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कश्मीर में तीन दशकों से चलता आ रहा राजनीतिक हत्याओं का दौर
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
नब्बे के दशक में भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ के उदय के बाद से पिछले तीन दशकों में राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं और नेताओं को मारा जाता रहा है. ये सिलसिला अब भी ज़ारी है.
कश्मीर की दो बड़ी राजनीतिक पार्टी नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) अक्सर दावा करती रही हैं कि पिछले तीन दशकों में उनके सैकड़ों कार्यकर्ता मारे गए.
पिछले दो महीनों में कश्मीर घाटी में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े पांच नेताओं की हत्या कर दी गई है. इसमें सरपंच भी शामिल हैं.
इस साल जून में दक्षिण कश्मीर में कांग्रेस के सरपंच की भी हत्या कर दी गई थी.
ऐसा पहली बार नहीं है जब बीजेपी के कार्यकर्ताओं, नेताओं और सरपंच की हत्या हुई हो. पहले भी घाटी के कई हिस्सों में बीजेपी नेताओं के मारे जाने की खबरें आई हैं.
हाल ही में, बांदीपोरा के उत्तरी इलाक़े में तीन बीजेपी नेताओं को गोली मार दी गई थी. ये तीनों पिता और दो बेटे थे. बडगाम और कुलगाम ज़िलों में भी दो सरपंचों की हत्या कर दी गई थी.
नेताओं में डर का माहौल
जब भी इस तरह की राजनीतिक हत्याएं होती हैं तो पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता और नेताओं में डर का माहौल बन जाता है. वो पार्टी से इस्तीफे के बारे में सोचने लगते हैं.
मौजूदा स्थिति में कश्मीर में कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर इस्तीफ़े की घोषणा की है. ख़बरों के मुताबिक करीब तीस लोगों ने अपनी पार्टियों से इस्तीफ़ा दिया है.
हालांकि, बीजेपी के मीडिया सेल के कश्मीर प्रभारी मंज़ूर अहमद कहते हैं कि सिर्फ़ नौ लोगों ने अपना इस्तीफ़ा भेजा है और इससे पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "इसमें कोई शक नहीं कि हत्याओं के बाद 10 से ज़्यादा लोगों ने इस्तीफ़े की घोषणा की है लेकिन वो सभी बीजेपी से नहीं हैं. बीजेपी से अब तक सिर्फ़ नौ लोगों ने इस्तीफ़ा दिया है."
मंज़ूर कहते हैं कि कुछ कार्यकर्ताओं ने इसलिए इस्तीफ़ा दिया है क्योंकि वो दूर-दराज़ के इलाक़ों में रहते हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर डर है.
बीजेपी कार्यकर्ताओं, नेताओं और सरपंचों में डर को देखते हुए प्रशासन ने उन्हें सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया है.
बीजेपी के बांदीपोरा प्रभारी नसीर अहमद दो और कार्यकर्ताओं के साथ श्रीनगर के एक होटल में हैं.
नसीर अहमद ने होटल से फोन पर बीबीसी से बात करते हुए कहा कि बीजेपी से जुड़ने का मतलब ये नहीं है कि हमने अपना धर्म और आस्था बेच दी है.
वह कहते हैं, "सबसे पहले हम मुसलमान हैं, फिर कश्मीरी हैं और फिर भारतीय हैं. हमने बीजेपी को अपना धर्म या आस्था नहीं बेची है. लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि बीजेपी से जुड़ने का मतलब इस्लाम के ख़िलाफ़ है. लोगों को लगता है कि बीजेपी से जुड़ने वाला हर शख़्स हिंदू बन गया है. ये सच नहीं है. हम बीजेपी के लोग कश्मीर में विकास और रोजगार के लिए काम करते हैं."
कश्मीर में बीजेपी ने चुनावों में एक भी सीट नहीं जीती थी.
मज़ूर दावा करते हैं कि बीजेपी के कश्मीर में तीन लाख सदस्य हैं.
