कोरोना संकट में पीएम मोदी के लाल क़िले से दिए संबोधन के मायने

नरेंद्र मोदी

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम अपने संबोधन में कई कोरोना महामारी, आत्मनिर्भर भारत, भारत को विकास पथ पर दौड़ाने, सैनिकों के साहस और स्वास्थ्य की बात की. उन्होंने किसानों के साथ साथ सीमाओं की, स्पेस सेक्टर, उत्पादन सेक्टर की बात की, साथ ही विश्व पटल पर भारत क्या दे सकता है इसकी बात की.

लेकिन अपने भाषण में न तो मोदी ने चीन के आक्रामक रवैये का ज़िक्र किया, न लद्दाख में जारी सीमा विवाद का जिक्र किया और न नागरिकता संशोधन क़ानून का और न जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति का. तो कैसा था प्रधानमंत्री की भाषण? क्या ये उन्हीं के पुराने भाषणों की तरह था और क्या इसे लोगों की उम्मीदों के अनुरूप माना जाएगा?

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि मुश्किल के समय में जब देश के सभी निवासी अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी से जूझ रहे हैं उस वक़्त एक प्रधानमंत्री के तौर पर जो कहना जाना चाहिए मोदी ने वही कहा.

वो कहते हैं यह एक पूर्ण भाषण था जिसमें सभी तरह के लोगों के लिए कोई न कोई बात थी, “न तो उन्होंने किसी निंदा की और न ही किसी की आलोचना. अपने भाषण से उन्होंने लोगों को हिम्मत दी और आने वाले वक्त की राह दिखाई. ’मेक इन इंडिया’ से ’मेक फ़ॉर वर्ल्ड’ यही बात थी कि अब तक जहां पहुंच गए हैं अब केवल आगे जाने की उम्मीद है, पीछे हटने की नहीं.”

वहीं वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनिस मानती हैं कि पीएम मोदी के भाषण अक्सर उत्साह भरने वाले होते हैं जो आज दिखा नहीं लेकिन, शायद वो आज की परिस्थिति के अनुकूल नहीं होता.

वो कहती हैं, “इस समय जो परिस्थितियां हैं, जो हालात है उसमें लोगों का साहस कैसे बढ़ाया जाए, कैसे उन्हें ढाढ़स बंधाया जाए यही मोदी के भाषण का केंद्रबिंदु रहा. उन्होंने बंगाल और बिहार का ज़िक्र किया जो चुनाव पर नज़र रखते हुए था लेकन कुल मिला कर ये भाषण किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं था बल्कि सभी तबकों के लिए था.”

‘कोरोना काल में आगे की राह- आत्मनिर्भर भारत‘

प्रदीप सिंह कहते हैं कि “मोदी के आज के भाषण का केंद्रबिंदु आत्मनिर्भर भारत था चाहे वो उत्पादों का निर्यात बढ़ाने की हो, कच्चा माल की बना माल बेचने की बात हो, सेना के लिए हथियारों की बात हो, कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन की बात हो या फिर इंफ्रास्ट्रक्चर की बात हो- सब बातों के मूल में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की बात थी.“

मोदी ने अपने संबोधन में इशारा किया कि कोरोना के कारण भारत में लॉकडाउन रहा लेकिन इसके बाद अब भारत विकास की राह पर आगे चलेगा. उन्होंने ज़िक्र किया कि भारत को वो मैन्यूफैक्चरिंग का हब बनाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि दुनिया के दूसरे देशों का भरोसा भारत पर बढ़ रहा है और देश में पहले से अधिक विदेशी निवेश आया है.

हालांकि प्रदीप सिंह कहते हैं, “ये कितना क्रियान्वित हो पाएगा ये एक अलग बात है लेकिन उन्होंने एक उम्मीद ज़रूर जगाई है कि अब हमें आजाद हुए 74 साल हो चुके हैं, अब हमें अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा.”

पीएम मोदी

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वहीं अदिति फडनिस कहती हैं कि कोरोना महामारी के दौर में जब राष्ट्रीय मनोबल उस तरह से उत्साह भरा नहीं है तब राष्ट्रीय मनोबल को उठाना कैसे है ये मोदी के भाषण का ये केंद्रबिंदु था.

वो कहती हैं, “आने वाले समय में लड़ाई कैसे जारी रखनी है और कैसे आत्मनिर्भरता को केंद्र में रख कर अब भारत का उत्तम होना काफ़ी नहीं है बल्कि सर्वोत्तम होना आगे की राह है ये उनके भाषण में स्पष्ट दिखा.”

