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इंदरजीत कौर: भारत-पाकिस्तान विभाजन में सहारा बनने वाली महिला
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सवाल- क्या आप फेमिनस्ट हैं?
जवाब- हूं लेकिन ब्रा जलाने वालों जैसी नहीं.
सवाल किसी पत्रकार का था और जवाब इंदरजीत कौर का.
इंदरजीत कौर, वो महिला जिन्होंने बड़ी दिलेरी और समझबूझ से महिलाओं के लिए कई बंद दरवाजे खोले. इंदरजीत कौर ने लड़कियों को बाहर की दुनिया को बेख़ौफ होकर देखने की हिम्मत दी.
वो एक ऐसी महिला थीं जिनके नाम के साथ 'पहला' शब्द विशेषण के तौर पर कई बार आता है, जैसे स्टाफ सेलेक्शन कमिशन, नई दिल्ली की पहली महिला अध्यक्ष, पंजाबी यूनिवर्सिटी की पहली महिला वाइस चांसलर.
इस कहानी की शुरुआत बेशक उनके जन्म से होती है. साल था 1923 और दिन एक सितंबर.
पंजाब के पटियाला ज़िले में कर्नल शेर सिंह संधू के घर बेटी ने जन्म लिया. शेर सिंह संधू और उनकी पत्नि करतार कौर की ये पहली संतान थी.
कर्नल शेर सिंह ने अपनी बेटी इंदरजीत कौर संधू के जन्म पर उतनी ही धूमधाम से खुशियां मनाई जैसे लोग लड़का पैदा होने पर मनाते हैं.
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कर्नल शेर सिंह एक प्रगतिशील और उदार व्यक्ति माने जाते थे और उन्होंने कभी रूढ़िवादी सोच और उस समय प्रचलन में रही पर्दा प्रथा को अपने बच्चों के विकास में रोड़ा नहीं बनने दिया और इसी सोच ने इंदरजीत कौर संधू को आगे बढ़ने में मदद की.
इंदरजीत कौर ने अपनी शुरुआती पढ़ाई विक्टोरिया गर्ल्स स्कूल पटियाला से की. दसवीं की पढ़ाई के बाद परिवार में उनके आगे की पढ़ाई पर चर्चा होने लगी.
पेशे से पत्रकार रूपींदर सिंह, इंदरजीत कौर संधू के बेटे बताते हैं, ''मेरी मां के नाना ने सलाह दी कि युवा और आकर्षक लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए लेकिन इंदरजीत के दृढ़ निश्चय और पिता के सहयोग ने उनके आगे की पढ़ाई का रास्ता खोलने में बहुत मदद की.''
इसी दौरान कर्नल शेर सिंह का तबादला पेशावर में कर दिया गया और इंदरजीत आगे की पढ़ाई करने के लिए लाहौर चली गईं.
वहां उन्होंने आरबी सोहन लाल ट्रेनिंग कॉलेज से बेसिक ट्रेनिंग कोर्स किया और लाहौर के ही गवर्नमेंट कॉलेज से दर्शनशास्त्र में एमए किया.
इसके बाद वे विक्टोरिया गर्ल्स इंटरमीडिएट कॉलेज में अस्थायी तौर पर पढ़ाने लगीं और 1946 में उन्होंने पटियाला के गवर्नमेंट कॉलेज फॉर विमेन में दर्शनशास्त्र पढ़ाना शुरू किया.
इसके कुछ महीनों बाद भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ और पाकिस्तान से सैकड़ो की संख्या में शरणार्थी आने लगे.
रुपींदर सिंह बताते हैं, ''इस समय इंदरजीत कौर ने अहम भूमिका निभाई. वे एक एक्टिवस्ट के तौर पर भी काम करने लगी.उन्होंने माता साहिब कौर दल का गठन करने में मदद की और उसकी सचिव बनीं. इस दल ने ,अध्यक्ष सरदारनी मनमोहन कौर की मदद से पटियाला में करीब 400 परिवारों का पुनर्वास करने में सहयोग किया.''
''इन लोगों तक आर्थिक सहायता और अन्य मदद जैसे कि कपड़े और राशन पहुंचाने के लिए परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों की मदद ली गई. उस दौर में मदद के लिए लड़कियां भी आगे आईं जो एक तरह से उस ज़माने में नायाब बात थी. हालांकि शुरुआत में इंदरजीत कौर को घर में ही विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन उनका मानना था कि आप विद्रोही बन कर सारी चीज़े नहीं मनवा सकते.''
रुपींदर सिंह बताते हैं कि इस दल ने ऐसे ही सामान के साथ चार ट्रक बारामुला और कश्मीर भी पहुंचाए थे जहां पटियाला की सेना स्थानीय लोगों को बचाने के लिए गई थी.
