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रिया को क्यों बनाया जा रहा है सुशांत का विलेन? - ब्लॉग
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती की ज़िंदगी एक टेलीविज़न धारावाहिक की तरह आज कल न्यूज़ चैनल्स पर दिखाई जा रही है.
कभी ये छल-कपट और काले जादू के साथ मर्द को अपने वश में करनेवाली औरत की कहानी बन जाती है, तो कभी एक मज़बूत, बलवान, ख़ुश-मिज़ाज मर्द को अवसाद-ग्रस्त कमज़ोर शख़्स बनाकर दिखानेवाली औरत की.
कहानी में नित नए मोड़ आते हैं, अहम् भूमिका जतानेवाले किरदार आते हैं और राय शुमारी ऐसे की जाती है, मानो वही गहन सत्य हो.
पर कहानी रहती है मर्द और औरत के रिश्ते की. जिसमें मर्द हीरो है और औरत विलेन. वो भी बिना जाँच के- कम से कम अब तक का प्लॉट तो यही रहा है.
14 जून को सुशांत सिंह राजपूत को उनके फ्लैट में मृत पाए जाने के बाद, एक लंबे समय तक इसकी वजह बॉलीवुड का भाई-भतीजावाद बताया गया. फ़िल्म इंडस्ट्री से सवाल पूछे गए, टीवी स्टूडियो में बहस छिड़ी.
पर फिर शक़ की सुई उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती की तरफ़ मुड़ गई. उन्हें पैसे की लालची बता कर बलात्कार और हत्या की धमकिया दी जानें लगीं. तंग आकर उन्होंने मुंबई पुलिस के साइबर सेल में शिकायत भी की.
हावी होनेवाली औरतें
पर इन अफवाहों पर एक तरह से तब मुहर लग गई, जब सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने रिया चक्रवर्ती पर अपने बेटे को आत्महत्या के लिए उकसाने, पैसे हड़पने और घरवालों से दूर रखने के इल्ज़ाम के साथ बिहार पुलिस में एफ़आईआर दर्ज करवाई.
इल्ज़ाम, जो पुलिस की तहक़ीक़ात और अदालत की सुनवाई के दौरान परखे जाते हैं. और उससे पहले उन्हें आरोप ही मानना सही है.
पर ऐसा नहीं हुआ. बिहार में जनता दल युनाइटेड के नेता महेश्वर हज़ारी ने रिया चक्रवर्ती को विष-कन्या बताया, "उन्हें एक सोची-समझी साज़िश के तहत भेजा गया, सुशांत को प्यार के जाल में फंसाने के लिए, और उन्होंने उनका क्या हाल किया हम सब जानते हैं".
ऐसे बयानों के बाद रिया ही नहीं बंगाल की औरतों पर सोशल मीडिया पर ख़ूब छींटाकशी हुई. अंग्रेज़ी बोलनेवालीं, शादी के बाहर यौन संबंध रखने से ना हिचकनेवाली, अपने मन की बात खुल कर बोलनेवाली वो बंगाली औरतें जो उत्तर भारत के मर्दों को बिगाड़ देती हैं.
कई ट्वीट लिखे गए, जैसे "बंगाली लड़कियां हावी हो जाती हैं, उन्हें पता है लड़कों को कैसे फंसाया जाए", "पहले वो काला जादू से बड़ी मछली पकड़ती हैं फिर वो ही उनके सारे काम करती है".
यहां तक कि कोलकाता पुलिस में शिकायतें दर्ज होने की रिपोर्ट भी आई. पर बंगाली और बाक़ि औरतों ने मिल कर इन धारणाओं का सोशल मीडिया पर ही जवाब दिया.
ट्विटर पर रुचिका शर्मा ने लिखा कि औरतों को वहशी दिखाना भारत में व़क्त काटने का एक लोकप्रिय तरीका है और इस सोच को दशकों का नारीवादी आंदोलन नहीं बदल पाया है, क्योंकि उसकी शुरुआत घर से, मर्दों के साथ हमारे रिश्ते से शुरू होने की ज़रूरत है.
अभिनेत्री स्वास्तिका मुखर्जी ने लिखा, "हां, मैं रूई और भेटकी पसंद करती हूं, फिर उसे सरसों के तेल में फ्राय कर, गरम चावल और लाल या हरी मिर्च के साथ खाती हूं. बंगाली औरतों, कोई मेरे साथ जुड़ना चाहेगा?"
बेबस मर्द
तंत्र-मंत्र और काला जादू से सुशांत सिंह राजपूत को वश में करने का दावा, एक समझदार मर्द जो बेबस हो गया, झांसे में आ गया.
