कश्मीर: चरमपंथियों के हाथों बीजेपी के एक और सरपंच की हत्या

    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम ज़िले के क़ाज़ीगुंड इलाक़े में सशस्त्र चरमपंथियों ने भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता और निर्वाचित ग्राम प्रधान की गोली मार कर हत्या कर दी है.

पुलिस ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि ये वाक़या बुधवार रात को हुआ. मृतक की पहचान सज्जाद खांडे के नाम से हुई है. वो वेस्सु गांव में कड़ी सुरक्षा वाले कैंप में रहते थे.

जब सज्जाद को गोली मारी गई, उस वक़्त वो कैंप से लगे अपने घर की तरफ़ जा रहे थे.

कुलगाम हॉस्पिटल के प्रशासक डॉक्टर मोहम्मद इक़बाल सोफ़ी ने बताया कि खांडे को जब अस्पताल लाया गया, तब तक उनकी मौत हो चुकी थी.

वेस्सु के कैंप में बीजेपी से जुड़े कई सरपंच रहते हैं.

इसके अलावा कुछ साल पहले नौकरियों के लिए लौटने वाले कुछ कश्मीरी पंडित भी इसी कैंप में रहते हैं.

48 घंटे में दूसरा हमला

पुलिस ने बताया कि पिछले 48 घंटों के दौरान किसी बीजेपी कार्यकर्ता पर ये दूसरा हमला है.

पुलिस के मुताबिक़, इससे पहले बीजेपी कार्यकर्ता आरिफ़ मोहम्मद पर वेस्सु गांव के नज़दीक संदिग्ध चरमपंथियों ने गोली चलाई थी जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए.

जून के महीने में कांग्रेस पार्टी से जुड़े सरपंच अजय पंडिता की दक्षिणी कश्मीर में उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

जुलाई में बांदीपुरा में बीजेपी के युवा कार्यकर्ता वसीम बारी को उनके भाई और पिता के साथ गोली मार दी गई थी.

पिछले कुछ सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी कश्मीर में अपनी सियासी ज़मीन तैयार करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है.

कश्मीर में बीजेपी

बीजेपी की कश्मीर इकाई के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर का कहना है, "हम पूरे कश्मीर में तीन लाख से भी अधिक कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ने में कामयाब हो पाए हैं."

अल्ताफ़ ठाकुर मारे गए चरमपंथी बुरहान वानी के शहर त्राल से ताल्लुक़ रखते हैं.

कश्मीर पुलिस के महानिरीक्षक विजय कुमार ने बताया कि बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की समय-समय पर समीक्षा की जाती रही है.

वसीम बारी की मौत के बाद उन्होंने कहा था, "अगर किसी व्यक्ति को ख़तरे का अंदेशा होता है तो वो हमसे संपर्क करता है. हम उसके ख़तरे का आकलन करते हैं और उसे पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराते हैं."

पिछले साल पाँच अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया गया था और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था. इसके बाद से ही क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां बंद हैं.

कश्मीर में राजनीतिक हालात

फ़ारूक़ अब्दुल्लाह की नेशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे राजनीतिक दल जो राज्य की राजनीति के प्रमुख घटक हुआ करते थे, अब निष्क्रिय स्थिति में हैं.

फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और उनके बेटे उमर अब्दुल्लाह अख़बारों की सुर्खियों में थोड़ी बहुत जगह ज़रूर पा रहे हैं लेकिन महबूबा पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत अभी भी हिरासत में हैं.

इस समय राज्य की राजनीति में केवल बीजेपी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके दफ़्तर श्रीनगर और दूसरे ज़िलों में खुले हुए हैं.

पार्टी कार्यकर्ताओं ने बुधवार को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के सालगिरह के मौक़े पर तिरंगा लहराकर और राष्ट्रगीत गाकर जश्न मनाया.

बीजेपी कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नारे भी लगाए.

बीजेपी की चुनौती

इस साल जून के महीने से जिस रफ़्तार से बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे हैं, उसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि कश्मीर के सियासी फ़लक पर अपनी जगह बनाने के लिए बीजेपी की कोशिशों को संदिग्ध चरमपंथियों के सशस्त्र हमलों की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

पार्टी के क्षेत्रीय सचिव अशोक कौल कहते हैं, "हरेक कार्यकर्ता को दिन-रात सुरक्षा देना संभव नहीं है. पाकिस्तान इन हमलों को शह दे रहा है और चरमपंथी इस तरह की बुज़दिल हरकतों का सहारा लेते रहेंगे. लेकिन हमारे सुरक्षाकर्मी उनके नापाक इरादों को नाकाम कर देंगे."

पाँच अगस्त, 2019 के बाद से ही भारत प्रशासित कश्मीर में ज़िंदगी ठहरी हुई है. इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति को बदल दिया था.

इससे पहले जम्मू-कश्मीर को टैक्स, नौकरियों, नागरिकता और संपत्ति की मिल्कियत जैसे मुद्दों पर अपना क़ानून बनाने की इजाज़त थी.

क्षेत्र में लंबे समय से लॉकडाउन जारी था और तभी मार्च में कोरोना लॉकडाउन की शुरुआत हो गई. कारोबार जगत के लोगों का कहना है कि कश्मीर को 40 हज़ार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. राज्य के 15 लाख बच्चों ने पिछले एक साल से स्कूल का मुंह नहीं देखा है.

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