वो कहती हैं कि ऐसा लग रहा था कि मोदी को इस बात का अहसास है कि आने वाले कई महीनों तक मुश्किलें बरक़रार रहने वाली हैं और वो लंबी योजनाओं की और दूरगामी लक्ष्य की बात कर रहे थे.

वो कहती हैं, “दुनिया के दूसरे देशों के मुक़ाबले भारत की परफॉर्मेन्स कोरोना से लड़ने में कैसी कामयाब रही उनके भाषण में इसका उल्लेख नहीं था. वो ये कह सकते थे, अपनी सरकार की पीठ थपथपा सकते थे लेकिन जिस तरह भारत में मामले बढ़ते नज़र आ रहे हैं कोरोना संक्रमण के मामले में भारत विश्व का नंबर वन देश भारत बन जाएगा. ऐसे में उनका इसे लेकर कुछ कहना ठीक भी नहीं रहता.”

“उन्होंने इसके उलट कहा कि हमें आशा नहीं खोनी चाहिए, भारत तीन वैक्सीन पर काम कर रहा है. उन्होंने नए डिजिटल हेल्थ मिशन बनाने की बात की जो मुझे आरोग्य सेतु का एक्सटेन्शन दिख रहा है.“

अदिति फडनिस कहती हैं कि वो आयुष्मान भारत से कितना फ़ायदा हुआ उसका ज़िक्र कर सकते थे लेकिन “शायद इसका उतना फ़ायदा नहीं पहुंचा है जितनी इससे उम्मीद थी. ”

प्रदीप सिंह कहते हैं, “मोदी के आज के भाषण में उनकी बॉडी लेंग्वेज में अलग तरह का कॉन्फिडेंस था और ऐसे लग रहा था कि इस संकट से देश निकल सकता है इसका उन्हें भरोसा है औऱ इसी कारण उन्होंने महीनों की नहीं बल्कि लंबे लक्ष्यों का उल्लेख किया.”

“भारत का हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर कमज़ोर है ये बात कोरोना ने साबित कर दी है जिसके मज़बूत करने की ज़रूरत है. प्रधानमंत्री के भाषण में इसका उल्लेख इस प्रकार था कि कोरोना ने इस क्षेत्र में देश की क्षमता को भी उजागर किया है जिसका फ़ायदा भारत के उद्यमियों को मिलेगा.”

पड़ोसी मुल्कों का ज़िक्र

एक तरफ बीते कई सप्ताह से लद्दाख के नज़दीक भारत और चटीन के बीच लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर विवाद बढ़ा है तो दूसरी तरफ़ जम्मू कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के फ़ैसले का पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार विरोध कर चुका है.

ऐसे में उम्मीद थी कि मोदी अपने भाषण में पाकिस्तान और चीन का ज़िक्र कर सकते हैं, लेकिन उनके भाषण में स्पष्ट तौर पर किसी का ज़िक्र नहीं था.

वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनिस कहती हैं, “उन्होंने चीन का नाम तो नहीं लिया लेकिन विस्तारवाद का उल्लेख किया. स्वतंत्राता दिवस के भाषण में किसी एक देश का नाम लेकर कहना उचित भी नहीं होता. उन्होंने विस्तारवाद को पछाड़ने में भारत का पहले क्या योगदान रहा और आगे क्या योगदान हो सकता है इसका उन्होंने ज़िक्र किया जो महत्वपूर्ण था.”

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह भी मानते हैं कि मोदी के भाषण में न तो सीमा विवाद का ज़िक्र था और न ही पड़ोसी मुल्कों से तनाव का लेकिन वो कहते हैं कि दो पड़ोसियं की तरफ इशारा ज़रूर था.

वो कहते हैं, “उन्होंने आतंकवाद और विस्तारवार की जो बात की वो पाकिस्तान और चीन की तरफ़ इशारा था. उन्होंने इशारा किया कि विस्तारवाद ने दुनिया को दो विश्वयुद्ध दिए और चीन उसी राह पर चल रहा है. चीन के साथ विवाद केवल लद्दाख तक नहीं बल्कि उससे आगे भी बढ़ सकता है.”

