी थीं.


हमारी पुरखिन सीरिज़ के तहत बीबीसी हिंदी दस ऐसी महिलाओं की कहानी ला रहा है जिन्होंने लोकतंत्र की नींव मज़बूत की. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को अपनी आवाज़ दी. वे समाज सुधारक थीं और कई महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वाली वे पहली महिला बनीं.
बाक़ी की कहानियां नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर पढ़ें-
- अन्ना चांडी: भारत में हाईकोर्ट की जज बनने वालीं पहली महिला
- इंदरजीत कौर: भारत-पाकिस्तान विभाजन में सहारा बनने वाली महिला
- मुसलमान लड़कियों की ज़िंदगी बदलने वालीं रुक़ैया सख़ावत
- रखमाबाई राउत: बचपन में हुई शादी के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाली लड़की
- देवदासी प्रथा का अंत करने वाली डॉक्टर मुथुलक्ष्मी रेड्डी
- चंद्रप्रभा सैकियानी: असम से पर्दा प्रथा हटाने में अहम भूमिका निभाने वाली महिला

शोध में सहयोग: पार्थ पांड्या
इलस्ट्रेशन्स: गोपाल शून्य
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)





















