कफ़ील ख़ान से एनएसए हटा, अब क्या हैं उनके सामने विकल्प?

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- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय न्याय व्यवस्था "फिआट जस्टीटिया रुआत काइलुम" के सिद्धांत पर आधारित है. इस लैटिन मुहावरे का मतलब है कि किसी भी सूरत में न्याय होना चाहिए चाहे इसके कैसे भी परिणाम क्यों न हों.
इसके बावजूद ग़लत तरीक़े से निर्दोष लोगों को जेल में डाला जाना, उन पर मुक़दमे क़ायम करना और उन्हें फँसाया जाना एक आम बात है.
कई बार इस तरह के झूठे मामलों में फँसाए गए लोगों की ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में कट जाता है.
कई दफ़ा ऐसे मामलों में जेल में डाले गए लोगों को अदालतें बाइज्ज़त बरी भी कर देती हैं, लेकिन इसका ज़्यादा फ़ायदा नहीं होता. ऐसे निर्दोष लोगों को सामाजिक लांछन के साथ रहने को मजबूर होना पड़ता है. इसके अलावा ऐसे लोगों के कामकाज, आजीविका पर भी तगड़ी चोट पहुँचती है. जेल से रिहा होने के बाद भी ऐसे लोगों के लिए नौकरी हासिल कर पाना या अपने धंधे-पानी को फिर से खड़ा कर पाना आसान नहीं होता है.
डॉक्टर कफ़ील ख़ान के मामले में भी कुछ ऐसा ही है.
1 सितंबर 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह की डिवीज़न बेंच ने कफ़ील ख़ान पर लगे एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून, 1980 (रासुका) को हटाने का आदेश दिया है.
क्यों लगा था एनएसए?

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कफ़ील ख़ान के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में 12 दिसंबर 2019 को दिए गए भाषण पर विवाद था. सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ वहां क़रीब 600 छात्र प्रदर्शन कर रहे थे.
इसके दो महीने के बाद 13 फ़रवरी को कफ़ील ख़ान पर एनएसए लगाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट शाश्वत आनंद कहते हैं, "कोर्ट में सरकार के वकील ने कहा था कि कोर्ट की कोई पावर नहीं है कि वह डिटेनिंग अथॉरिटी (डीएम और राज्य सरकार) के सब्जेक्टिव सैटिस्फ़ैक्शन यानी ओपीनियन बेस्ड सैटिस्फ़ैक्शन में दख़ल दे सके. कोर्ट ने उनकी इस बात को माना कि ठीक है हम आपके सब्जेक्टिव सैटिस्फ़ेक्शन में दख़ल नहीं देंगे."
"लेकिन, कोर्ट ने कहा कि हम जिस मैटेरियल के आधार पर यह धारणा बनाई है उसे तो देख सकते हैं. इस जजमेंट में कोर्ट ने कफ़ील ख़ान की पूरी स्पीच उतार दी है."
इस स्पीच को कोर्ट ने कहीं से भी आपत्तिजनक नहीं पाया है, बल्कि कहा है कि इसमें देश को एकजुट करने की बात की गई है.
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कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ पहले धार्मिक भावनाएं भड़काने के लिए 153 ए में केस रजिस्टर हुआ था. बाद में उन पर, 153बी - राष्ट्रीय एकता के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी, 109 -उकसाने, 505 (2) - कोई भी ऐसा स्टेटमेंट देना जिससे नफ़रत फैले, शांति व्यवस्था ख़राब हो जैसी धाराओं में केस दर्ज किया गया था.
तथकथित भड़काऊ भाषण देने के क़रीब 45 दिन बाद 29 जनवरी को कफ़ील ख़ान को गिरफ़्तार किया गया और उन्हें मथुरा जेल भेज दिया गया.
13 फ़रवरी को उन पर एनएसए लगा दिया गया.
रिहाई के बाद क्या हैं विकल्प?