प्रदीप सिंह कहते हैं, “एक और महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही वो है पड़ोसी कौन हैं उसकी परिभाषा पर फिर से विचार करना. उन्होंने कहा कि ‘पड़ोसी केवल वो नहीं जिससे आपकी सीमाएं मिलती हैं बल्कि वो भी हैं जिनसे आपके दिल मिलते हैं.’ उनकी ये बात स्पष्ट तौर पर इशारा था कि भारत आने वाले वक्त में आसियान देशों और दूसरे देशों के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के लिए काम करेगा.”

और क्या रही महत्वपूर्ण बातें

प्रदीप सिंह कहते हैं कि मोदी ने अपने भाषण में लाल क़िले से सैनिटरी नैपकिन महिलाओं तक पहुंचाने की जो बात की. वो कहते हैं, "वो अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अब तक इस मुद्दे पर चर्चा नहीं होती, ये एक टैबू की तरह है जिसे मोदी ने एब बड़े मंच से तोड़ने की कोशिश की है. "

वो कहते हैं इसके लिए उनकी प्रशंसा की जाने की ज़रूरत है, क्योंकि इसके ज़िक्र का मतलब ये था कि महिलाओं के स्वास्थ्य का मामला कोई टैबू नहीं हो सकता.

वहीं अदिति फडनिस कहती हैं कि मोदी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख में डीलिमिटेशन जैसे एक और संवेदनशील मुद्दे का जिक्र किया.

वो कहती हैं कि “डीलिमिटेशन के तहत कैसे इलाक़ो को बांटा जाएगा ये महत्वपूर्ण विषय है जिसका उन्होंने ज़िक्र किया. जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति वो समझते हैं और इस बारे में वो अधिक बोलते तो शायद इस पर आलोचना अधिक हो सकती थी.”

साथ ही वो कहती हैं कि मोदी ने कृषि क्षेत्र का ज़िक्र किया और कहा कि प्रोक्योरमेंट प्राइज़ेज़ बढ़ेंगे.

पीएम मोदी

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वो कहती हैं कि “इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. और यह अपने आप में पेचीदा मामला है जिसका आसान हल नहीं है. लेकिन इसका ज़िक्र करना ये बताता है कि गांवों की तरफ़ ध्यान दिया जाएगा.”

वहीं प्रदीप सिंह कहते हैं कि “मोदी ने गांवों तक इंटरनेट ले जाने और किसानों के हाथों में अधिक पैसा पहुंचाने की बात कर स्पष्ट किया है कि आने वाले सालों में ध्यान गांवों की तरफ़ रहेगा.”

हालांकि प्रदीप सिंह मानते हैं कि पंचायतों तक इंटरनेट पहुंचाने का काम पहले ही जारी है. वो कहते हैं कि ढाई लाख पंचायतों तक ऑप्टिक फ़ाइबर के ज़रिए इंटरनेट पहुंचाने का काम करना था जबकि केवल डेढ़ लाख पंचायतों तक ही अभी ये काम हो सका है. अब इसे आगे छह हज़ार गांवों तक पहुंचाने की बात मोदी की है.

प्रदीप सिंह और अदिति फडनिस, दोनों मानते हैं कि कोरोना संकट के दौर में देश की जनता मनोबल काफ़ी नीचे चला गया है और आने वाले कुछ महीनों तक स्थिति सामान्य नहीं होगी इसका अंदाज़ा सभी को है.

ऐसे में मोदी से अधिक उम्मीद भी नहीं थी लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि उन्होंने सभी का मनोबल बढ़ाने की बात की और अभी के लिए यही बेहद ज़रूरी थी.

मोदी का भाषण आशा के अनुरूप नहीं था- कांग्रेस

कांग्रेस ने इस मौक़े पर सरकार पर निशाना साथा है और मोदी सरकार से सवाल किया है कि सरकार प्रजातंत्र में विश्वास रखती है, क्या इस देश में सफ़र करने, कपड़ा पहनने, बोलने, सोचने और आजीविका कमाने की आज़ादी है या कहीं न कहीं उस पर अंकुश लग गया है.

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सवाल किया, “जब हम आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, तो हमें ये भी पूछना पड़ेगा कि जो सरकार देश की 32 पब्लिक अंडरटेकिंग्स को बेच दे, रेलवे से लेकर एयरपोर्ट तक को निजी हाथों में सौंप दे, एलआईसी लेकर एफ़सीआई तक हर चीज़ के ऊपर अतिक्रमण और आक्रमण बोल दे, क्या वो इस देश की आज़ादी को सुरक्षित रख पाएगी?”

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