रिया चक्रवर्ती का इंटरव्यू और घृणा का सैलाब- ब्लॉग

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की तहक़ीक़ात में अभियुक्त, रिया चक्रवर्ती के एक साक्षात्कार के बाद उनके 'मर जाने' के समर्थन में सोशल मीडिया पर भीड़ उमड़ आई है.

एक सभ्य समाज में ऐसी उम्मीद करना कि अव्वल तो आप किसी की मौत की दुआ नहीं करना चाहेंगे और अगर किया तो शायद उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मन में बहुत घृणा और ग़ुस्सा होगा- ये कोई अतिश्योक्ति नहीं बल्कि बहुत ही बेसिक बात है.

ये साधारण मानवीय मूल्य हैं, जो आपको इंसान बनाते हैं. बेवजह आप किसी के भी मरने या उसके आत्महत्या करने की कामना क्यों करेंगे?

मौत की उस दुआ को सार्वजनिक प्लेटफ़ॉर्म पर लिखने या आत्महत्या के लिए आगे बढ़ने की सलाह देने वाले के पास, कुछ बहुत ही ठोस वजह होगी.

लेकिन इस मामले में ठोस वजह की जगह जो दिख रहा है, वो भयानक है और डरावना भी. वो एक सभ्य समाज की बुनियाद को हिला देने वाला है.

बिना अपराध साबित हुए संशय पर फ़ैसला सुनाने की कई भारतीय टीवी चैनलों की भूख है.

इस भूख और होड़ ने लोगों की सोचने समझने की ताक़त को ताक पर रखवा दिया है. एक गिद्ध की क़ौम पैदा हो रही है, जिसमें ये माना जा रहा है कि न्याय करना मीडिया और भीड़ का काम है. जाँच एजेंसियाँ फ़ॉलो अप करेंगी.

इतिहास में सुशांत सिंह मौत का मामला मीडिया ट्रायल के सबसे भयानक उदाहरण के तौर पर दर्ज होगा.

भारतीय दंड संहिता की धारा 306 किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने को दंडनीय अपराध बताती है, लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में क़ानून और भावनाएँ, दोनों की परिभाषा शायद बदल जाती है.

संयम के कोई मायने नहीं हैं, जवाबदेही का कोई डर नहीं है और ज़िम्मेदारी का अहसास कंप्यूटर या फ़ोन की स्क्रीन ऑफ़ होने के साथ ही ग़ायब हो जाता है.

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद पहली बार मीडिया को इंटरव्यू देते व़क्त रिया ने कहा कि पिछले महीनों में उनपर लगाए जा रहे "बेबुनियाद" और "मनगढ़ंत" आरोपों की वजह से वो और उनका परिवार इतने 'स्ट्रेस' में है कि उन्हें लगता है कि वो अपनी जान ले लें.

एक व़क्त पर रिया ने साक्षात्कार में कहा कि उन्हें लगता है कि रोज़-रोज़ की "प्रताड़ना" की जगह "बंदूक़ लेकर हम सब को लाइन से खड़ा कर एक बार में मार ही क्यों नहीं देते."

"सुसाइड लेटर छोड़ना मत भूलना"

रिया चक्रवर्ती गुनहगार हैं या बेक़सूर, उनपर लगाए जा रहे आरोप मनगढ़ंत हैं या सच- ये जाँच तय करेगी. गुनाह की सज़ा भी उसी के मुताबिक़ तय होगी.

लेकिन जाँच एजंसियों की तहक़ीक़ात के दौरान टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे मुक़दमे से अगर वो इतना दबाव महसूस करती हैं कि जान लेने की बात कहें तो उसे तमाशा बता, ताली बजा, हंसी उड़ा ये लिखना कि "तुम्हें कौन रोक रहा है", "हमें तो इंतज़ार है", "सुसाइड लेटर छोड़ना मत भूलना", लिखनेवाले के बारे में क्या कहता है?

साक्षात्कार में रिया के हाव-भाव पर टिप्पणियों को ही देखिए. "वो कैज़ुअल और कॉन्फिडेंट लगती हैं... पैनिक अटैक और एंग्ज़ाइटी की बात करती हैं लेकिन दिखाई तो कुछ नहीं दे रहा", "उसे कोई दुख नहीं है", "वो अपनी हँसी दबाने की कोशिश कर रही है."