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शाश्वत आनंद कहते हैं, "कफ़ील ख़ान की याचिका में मुआवज़े की माँग नहीं की गई थी. अगर वे ऐसा करते तो इस बात की बड़ी संभावना थी कि उन्हें मुआवज़ा मिलता. कई दफ़ा कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर भी मुआवज़े का आदेश कर देता है. हालांकि, कफ़ील के पास मुआवज़ा माँगने के अभी भी तीन रास्ते हैं."
वे कहते हैं, "पहला, वे इसके लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिव्यू दायर कर सकते हैं. या फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा और वहां मुआवज़े की माँग करनी होगी."
तीसरा रास्ता यह है कि वे ज़िला अदालत में डैमेज की माँग करें.
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विवेक शर्मा कहते हैं, "हो सकता है कि कफ़ील ख़ान मुआवज़े की माँग न करें क्योंकि इससे लग सकता है कि वे पैसों के लिए ऐसा कर रहे हैं."
विवेक शर्मा कहते हैं, "लेकिन, उन्हें अदालत में याचिका डालनी चाहिए. अदालत प्रशासन और सरकार को डाँट तो लगा ही सकता है."
शर्मा कहते हैं कि एनएसए लगाने या निर्दोष को जेल में डालने जैसे क़दमों पर प्रशासन पर सख्त कार्रवाई अमूमन नहीं होती है क्योंकि अधिकारी बोलते हैं कि हमने ऐसा अच्छी नीयत से किया था.
आनंद कहते हैं, "उनकी एक राजनैतिक छवि बना दी गई है. बतौर डॉक्टर 29 जनवरी से अब तक उनकी कमाई और सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि हुई है."
क्या इस तरह के मामलों में जिन्हें फँसाया जाता है वे सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कुछ कार्रवाई की माँग कर सकते हैं?
आनंद कहते हैं कि इस मामले में ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता है. ज़्यादा से ज़्यादा कोर्ट अधिकारियों को फटकार लगा सकती है.
इसमें एक बड़ी चीज़ रासुका के तहत उन्हें जेल में डाले जाने की भी है.
आनंद कहते हैं, "रासुका एक प्रिवेंटिव डिटेंशन होती है. बिना एफ़आईआर के, बिना किसी मैटेरियल के आपको डिटेन किया जा सकता है. ऐसे में ज़िले के अधिकारियों के लिए कुछ ज़्यादा नहीं होगा."
कैसे तय होगी मुआवज़े की रक़म?

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मुआवज़े की रक़म अनलिक्विडेटेड डैमेज, यानी कि ऐसा नुक़सान जो कि तय न हो, जिसका सटीक आकलन न हो सके, के तौर पर होती है.
आनंद के मुताबिक़, "ऐसे मामलों में मुआवज़ा माँगने वाला एक अनुमानित रक़म की माँग कोर्ट से करता है. इसके बाद कोर्ट तय करता है कि कितना मुआवज़ा दिया जाना है."
डॉ. कफ़ील के मामले में अगर मुआवज़े की माँग होती है और कोर्ट उन्हें मुआवज़ा दिए जाने का आदेश करता है तो फिर राज्य सरकार को यह मुआवज़ा देना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने ही उन्हें अरेस्ट किया था.
आनंद कहते हैं कि कफ़ील का मामला मानहानि के दायरे में नहीं आएगा. वे ग़लत क़ानून में बंद करने की वजह से अपने अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवज़ा माँग सकते हैं.
पुनर्वास, सम्मान वापसी का मैकेनिज्म नहीं