ये उसी सुशांत सिंह राजपूत के लिए कहा जा रहा था, जिन्होंने पिछले साल जलालुद्दीन रूमी का लिखा, "जैसे एक परछाई, जो मैं हूं भी और नहीं भी", ट्वीट किया था.
बेबसी की ये बात सुशांत सिंह राजपूत के अवसाद का रोगी होने के दावे से जुड़ी थी. वो अलग बात है कि इस दावे पर भी ख़ूब सवाल किए गए. तस्वीरों में दुखी दिखने की निशानदेही खोजी गई.
फ़िल्म विश्लेषक ऐना वेट्टीकाड ने पूछा, "अवसाद की 'लुक' का क्या मतलब होता है? मानसिक रोग से जुड़े लोग सुशांत सिंह राजपूत के मामले की टेलीविज़न कवरेज में फैलाई जा रही ग़लत जानकारी के ख़िलाफ़ क्यों नहीं बोलते?"
मानसिक बीमारी यानी कोई विफलता, एक निजी हार. और मर्द को कमज़ोर मानना समाज के लिए वैसे ही मुश्किल है.
वो भी एक ऐसा मर्द जो छोटे और बड़े पर्दे पर 'हीरो' की भूमिका में रहा है, जिसने बॉलीवुड के बाहर से होने के बावजूद उसमें अपना मकाम बनाया है, वो निर्बल कैसे हो सकता है.
अवसाद जैसी बीमारी हमारे हीरो को होना असहज था और अगर उन्हें ये बीमारी थी तो इसका भी ग़लत फायदा उठाया गया होगा. ये उनकी ग़लती नहीं, उसके साथ धोखा करनेवाली की ही होगी. चर्चा में फिर सूंई रिया चक्रवर्ती की ओर घूम गई.
औरत के कपड़े
उन्होंने एक वीडियो जारी कर न्यायपालिका में विश्वास जताया और मीडिया में उनके ख़िलाफ़ की जा रही बातों को ग़लत बताया.
पर सफ़ेद सलवार-कमीज़ में जारी किया गया ये वीडियो उनके बयान नहीं, बल्कि कपड़ों की वजह से सुर्ख़ियों में रहा.
सुशांत सिंह राजपूत के परिवार के व़कील ने कहा, "रिया का वीडियो उनके बयान नहीं, उनके कपड़ों के बारे में है, मुझे नहीं लगता उन्होंने ज़िंदगी में कभी ऐसे कपड़े पहने होंगे, उनका मक़सद बस ख़ुद को एक सीधी-सादी औरत जैसा पेश करना था."
इसे वरिष्ठ वक़ील करुणा नंदी ने 'लीगल मिसॉजनी' यानी क़ानून के दायरे में औरतों को नीचा देखना, करार दिया. उन्होंने लिखा, "कम कपड़े मतलब अपराधी, सलवार-कमीज़ मतलब अपराध छिपाने की कोशिश".
मीडिया में फैलाए जा रहे मानसिक रोग से जुड़े मिथकों को दूर करने के लिए सुशांत सिंह राजपूत की थेरेपिस्ट ने बयान दिया. उन्होंने कहा अवसाद को मानसिक बीमारी की जगह व्यक्तित्व की कमज़ोरी मानना ग़लत है.
ये भी दावा किया कि सुशांत सिंह राजपूत को 'बाइपोलर डिसऑर्डर' था और रिया ने उन्हें इसे छिपाने की जगह मदद मांगने की हिम्मत दी.
धारावाहिक अभी जारी है. मीडिया की अदालत में हर दूसरे दिन नई जानकारी पेश की जा रही है. परिवार, दोस्त, जाननेवालों के बयान सामने आ रहे हैं.
सुशांत सिंह राजपूत की मौत ख़ुदकुशी से हुई या उनकी हत्या की गई? और अगर इसके पीछे कोई साज़िश थी तो वो किसने रची और किस मक़सद से? इन सवालों के जवाब ढूंढने की राह में राजनीति भी है, निजी स्वार्थ भी और इस सबके बीच में कहीं दबी सच्चाई.
न्यायपालिका और जांच एजंसियों का इंतज़ार करे बग़ैर स्टिंग ऑपरेशन, मीडिया की अपनी पड़ताल और अपराध तय करने की जल्दबाज़ी घातक हो सकती है.
दबाव और ख़ुदकुशी के जिस रिश्ते से बात शुरू हुई थी, विलेन ढूंढने की होड़ में कहीं वही माहौल ना बन जाए.
निर्देशक हंसल मेहता ने शायद इसीलिए ट्विटर पर सवाल पूछा, कि अगर मीडिया ट्रायल की वजह से ऐसा हुआ तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा?
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