आँखों में आँसू हैं या नहीं इससे रिया के दुख का आकलन करना ठीक वैसा ही है जैसे बहुत ही फ़िट और ऊर्जा से भरे हुए सुशांत के चेहरे से ये तय करना कि सुशांत डिप्रेशन से गुज़र रहे थे या नहीं.

कपड़ों और हाव-भाव के विश्लेषण से ये मान लेना कि रिया चक्रवर्ती झूठ बोल रही हैं और उनकी मृत्यु की कामना करना. इतनी घृणा कहाँ से आती है और इसको हवा कौन देता है?

सुशांत सिंह राजपूत के तनाव या डिप्रेशन में होने की जानकारी सामने आने पर सहानुभूति दिखाने और बालीवुड में भाई-भतीजावाद के चलन पर अफ़सोस ज़ाहिर करनेवाले अब ख़ुद ख़ून की प्यासी भीड़ का रूप ले रहे हैं.

रिया के मुताबिक़ सुशांत और वो प्रेम करते थे. लेकिन मीडिया का एक बड़ा तबक़ा और सोशल मीडिया की एक बड़ी भीड़ उस रिश्ते में रिया की, यानी 'बाहरी औरत' की भूमिका पर ही सवाल उठा रहे हैं.

उस औरत के मर्द के परिवार से रिश्ते ख़राब होने और मर्द की कमज़ोरियां सामने लाने से लोगों को वो और बड़ी विलेन दिखाई देती हैं. उस औरत के परिवार के एक 'लिव-इन' रिश्ते को क़बूल करने पर भी लोग आपत्ति जता रहे हैं.

'एंटी-नेशल' मीडिया

किसी जानेमाने कलाकार की संदेहजनक हालात में हुई मौत पर मीडिया का सवाल उठाना और उससे जुड़े सभी पक्षों को सामने लाना ज़रूरी है.

लेकिन रिया चक्रवर्ती का साक्षात्कार करने वाले चैनलों को दूसरा पक्ष दिखाने के लिए 'बिकाऊ', 'झूठा' और 'एंटी-नेशनल' यानी 'देश-विरोधी' कहा जा रहा है. यहाँ तक कि इस इंटरव्यू को करने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई को रिया का ब्वॉयफ़्रेंड तक बुलाया जा रहा है.

ये आरोप लग रहे हैं कि रिया से तीखे सवाल नहीं पूछे गए और उन्हें अपना पक्ष रखने का एक मंच दे दिया गया.

हालाँकि पिछले दो महीने में सुशांत सिंह राजपूत की ज़िंदगी से जुड़े या नहीं जुड़े या जुड़े होने का दावा करनेवाले कितने ही किरदारों को बहुत से आरोप लगाने के लिए मीडिया ने मंच दिया.

अब जब उन आरोपों का जवाब दिया गया और वो एक तबक़े को पसंद नहीं आया, उनकी सोच से मेल नहीं खाया, तो भद्दे तरीक़े से शोर मचाकर चुप कराने का आज़माया हुआ हथियार अपनाया गया है.

रिया अपने साक्षात्कार में ज़्यादातर वक़्त शांत रहीं, कुछ बार रुआँसी हुईं, लेकिन इंटरव्यू रुका नहीं.

उन्होंने ख़ुद पर लगे हर आरोप को पूरा सुना और विचलित हुए बिना सीधे तरीक़े से जवाब दिया.

रिया के हाव-भाव पर ये मेरी निजी राय हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोगों को उनके संयम में झूठ का आभास हुआ हो.

लेकिन जब एक बार रिया उत्तेजित हुईं, तो उनकी बात का एक ही मतलब था जिसे इस वक़्त उनके बारे में लिख रहे हर व्यक्ति को ध्यान में रखना चाहिए.

वो बोलीं, "कल अगर कुछ हो गया तो कौन ज़िम्मेदार होगा?. मुझे एक फ़ेयर ट्रायल भी नहीं मिलेगा?"

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