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भारत में ऐसी कोई संवैधानिक व्यवस्थाएं नहीं हैं जिनके तहत राज्य मशीनरी इन निर्दोष लोगों और इनके परिवारों के पुनर्वास, इनके सम्मान की वापसी और इन्हें मुआवज़ा मुहैया कराने की दिशा में काम करे.
भारत में अदालतें अक्सर अंडर-ट्रायल क़ैदियों की ख़राब हालत पर चिंता जताती रहती हैं. कुछ मामलों में झूठे मामलों या पुलिस की ज्यादतियों के शिकार हुए लोगों को मुआवज़ा भी दिया जाता है.
हालांकि, भारत में इस तरह के मामलों से निबटने के लिए कोई एक पुख्ता मैकेनिज्म मौजूद नहीं है. आनंद कहते हैं, "इन क़ानूनों को आदर्श रूप में माना जाना चाहिए. लेकिन, इनकी कोई बाइंडिंग वैल्यू नहीं है यानी सरकारें इसके लिए बाध्य नहीं हैं."
अंडर-ट्रायल क़ैदी, झूठे मामलों में फँसाया जाना

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इंटरनेशनल कोवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (आईसीसीपीआर) के आर्टिकल 14(6) में ग़लत तरह से दोषी क़रार दिए गए पीड़ितों के अधिकारों का ज़िक्र है जो कि बाद में निर्दोष साबित होते हैं या ऐसे पुख्ता तथ्य सामने आने पर उन्हें माफ़ कर दिया जाता है जिनसे एक निर्दोष को सज़ा देने के ज़रिए न्याय प्रणाली की नाकामी साबित होती हो. आईसीसीपीआर के आर्टिकल 14(6) में निर्दोष लोगों को क़ानून के मुताबिक़ मुआवज़ा दिए जाने का प्रावधान है.
शाश्वत आनंद कहते हैं, "आईसीसीपीआर का आर्टिकल 9 (5) कहता है, "ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार किए गए या हिरासत में लिए गए किसी भी शख्स के पास मुआवज़ा लेने का क़ानूनी अधिकार है."
आईसीसीपीआर का आर्टिकल 15 कहता है कि किसी भी शख्स को ऐसे किसी भी एक्ट के तहत अरेस्ट नहीं किया जाएगा जो कि राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अपराध नहीं है.
दुनियाभर के तमाम देश आईसीसीपीआर के आर्टिकल 14(6) के तहत की गई प्रतिबद्धताओं को अपने यहां क़ानूनी शक्ल दे चुके हैं. इन देशों ने या तो इन्हें लागू करने के लिए क़ानून बनाए हैं या फिर प्रशासनिक या न्यायिक संस्थाओं के विवेक पर यह बात छोड़ दी है कि वे किस मामले में मुआवज़े का ऐलान करते हैं और किस में नहीं.
आईसीसीपीआर को माना मगर क़ानून नहीं बना
भारत ने भी अपने यहां आईसीसीपीआर को मंज़ूर किया है. लेकिन, यहां ग़लत तरीक़े से जेल में डाले गए या झूठे मामलों में सज़ा काट रहे लोगों के पुनर्वास या मुआवज़े के लिए कोई घरेलू क़ानून अब तक नहीं बनाया गया है.
ऐसे पीड़ितों के पास मौजूदा लीगल फ्रेमवर्क में बेहद सीमित विकल्प मौजूद होते हैं.
झूठे मामलों में जेल में डाले गए पीड़ित नुक़सान की भरपाई के लिए मुक़दमा दायर कर सकते हैं.
पिछले मामले जिनमें कोर्ट ने मुआवज़े के आदेश दिए
भारतीय अदालतें भी व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को समझते हुए उचित मामलों में मुआवज़ों का फ़ैसला देती रही हैं. हालांकि, अनुभव यह बताता है कि इस तरह की राहत यदाकदा ही किसी को मिल पाती है.
मिसाल के तौर पर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवज़ा देन का ऐलान किया. इससे 24 साल पहले उन्हें सरकारी गोपनीय जानकारियां लीक करने के लिए हिरासत में लिया गया था.
सबसे शुरुआती मामलों में 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने बरी होने के बावजूद 14 साल तक ग़लत तरीक़े से जेल में रखे जाने के लिए रूदल शाह को 30,000 रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था.
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