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IIT-JEE परीक्षा को पाँच दिन शेष, अब छात्र क्या कर सकते हैं?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जिस आईआईटी-जेईई और नीट परीक्षा को स्थगित करने के लिए ग्रेटा थनबर्ग से लेकर सोनू सूद जैसी हस्तियों ने छात्रों की माँग का समर्थन किया है. अब उस परीक्षा में मात्र पाँच दिन का समय शेष बचा है.
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की ओर से तय तारीख़ों के मुताबिक़, जेईई की परीक्षा 1 सितंबर को होनी है जिसमें अब सिर्फ़ पाँच दिन बचे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि परीक्षा के आयोजन का विरोध कर रहे छात्रों के सामने क्या विकल्प शेष हैं.
एनटीए अपने रुख़ पर क़ायम
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने मंगलवार को स्पष्ट कर दिया है कि आईआईटी के लिए जेईई और मेडिकल के लिए होने वाली नीट परीक्षा तय समय पर ही होंगी.
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की ओर से दिए गए समय के मुताबिक़, एनईईटी की परीक्षा 12 सितंबर और जेईई की परीक्षा 1 से 6 सितंबर तक होना तय हुआ है.
ऐसे में इन परीक्षाओं में अब सिर्फ़ चंद दिन शेष हैं लेकिन सोशल मीडिया से लेकर ज़मीन पर भी छात्रों की ओर से अनुनय, विनय और विरोध जारी है.
छात्रों का तर्क है कि जब कोरोना वायरस इतनी तेज़ी से फैल रहा है तो लाखों बच्चों का एक जगह इकट्ठे होकर परीक्षा देना सुरक्षित नहीं है.
एनटीए ने इस समस्या के निराकरण के लिए छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए परीक्षा केंद्रों के रखरखाव के दिशा निर्देश जारी किए गए हैं.
इन परीक्षाओं के लिए यह सुनिश्चित किया गया है कि 99 फ़ीसदी छात्रों को उनकी पहली पसंद के शहर में ही सेंटर मिले.
एनटीए की प्रेस रिलीज़ में बताया गया है कि कोविड-19 महामारी के कारण जेईई मेन की परीक्षा के परीक्षा केंद्रों को 570 से 660 कर दिया गया है. वहीं, एनईईटी की परीक्षा के लिए 2546 की जगह 3843 परीक्षा केंद्र बनाए गए हैं.
जेईई जहां कंप्यूटर आधारित परीक्षा होगी वहीं एनईईटी में पेन-पेपर से परीक्षा देनी होगी.
परीक्षा केंद्रों में सोशल डिस्टेंसिंग बरक़रार रखने के लिए जेईई (मेन) की परीक्षा के दौरान परीक्षार्थी एक सीट छोड़कर बैठेंगे. वहीं एनईईटी के परीक्षा केंद्रों में हर कमरे में 24 की जगह सिर्फ़ 12 परीक्षार्थी होंगे.
बाढ़ का प्रश्न
बाढ़ का प्रश्न अभी भी बना हुआ है. लेकिन सरकार का तर्क ये है कि इन परीक्षाओं के आयोजन की तारीख़ें आगे बढ़ाने से एक पूरे साल का नुक़सान हो सकता है.
एनटीए ने अपनी प्रेस रिलीज़ में 17 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का हवाला दिया है जब सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षाएं स्थगित करने की याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था कि छात्रों का क़ीमती साल 'बर्बाद नहीं किया जा सकता है' और ज़िंदगी चलते रहने का नाम है.
इस सबके बीच कई राज्य सरकारें केंद्र सरकार से इन परीक्षाओं को आगे बढ़ाने की अपील कर चुकी हैं. लेकिन सरकार का रुख़ इस मुद्दे पर बदलता नहीं दिख रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि महामारी और बाढ़ आदि समस्याओं की वजह से परेशान छात्रों के सामने क्या विकल्प शेष हैं.
चूंकि परीक्षा में अब सिर्फ़ पाँच दिन शेष हैं. ऐसे में प्रतियोगियों के सामने इम्तिहान देने या नहीं देने के सिवा दूसरा विकल्प नज़र आता नहीं दिख रहा है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विराग गुप्त मानते हैं कि अभी विकल्प शेष हैं लेकिन इस समस्या को सकारात्मक ढंग से देखने की आवश्यकता है.
वे कहते हैं, “ये ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका को ख़ारिज कर दिया है लेकिन जो लोग छात्रों के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, वे स्वयं भी जाकर कोर्ट में नई याचिकाएं दाख़िल कर सकते हैं.
“क्योंकि कोर्ट ने याचिका दाख़िल करने पर रोक नहीं लगाई है. एक विकल्प ये भी है कि पुरानी पीटिशन पर रिव्यू पीटिशन दाख़िल की जाए.”
क्या रुख़ में परिवर्तन संभव है?
विराग गुप्त ये भी मानते हैं कि समस्या को टालने की बजाए निराकरण का प्रयास करना चाहिए.
वे कहते हैं, “जब हम ये कहते हैं कि टेस्ट को टाल दिया जाए तो एक बड़ी समस्या खड़ी होती है. लेकिन इसका हल ये है कि सर्वोच्च अदालत के सामने तथ्यों को स्पष्ट ढंग से पेश किया जाए और बताया जाए कि टेस्ट आयोजित होने की स्थिति में कितने लोगों का आवागमन होगा, उनके रहने रुकने और खानपान की व्यवस्था कैसे की जाएगी, इन लोगों के आने जाने का बंदोबस्त कैसे होगा. जब कोर्ट के सामने ये सभी तथ्य व्यापकता के साथ पहुंचेंगे तब कोर्ट एनटीए को इन सभी माँगों को पूरा करने के दिशा निर्देश जारी कर सकता है. और इससे छात्रों और अभिभावकों की समस्या हल हो सकती है."
लेकिन सवाल ये भी है कि अगर कोई छात्र बाढ़ आदि की वजह से टेस्ट में शामिल नहीं होता है तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा.
विराग गुप्त कहते हैं, “अगर कोई बाढ़ आदि की वजह से एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंच पाता है, वह टेस्ट नहीं दे पाता है और उसने अपनी ये समस्याएं केंद्र सरकार की एजेंसी एनटीए को बता दी थीं तो इसके बाद भी अगर वह बच्चा टेस्ट देने में नाकाम रहता है तो इसके लिए केंद्र सरकार की एजेंसी एनटीए ज़िम्मेवार होगी, क्योंकि बच्चे ने पहले ही इस बारे में एनटीए को अवगत करा दिया था. क्योंकि भारत का संविधान बच्चों को समानता और शिक्षा का अधिकार देता है और सरकार की नीतियों के चलते अगर उसके इन अधिकारों का हनन होता है तो इसके लिए केंद्र सरकार और उसकी एजेंसी ज़िम्मेवार होगी.”
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