इसके बाद उन्होंने शरणार्थी बच्चों के लिए माता साहिब कौर दल स्कूल का गठन करने में भी योगदान दिया. उन्होंने शरणार्थी लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण दिलवाया.
वर्ष 1955 में वे पटियाला के स्टेट कॉलेज ऑफ एजुकेशन में प्रोफ़ेसर बन गईं. जहां पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर भी इनकी छात्रा रहीं.
इसके बाद इंदरजीत कौर साल 1958 में चंडीगढ़ के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में प्रोफ़ेसर ऑफ एजुकेशन नियुक्त की गईं और फिर इसी कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल बन गईं.
फिर इंदरजीत की शादी जाने-माने लेखक ज्ञानी गुरदीत सिंह से शादी हो गई. वे पंजाब विधायक परिषद के भी सदस्य थे. वो ख़ुद को अपने पति की दोस्त, साथी और गाइड भी बताती थीं. इस शादी से उन्हें दो बेटे हुए.
इंदरजीत कौर ने एक इंसान, शिक्षिका और प्रशासक के तौर पर कई लोगों के जीवन को प्रभावित किया.
वे अपने समय में समाज में हो रहे बदलावों की साक्षी बनीं और इन बदलावों को उन्होंने अपनी शख़्सियत में भी आत्मसात किया.
एक ऐसे समाज में जहां पर्दा प्रथा को अहमियत दी जाती थी वहां उन्होंने इस परंपरा से ख़ुद को दूर रखकर लड़कियों की शिक्षा और अधिकारों पर काम किया.
और कई ऐसे पदों पर महिलाओं के लिए दरवाज़े खोले जहां पहले पुरुषों का ही वर्चस्व हुआ करता था.
इसके बाद वे पटियाला में गवर्नमेंट कॉलेज फॉर विमेन की प्रिंसिपल बन गईं. ये वही कॉलेज था जिससे उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी.
तीन साल के भीतर उन्होंने इस कॉलेज में साइंस विंग खुलवाया जिससे छात्रों की संख्या भी बढ़ी. बतौर प्रिंसिपल उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई के साथ-साथ दूसरे क्रियाकलापों पर ज़ोर दिया. इसी सिलसिले में उन्होंने लोक नृत्य गिद्दा को पुनर्जीवित करने में भी मदद की.
लड़कियों को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल करवाने में इंदरजीत कौर की बड़ी भूमिका रही और परेड के दौरान गिद्दा के प्रदर्शन से पंजाब के इस पारंपरिक लोक नृत्य को भी राष्ट्रीय पहचान मिली.
फिर उन्होंने अमृतसर में परिवार के साथ रहने के लिए तबादला ले लिया और वहां गवर्नमेंट कॉलेज फॉर विमेन की प्रिंसिपल बनीं. वहां भी उन्होंने पढ़ाई के स्तर को बढ़ाने में मदद की. इसके बाद वे फिर पटियाला लौटीं लेकिन पंजाबी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर बनकर. वे उत्तर भारत में इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला मानी जातीं हैं.
इंदरजीत कौर को लेकर एक क़िस्सा मशहूर है. वाइस चांसलर के पद को संभालने से एक दिन पहले लड़कों में झड़प हुई और लड़कों का एक समूह शिकायत लेकर उनके पास गेस्ट हाउस में आया. एक लड़के को चोट लगी हुई थी और उसने कहा, "मैडम वैसे उन लड़कों के ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा क्योंकि वो किंग्स पार्टी के हैं." इस पर इंदरजीत कौर ने कहा कि जब कोई किंग ही नहीं है तो किंग्स पार्टी कैसे हो सकती है. ये बात सुनकर छात्र मुस्कुराने लगे और मरहम पट्टी कराने चले गए.
इंदरजीत कौर ने कई अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में भी भाग लिया और विश्वविद्यालयों में लेक्चर भी दिए. उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर के तौर पर अपना कार्यकाल समाप्त होने से कुछ समय पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.
इसके बाद उन्होंने दो साल का ब्रेक लिया और वर्ष 1980 में वे केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए भर्ती करने वाली रिक्रूटमेंट एजेंसी स्टाफ सेलेक्शन कमिशन की पहली महिला अध्यक्ष भी बनीं.
बीबीसी हिंदी दस ऐसी महिलाओं की कहानी ला रहा है जिन्होंने लोकतंत्र की नींव मज़बूत की. उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को अपनी आवाज़ दी. वे समाज सुधारक थीं और कई महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वाली वे पहली महिला बनीं. बाक़ी की कहानियां नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर पढ़ें-
(स्टोरी के सारे इलेस्ट्रेशन गोपाल शून्य ने बनाए हैं)
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