मध्य कश्मीर के गांदेरबाल ज़िले से बीजेपी के उपाध्यक्ष फिरोज़ अहमद माल्ला ने फोन पर बताया कि उन्होंने कुछ दिनों पहले हुई हत्याओं के बाद पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है. लेकिन, वो इससे ज़्यादा कुछ नहीं बता सकते.
गांदेरबाल से बीजेपी के एक और कार्यकर्ता गुलाम मोहम्मद मागरी ने फोन पर बताया कि उन्होंने बीजेपी से इस्तीफ़ा दे दिया है. हालांकि, उन्होंने इस्तीफ़े का कारण नहीं बताया.
क्यों होती है नेताओं की हत्या
कश्मीर में अन्य राजनीतिक पार्टियां ऐसी हत्याओं को अमानवीय बताती हैं.
जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी (एपी) के अध्यक्ष अल्ताफ बुख़ारी कहते हैं कि किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता की हत्या मानवता के ख़िलाफ़ है.
वह कहते हैं, "किसी भी निर्दोष की हत्या निंदनीय है. राजनीतिक कार्यकर्ता भी निर्दोष होते हैं. वो हथियारों से लड़ने वाले कोई सैनिक नहीं हैं."
राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या क्यों होती है इस सवाल पर बुख़ारी कहते हैं, "वो आसान निशाना होते हैं. उनके पास कोई हथियार नहीं होता. इसलिए उन्हें मारना आसान है. साथ ही उनकी मौते ख़बर भी बनती है."
क्या इन हत्याओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है? इस सवाल के जवाब में बुख़ारी कहते हैं, "मुझे इसकी जानकारी नहीं है. हर बार अज्ञात बंदूकधारी किसी को मार देते हैं. मैं बस इतना कह सकता हूं कि ये वो तत्व हैं जो कश्मीर में शांति नहीं चाहते."
जम्मू और कश्मीर में बीजेपी के बड़े नेता इन हत्याओं के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के प्रभारी अविनाश खन्ना कहते हैं, "कश्मीर में कुछ लोग पाकिस्तान के निर्देषों पर काम कर रहे हैं."
खन्ना इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में डर बैठ गया है.
वह कहते हैं, "ऐसी स्थितियों में हमारे कार्यकर्ताओं का मनोबल कभी कम नहीं होगा. जो लोग हमारे कार्यकर्ताओं का हौसला तोड़ना चाहते हैं वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएंगे."
खन्ना बताते हैं कि लोग हमें कहते थे कि अगर धारा 370 को हाथ भी लगाया गया तो ख़ून की नदियां बह जाएंगी.
वह कहते हैं, "हमने ये किया. हमारे कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के झंडे को उठाए रखा. जब हमने धारा 370 ख़त्म की है तो ये स्वाभाविक है कि इसका विरोध करने वाले खुश नहीं होंगे."
बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को सुरक्षा देने के लिए होटल और अन्य जगहों पर ले जाया जा रहा है. लेकिन, क्या ये समस्या का स्थायी समाधान है और क्या हर कार्यकर्ता को सुरक्षा देना संभव है?
इस सवाल का जवाब देते हुए अविनाश खन्ना कहते हैं, "जहां तक सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की बात है तो ये कुछ समय के लिए है. जिसे भी सुरक्षा देने की ज़रूरत होगी उसे सुरक्षा प्रदान की जाएगी."
बीजेपी पर पक्षपात का आरोप
हालांकि, कश्मीर के अन्य राजनीतिक दलों का आरोप है कि बीजेपी राजनीतिक दलों को सुरक्षा प्रदान करने में पक्षपाती रवैया अपना रही है.
सीपीआई (एम) के राज्य सचिव और पूर्व एमएलए एमवाई तारिगामी कहते हैं, "राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करना सिर्फ़ एक बड़ा मसला नहीं है बल्कि ये महत्वपूर्ण भी है. लेकिन, दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीजेपी इसमें बहुत पक्षपाती रवैया अपना रही है. उन्होंने राज्यपाल शासन के दौरान सुरक्षा हटा ली. खासतौर पर पांच अगस्त के बाद. जो भी कार्यकर्ता मारा जा रहा है, ये मायने नहीं रखता कि वो कौन है और किस पार्टी से है, हमारे लिए वो एक राजनीतिक कार्यकर्ता है."
