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दिल्ली दंगा: ताहिर हुसैन के पुलिस के सामने इक़बालिया बयान के क्या मायने हैं
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली पुलिस का दावा है कि आम आदमी पार्टी से निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन ने इसी साल फ़रवरी महीने में उत्तर पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगों में अपने शामिल होने की बात स्वीकार कर ली है.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई की ख़बर के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस की आईआर (पूछताछ पर आधारित रिपोर्ट) के अनुसार, आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन ने यह स्वीकार किया है कि 'फ़रवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के लिए लोगों को भड़काने में उनका हाथ था.'
रिपोर्ट के मुताबिक़,''ताहिर हुसैन ने पुलिस को बताया है कि वो आठ जनवरी को जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद से शाहीन बाग़ स्थित पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) के दफ़्तर में मिले थे.''
दिल्ली पुलिस के अनुसार, दंगे के लिए काँच की बोतलें, पेट्रोल, तेज़ाब, पत्थर समेत कुछ अन्य सामग्री जमा करने का काम ताहिर हुसैन को सौंपा गया था, जो उन्होंने अपने घर की छत पर जमा किए.
पुलिस का दावा है कि 'सरकारी क़बूलनामे में ताहिर हुसैन ने यह बात मानी है कि उनके एक सहयोगी ख़ालिद सैफ़ी और पीएफ़आई ने भी इस हिंसा को अंजाम देने में उनकी मदद की.'
क्या कहते हैं ताहिर हुसैन के वकील
एक ओर जहां पुलिस यह दावा कर रही है, वहीं ताहिर हुसैन के वकील ने ऐसे किसी भी बयान से इनकार किया है.
बीबीसी से बातचीत में ताहिर हुसैन के वकील जावेद अली ने कहा, "पुलिस अपने हिसाब से सही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है. ताहिर हुसैन ने दिल्ली दंगों के संबंध में ऐसी कोई बात स्वीकार नहीं की है. दसअसल, वास्तविकता तो यह है कि वो ख़ुद एक पीड़ित हैं और उन्हें ग़लत तरीक़े से पेश किया जा रहा है. इसके साथ ही अगर कोई शख़्स ऐसे समय में जबकि उसे दोषी क़रार नहीं दिया गया है, अगर वो पुलिस के सामने इस तरह का कोई भी कन्फ़ेशन करता भी है तो उसे मान्य नहीं माना जाता. इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के बयान किसी को भी दोषी साबित नहीं करते."
जावेद अली ने बीबीसी को बताया कि वास्तव में साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस एक्ट) में सुबूत की जो परिभाषा है, यह उसके तहत नहीं आता है.
हालांकि पुलिस के अनुसार पूछताछ के दौरान ताहिर हुसैन ने ख़ुद बताया, "ख़ालिद सैफ़ी ने अपनी एक दोस्त, इशरत जहाँ के साथ मिलकर पहले धरना शुरू किया. इसकी शुरूआत खुरेजी इलाक़े में हुई. इसे हम शाहीन बाग़ प्रदर्शन जैसा करना चाहते थे. फिर चार फ़रवरी को, दिल्ली के अबुल फ़ज़ल एनक्लेव में मेरी मुलाक़ात ख़ालिद सैफ़ी से हुई, जहाँ दंगे की प्लानिंग की गई."
पुलिस का दावा है कि हुसैन ने कहा, "चार फ़रवरी को यह तय हुआ कि सीएए विरोधी प्रदर्शन में आने के लिए लोगों को भड़काना होगा. ख़ालिद सैफ़ी का काम लोगों को भड़का कर सड़कों पर उतारने का था. ख़ालिद सैफ़ी ने कहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे (17 फ़रवरी 2020) के समय कुछ तो बड़ा करना होगा ताकि मौजूदा सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जा सके."
दिल्ली पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि दंगे के लिए काँच की बोतलें, पेट्रोल, तेज़ाब, पत्थर समेत कुछ अन्य सामग्री जमा करने की बात ताहिर हुसैन ने स्वीकार की है.
पुलिस के दावे के अनुसार ताहिर हुसैन ने अपने क़बूलनामे में कहा है कि, "24 फ़रवरी 2020 को हमने अपने प्लान के हिसाब से लोगों को मेरे घर की छत पर बुलाया. उन्हें बताया गया कि पत्थर, पेट्रोल बम और तेज़ाब की बोतलें कैसे फेंकनी हैं. मैंने अपने परिवार को किसी दूसरी जगह शिफ़्ट कर दिया था. उस दिन क़रीब डेढ़ बजे हमने पत्थरबाज़ी और आगज़नी शुरू की. मैंने जानबूझकर अपने घर के बाहर और छत पर लगे सीसीटीवी के तार कटवा दिये थे, ताकि सबूत ना रहे."
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, ताहिर हुसैन आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में भी मुख्य अभियुक्त हैं.
पुलिस के इस दावे के संबंध में जब हमने अंकित के भाई अंकुर शर्मा से बात की तो उनका कहना था, "हम तो शुरू से ही इस बात को कहते आए हैं. हमारी माँग सिर्फ़ इतनी है कि जो भी दोषी साबित हो, उसे सज़ा मिले."
अंकित का शव 26 फ़रवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चाँद बाग़ इलाक़े में मिला था. साथ ही ताहिर हुसैन दिल्ली में हुए दंगों के 10 मुख्य अभियुक्तों में भी शामिल हैं और फ़िलहाल जेल में बंद हैं. उनके साथ ख़ालिद सैफ़ी भी जेल में हैं.
लेकिन क्या पुलिस का ये दावा कोर्ट में मान्य होगा
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विराग गुप्त बताते हैं कि भले ही बयान पुलिस के सामने हुआ हो लेकिन उसे आख़िरी सुबूत के तौर पर नहीं देखा जाता. उसकी क़ानूनी स्वीकार्यता उतनी नहीं है. इसीलिए पुलिस के बाद मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत बयान दर्ज करवाया जाता है. मजिस्ट्रेट के आगे दर्ज कराए गए बयान को स्टेटमेंट माना जाता है.
लेकिन इसमें कुछ दूसरे तथ्य भी हैं.
पहला तो यह कि बयान चाहे जो हो उसके सपोर्ट में उससे जुड़े साक्ष्य होना ज़रूरी है, तभी उसे ठोस माना जाएगा.
दूसरा यह कि अगर कोई शख़्स अभियुक्त है और वह किसी और पर आरोप लगाता है तो उसका भी महत्व नहीं है.
तीसरा यह कि कन्फ़ेशनल स्टेटमेंट को भले ही अंतिम सुबूत ना माना जाए लेकिन शुरुआती जाँच, रिमांड, ज़मानत में इसका महत्व बिल्कुल होता है लेकिन ट्रायल के दौरान बहुत ही एडवांस स्टेज पर इन सबको देखा जाएगा.
विराग गुप्ता कहते हैं कि क्रिमिनल मैटर्स में कंफ़ेशनल स्टेटमेंट्स का बहुत सीमित महत्व है और जबकि बयान पुलिस के सामने हो तो इसे ठोस सुबूत तो नहीं माना जा सकता.
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