कोर्ट मैरेज पर क़ानूनी सवाल, प्राइवेसी के ख़िलाफ़ है ये शादी?

शादी

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोर्ट मैरेज...आम बातचीत में ये एक ऐसा शब्द है जिसके मायने ये होते हैं कि अगर लड़का-लड़की राज़ी तो वे कोर्ट मैरेज कर सकते हैं.

लेकिन कोर्ट मैरेज जिस क़ानून के आधार पर संपन्न होती है, अब उसी क़ानून पर सवाल उठने लगे हैं.

अंग्रेजी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में हाल में छपी एक ख़बर के अनुसार, केरल की एक क़ानून पढ़ने वाली महिला ने भारत की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के सामने स्पेशल मैरेज एक्ट 1954 के ख़िलाफ़ अपनी याचिका दाखिल की है.

इस महिला ने अपनी याचिका में कोर्ट को बताया है कि स्पेशल मैरेज एक्ट के कुछ प्रावधान शादी करने के लिए तैयार जोड़ों के संवैधानिक अधिकारों का हनन करते हैं.

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि स्पेशल मैरेज एक्ट यानी विशेष विवाह अधिनियम निजता के अधिकार और समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

याचिकाकर्ता की ओर से इस याचिका को कोर्ट में दायर करने वाले वक़ील कलीश्वरम राज ने अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स के साथ बातचीत में अपना पक्ष रखा है.

उन्होंने स्पष्ट ढंग से बताया है कि किस-किस प्रावधान के तहत लोगों के कौन से अधिकारों का हनन होता है.

क्या कहता है क़ानून?

भारत में साल 1954 में एक स्पेशल मैरेज एक्ट बनाया गया जिसके तहत दो भारतीय नागरिक एक दूसरे के साथ विवाह के बंधन में बंध सकते हैं. इसके लिए लड़के की उम्र कम से कम 21 साल और लड़की की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए.

भारत में लोगों को विवाह करने का अधिकार हासिल है. लेकिन जब आप इस क़ानून के तहत अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं तो विवाह के लिए तैयार लड़के-लड़की को इस क़ानून के तहत शादी के लिए आवेदन करना होता है.

इस आवेदन में दोनों पक्षों से जुड़ी कई जानकारियां देनी होती हैं जिनमें नाम, उम्र, जन्मतिथि से लेकर पते, पिनकोड आदि शामिल हैं.

अब स्पेशल मैरेज एक्टर के सेक्शन (6) 2 के तहत, मैरेज ऑफिसर अपने दफ़्तर में किसी ऐसी जगह लड़के लड़की की ओर से दिया गया आवेदन चिपकाता है जो कि सबकी नज़रों में आती हो.

क़ानून के मुताबिक़, अगर नोटिस प्रकाशित होने के 30 दिन के भीतर कोई व्यक्ति इस शादी पर आपत्ति दर्ज नहीं करता है तो संबंधित लड़के और लड़की की शादी करा दी जाती है.

सुप्रीम कोर्ट

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क्या है विवाद का विषय?

लेकिन याचिकाकर्ता ने जो याचिका दायर की है, वो इसी बात पर टिकी हुई है कि नोटिस प्रकाशित करने से संबंधित व्यक्तियों की निजी जानकारी सार्वजनिक हो जाती है जिसका उनके ऊपर ग़लत असर पड़ सकता है.

इस मामले में याचिकाकर्ता और उनके वकीलों की दलील ये है कि इस क़ानून के प्रावधान शादी करने जा रहे लड़के लड़की के निज़ता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

याचिकाकर्ता के वक़ील मुख़्यत: इस क़ानून के सेक्शन 5, 6(2), 7, 8, 9 और 10 को चुनौती दे रहे हैं क्योंकि उनके मुताबिक़, स्पेशल मैरिज़ एक्ट संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है.

याचिका में लिखा है, “ये प्रावधान शादी करने के इच्छुक जोड़े के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है और उन्हें भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिले निजता के अधिकार से वंचित करता है.”

इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि कभी-कभी ये प्रावधान लोगों के शादी करने के अधिकार पर बेहद बुरा असर डालते हैं.

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बीबीसी ने इस मामले के क़ानूनी पहलू को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वक़ील से बात की और उनका कहना था कि ये एक तरह से समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है.

विराग गुप्ता कहते हैं, "जब एक ही धर्म के लोगों की शादी में पब्लिक नोटिस की व्यवस्था नहीं है तो स्पेशल मैरेज एक्ट में जो व्यवस्था की गई है, वो संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन है. ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन के आधार पर ये याचिका दायर की गई है कि इन नियमों की पुष्टि के लिए तीन स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर लिए जाते हैं.''

''ऐसे में इन गवाहों के हस्ताक्षरों के आधार पर शादी को कराया जाए. और इसमें पब्लिक नोटिस या कोई भी बाहरी व्यक्ति को आपत्ति जताने का मौका देने से शादी के अधिकार का उल्लंघन होता है. इससे ऑनर किलिंग जैसे मामले बढ़ते हैं. या इससे दूसरी तरह के अपराध और दबाव बढ़ने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं. इसलिए पेटिशन में माँग की गई है कि पब्लिक नोटिस को ख़त्म करना चाहिए."

गुप्ता बताते हैं, “इस क़ानून के तहत मैरेज ऑफिसर को दो चीज़ों की पुष्टि करनी ज़रूरी होती है, पहली बात ये कि क्या लड़के – लड़की दोनों क़ानूनी रूप से शादी के लिए तय उम्र सीमा को पार कर चुके हैं या नहीं. इसके बाद अगली बात ये है कि क्या ये दूसरा विवाह तो नहीं है. क्योंकि ये दोनों चीज़ें बाल विवाह क़ानून और आईपीसी के तहत अपराध हैं.”

“इसके लिए क़ानून में प्रावधान किए गए हैं कि आपको पहले से नोटिस देना होगा जो कि मैरेज ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर लगा दी जाएगी. लेकिन कई बार ये जानकारी वेबसाइट और राष्ट्रीय अख़बारों में प्रकाशित हो जाती है. ''

ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि जब लोगों को निजता का अधिकार और शादी का अधिकार दोनों ही मिले हुए हैं तो क्या लोगों को शादी का अधिकार हासिल करने के लिए अपने निज़ता का अधिकार का हनन करना पड़ेगा. यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है.

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