एमवाई तारिगामी का कहना है कि इन हत्याओं का मकसद है कि कश्मीर में कोई राजनीतिक गतिविधि ना हो. वो कहते हैं, "वो राजनीतिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते. वो राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यही संदेश देना चाहते हैं."
हाल ही में एक ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर कथित तौर पर वायरल हुई थी जिसमें हिज्बुल कमांडर बीजेपी कार्यकर्ताओं को धमकी दे रहा था कि वो अपना रास्ता दुरुस्त कर लें. हालांकि, बीबीसी स्वतंत्र रूप से इस ऑडियो क्लिप की पुष्टि नहीं करता है.
जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी मुख्यधारा की पार्टी मानी जाने वाली नेशनल कांफ्रेंस का दावा है कि पिछले 30 सालों में पार्टी के पांच हज़ार से ज़्यादा कार्यकर्ता और नेता मारे गए हैं.
नेशनल कांफ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी कहते हैं, "हमारे पिछले तीस सालों में पांच हज़ार से ज़्यादा कार्यकर्ता मारे गए हैं. पांच अगस्त के बाद हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं से सुरक्षा वापस ले ली गई. पुलवामा ज़िले के हमारे अध्यक्ष पिछले एक साल से ज़िले के पार्टी ऑफिस में रह रहे हैं. बीजेपी और नई राजनीतिक पार्टियों को सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है."
बीजेपी का आरोपों से इनकार
जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रविंदर रैना इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं कि बेजपी सिर्फ़ अपने कार्यकर्ताओं को सुरक्षा मुहैया करा रही है.
वह कहते हैं, "हाल ही में मैं उपराज्यपाल से मिला था और मैंने उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के बारे में अवगत कराया. मैंने सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए सुरक्षा की मांग की, चाहे वो एनसी हो, पीडीपी हो या कांग्रेस."
सरपंच एसोसिएशन जम्मू एंड कश्मीर के अध्यक्ष शफीक़ मीर का मानना है कि पंचों और सरपंचों को किसी राजनीतिक पार्टी से जोड़ना सही नहीं मानते.
वह कहते हैं, "सरपंचों और पंचों को 2012 से मारा जा रहा है क्योंकि वो राजनीतिक पार्टियों से जुड़े रहे हैं. मैं कहता आया हूं कि पंचायत व्यवस्था का छोटे-मोटे फायदों के लिए राजनीतिकरण किया जा रहा है. इन सालों में राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हमारे 20 सरपंच और पंच मारे गए हैं."
"मेरा अनुरोध है कि पंचायत व्यवस्था पर राजनीतिक रंग ना चढ़ाएं. बीजेपी और दूसरे पार्टियां अपने फायदों के लिए उनका इस्तेमाल करती हैं और मरने के लिए छोड़ देती हैं. मेरा मानना है कि पंचायत का कश्मीर के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है. अब वाकई हमें सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी है."
संघर्ष क्षेत्र में पिसते आम लोग
कश्मीर में विश्लेषक कहते हैं कि ये सब ऐसी जगह पर हो रहा है जो संघर्ष क्षेत्र है.
श्रीनगर के पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हारून रेशी कहते हैं, "संघर्ष वाले इलाक़ों में आम लोगों की बलि चढ़ती है. वो सेना और चरमपंथियों के बीच पिस जाते हैं. ऐसे में आम लोग पीड़ित बन जाते हैं. आप दूसरे संघर्ष क्षेत्रों में देख सकते हैं कि वहां क्या हुआ है."
वो कहते हैं, "ऐसे इलाक़ों में समाज दो हिस्सों में बंटा होता है. कश्मीर में भी यही है. ये विचारधारा के आधार पर निज़ी फायदों और अन्य कारणों से होता है."
बीबीसी ने इस मामले पर कश्मीर के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस विजय कुमार से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया.
साथ ही उपराज्यपाल के सलाहकार फारूक़ खान से भी इस मामले पर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.
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